मरियम एक बेहद धार्मिक एवं पवित्र कन्या थी अत: वह इस खबर को सुन एकदम घबरा गयी. वह स्वर्गदूत से बोली, “हे महानुभव, हे ईश्वर के महान दूत, ऐसा कैसे हो सकता है. मुझे आज तक किसी पुरुष ने स्पर्श नहीं किया है, न ही मैं अपने पति के साथ रहती हूं. अत: सब लोग मुझे पापिनी समझेंगे”. स्वर्गदूत ने उस भक्त कन्या को आश्वासन दिया कि समय आने पर परमात्मा उसके पति, परिवार, एवं ग्राम-वासियों पर यह बात प्रगट कर देंगे कि यह ईश्वर का कार्य है तथा इस तरह से जगत के मुक्तिदाता अद्‍भुत ईश्वरीय शक्ति के द्वारा जन्म लेंगे. इसके बाद वह स्वर्गदूत जैसे वह आया था, उसी तरह से अचानक अदृश्य हो गया. जल्दी ही उस कन्या को यह आभास हो गया कि वह गर्भवती है. उस समय उसी स्वर्गदूत ने उसके पति यूसुफ को दर्शन देकर बताया कि उसकी पत्‍नी की कोख में मानवों के लिए ईश्वर की ओर से भेजे गये मुक्तिदाता हैं.

जब यह बात लोगों को पता चली तो सब ने इस करुणा के लिये परमात्मा का बहुत आभार माना. अधिकतर यहूदियों को आश्चर्य हुआ कि मुक्तिदाता किसी राजमहल में या किसी बडे शहर के धनी के परिवार या किसी जाने माने नगरसेठ के परिवार में जन्म लेने के बदले एक गांव के एक औसत परिवार में जन्म ले रहे है. इसका फल यह  हुआ कि जब यूसुफ गर्भवती मरियम को लेकर अपने गाव चले गये तो मरियम के गांव के लोगों ने कुछ महीनों में ही भुला दिया कि इस जगत में एक विशेष दिन आ रहा ह या विशेष व्यक्ति पधार रहे हैं. फलस्वरूप जब वह दिन आया जब मुक्तिदाता ईसा एक शिशु के समान जगत में पधारे तो उनके घर-परिवार एवं गांव के लोगों ने उनको न पहचाना. इसके बारे में ईसा ने कई बार टिप्पणी भी की कि कोई भी महान व्यक्ति अपने ही नगर या गांव के लोगों से तब तक आदर नही पाता जब तक गैर लोग उनको महान न कहें.