(बाल पर्व)

(ईसा मेरे इष्टदेव हैं. उनकी यह जीवनी मेरी अपनी कृति है जो जन जन को समर्पित है)

 

लगभग दो सहस्त्र साल पूर्व मध्य-पूर्व में एक छोटे से गांव में मरियम नामक एक यहूदी युवती रहती थी. बाल्यकाल से ही वह बहुत ईश्वर-भक्त थी और उसके रिश्ते के अन्य परिवारों के लोग, यहां तक कि उसके गांव के सभी लोग उसकी ईश्वर-भक्ति के बारें में जानते थे एवं एक दूसरे से कहा करते थे. उसका अधिकतर समय अपने पिता एवं माता का हाथ बटाने में निकल जाता था. बाकी समय वह अपने दादा दादी एवं अन्य बुजुर्गों से धार्मिक बातें सुनने के लिये बिताती थी.

 

यहूदी उस समय अपने ही देश में पराये थे क्योंकि उनके ऊपर रोमी साम्राज्य का शासन था. रोमी लोग बहुत महत्वाकांक्षी थे एवं यहूदियों पर कडाई से शासन करते थे. इतना ही नही, वे बडी कडाई के साथ यहूदियों से कर वसूल करते थे. इस कार्य के लिये वे लुटेरे किस्म के यहूदियों का उपयोग करते थे, अत: कोई भी इस शोषण से बच नहीं पाता था. उनके अत्याचार से यहूदियों के देशों मे त्राहि त्राहि मची हुई थी, एवं हर धार्मिक यहूदी हर दिन ईश्वर से प्रार्थना करता था कि वे भक्तों को इस पीडा से छुटकारा दें. उनका अटूट विश्वास था कि एक न एक दिन ईश्वर उनको एक मुक्तिदाता के द्वारा मुक्ति प्रदान करेंगे. उनके इस विश्वास के पीछे भी एक चरित्र है. यहूदियों का धर्मग्रन्थ तौरेत* के अनुसार मनुष्य जब ईश्वर की आज्ञा का उल्लंघन कर के पापी बन गया था तभी ईश्वर ने यह वचन दिया था कि वे एक मुक्तिदाता को भेजेंगे. उन लोगों का विश्वास था कि यह मुक्तिदाता उन लोगों को पाप की भयानकता से एवं रोमी साम्राज्य के अत्याचार से भी छुडायेंगे. मरियम के घर-गांव के बुजुर्ग बात बात पर यह विश्वास दुहराते थे, एवं बात उस भक्त कन्या के मन में घर कर गई थी कि वह अपनी आंखों से इस मुक्तिदाता को देखना चाहती थी. उनकी सेवा करने का अवसर उस जैसी ईश्वर-भक्त यहूदी के जीवन का सबसे बडा भाग्य होगा. [क्रमश:]