स्वर्गदूत द्वारा दिये गये दर्शन एवं सन्देश के बाद से यूसुफ एवं मरियम ने हमेशा यह याद रखा कि उस दिव्य बालक का पालण-पोषण विशिष्ट तरीके से होना है क्योंकि उनके द्वारा ईश्वर मानव मात्र के उद्धार के लिये इस धरती पर मनुष्य-रूप में पधार रहे हैं. चोला मनुष्य का है, लेकिन वास्तव में वे ईश्वर हैं. इस तरह जब वे दोनों मुक्तिदाता की आस लगाये बैठे थे कि अचानक फिर से यहूदियों पर रोमी शासन का कहर बरसा. कर एवं चुंगी के द्वारा एक बहुत बडी रकम हर साल वसूल करने के बावजूद उनको लगा कि यहूदियों को अभी और निचोडा जा सकता है. अत: उस समय के रोमी शासक ने अचानक आदेश दिया कि यहूदियों की जनगणना की जाये और उनकी सही जनसंख्या ज्ञात की जाये.

आजकल जनगणना के लिये सरकार-नियुक्त लोग घर घर जाकर जानकारी इकट्ठी करते हैं, लेकिन उन दिनों मामला उलटा था. तब हर आदमी के लिये यह जरूरी था कि वह सपरिवार अपने पैतृक गांव में पहुंच कर सरकारी केन्द्र मे अपनी जानकारी रिकार्ड करवाये. यह एक कठिन काम था, और उस परिवार के लिये बहुत कठिन था क्योंकि मरियम के प्रसव का समय निकट था, यात्रा के लिये आधुनिक वाहन उपलब्ध नहीं थे, एवं यूसुफ के पैतृक गांव में (जिसे उसके बापदादों ने कई पीढियों पहले छोड दिया था) अब उनका कोई नहीं बचा था जिनके घर वे टिक सकें. कई दिनों की पैदल एवं गधे के ऊपर यात्रा के बाद जैसे तैसे वे अपने पैतृक गांव बैतलेहेम पहुंचे, लेकिन सराय मे जगह न थी. आसपास से जो लोग आये थे उनके कारण धर्मशाला पहले से ही खचाखच भरी हुई थी. हरेक के साथ स्त्री-बच्चों का बडा काफिला था, और उस जमाने के छोटे छोटे कमरों के बने भवन में कहीं भी तिल रखने की जगह नही थी.