धीरे-धीरे कई साल गुजर गये, लेकिन यहूदियों को उनकी पीडा से बचाने कोई नहीं आया. कई स्वतंत्रता आन्दोलन चले, लेकिन कुछ नहीं हुवा. कर-वसूली करने वालों का अत्याचार दिन प्रति दिन बढता जा रहा था. ये लुटेरे लोग हर साल बोली लगा कर कर-वसूली का ठेका लेते थे. रोमी साम्राज्य को सिर्फ इस पैसे से मतलब था, और इस की वसूली कैसे की जाती है उससे उनको कोई मतलब नहीं था. अत: ये वसूली वाले एक एक परिवार से जो जायज था उसके चार से पाच गुना पैसा वसूलते थे और इस लूट से अपनी जेब भरते थे. जो भी यहूदी इतना धन नही दे पाता था उसे वे लोग बंधुआ गुलाम बना लेते थे. अपने घर-परिवार एवं लोगों पर होते अत्याचार को देख अन्य यहूदियों के समान मरियम भी बहुत दुखी होती थी. इस बीच वह भक्त कन्या विवाह-योग्य हो गई और उसके मांबाप ने यूसुफ नामक उसके समान ही भक्त एक सज्जन से उसकी मंगनी कर दी. यहूदियों का कायदा यह था, कि मंगनी के बाद वर एवं वधु पति-पत्‍नी माने जाते थे, लेकिन वे अपने अपने मां बाप के साथ ही रहते थे. मंगनी के एक या दो साल बाद एक और धार्मिक रस्म के बाद कन्या अपने पति के साथ चली जाती थी और वे एक दूसरे के साथ विवाहित जीवन आरम्भ करते थे