यात्रा एवं प्रसव की निकटता के कारण थकी हारी अपनी पत्नी के लिये यूसुफ बहुत परेशान हुए. मैदानों में भी जहां टिकने के लिये सहूलियत थी वहां लोग पहले से उसे घेर कर तम्बू लगा चुके थे. अंत में सराय के मालिक की दया के कारण अपने गौशाले को साफ कर उसने उसमें उनको रहने की जगह दी. वे वहां कुछ दिन रहे ही थे कि मरियम को प्रसव-वेदना उठी एवं उसी गौशाले में उन्होंने ईसा को जन्म दिया. कैसा विरोधाभास कि जिसने सारी सृष्टि को ताना, उसको एक भवन तो छोडिये, एक मैदान में तना तम्बू भी अपने जन्म के लिये न मिला. लेकिन यही ईश्वर की रीत है. मनुष्य दिखावे से अपने आपको बडा दिखाने की कोशिश करता है. ईश्वर अपने कार्यों के द्वारा अपने आप को प्रकट करते हैं — उनको किसी बाह्य अलंकार या घोषणा की जरूरत नहीं है. मनुष्य यह अकसर भूल जाता है, एवं इस कारण कई बार उनके संगियों ने ईसा को न पहचाना के वे कौन हैं.