यहूदियों का कायदा था कि साल में कम से कम एक बार वे यरुशलम नगर में स्थित अपने प्रधान मन्दिर में जरूर जाते थे. ईसा के मांबाप इस मामले में बहुत नियमित थे, एवं अपने लिये एवं बालक ईसा के लिये वहां हर साल भेंट-बलिदान आदि चढाते थे. इसके लिये वह साल का वह समय चुनते थे जब सब लोग तीर्थ पर यरुशलम् जाते थे. इससे रास्ते भर यात्रियों के बडे बडे काफिले मिल जाते थे, एवं यात्रा सुरक्षित रहती थी. इस माहौल में रास्ते में पानी एवं भोजनवस्तुऐं भी सुलभता से मिल जाती थीं. यह क्रम हर साल चलता रहा. बालक ईसा इस यात्रा में बहुत रुचि लेते थे, एवं यात्रा का सारा समय काफिले के अन्य परिवारों एवं रिश्तेदारों के साथ बिताते थे.

ईसा जब बारह साल के थे तब इस यात्रा में एक घटना घटी जिससे उनके मांबाप को एक बार और समझ में आ गया कि ईसा सदैव उनके साथ नहीं रहेंगे. उस समय ईसा बारह साल के हो गये थे एवं मेले के लिये अपने परिवार के साथ चल पडे. रास्ते में अधिकतर समय उन्होंने काफिले के अन्य मुसाफिरों एवं अपने रिश्तेदारों के साथ आत्मिक चर्चा में बिताया. इस पर किसी को कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि उस उमर के यहूदी बालको से समाज यह उम्मीद करता था कि वे अपने शास्त्रों के बारे में प्रारंभिक जानकारी रखेंगे. लेकिन सब ने यह जरूर नोट किया कि ईसा का ज्ञान अपनी उमर के बालकों से, बल्कि बुजुर्गों से भी बहुत अधिक था. हफ्तों की यात्रा के बाद वे यरुशलम के अपने मन्दिर पहुंचे. शहर लोगों से खचाखच भरा हुआ था, लेकिन उनको औ साथ यात्रा कर रहे रिश्तेदारों के बडे काफिले को एक साथ एक ही जगह पर टिकने में कोई दिक्कत न आई. दो चार दिन में उन्होंने मन्दिर के सारे कर्मकाण्ड खतम किये, एवं दूर दूर से वहां आये अपने सारे रिश्तेदारों से मुलाकात की. इसके बाद उनके साथ जो परिवारजन एवं नगरवासी आये थे, वे वापस निकल पडे. अकेला यह काफिला ही मीलों लम्बा था, एवं एक सिरे पर जो लोग थे वे अपने ही काफिले के दूसरे सिरे के लोगों को नहीं देख पाते थे. मरियम एवं यूसुफ ने सोचा कि आते समय जैसे ईसा पूरे काफिले में नाते रिश्तेदारों एवं पडोसियों के साथ थे उसी प्रकार अभी भी काफिले में ही होंगे. लेकिन रात को जब वे खानेसोने के लिये अपने मांबाप के पास न पहुचे तो मांबाप को फिकर लगी एवं वे ईसा को ढूंढने लगे. सारा काफिला तलाशने के बाद भी जब ईसा न मिले तो वे बहुत चिंतित होकर वापस यरुशलम लौट गये. तीन दिन तक वे वहां पडाव डाल कर पडे एक काफिले से दूसरे तक भटकते रहे. तीसरे दिन वे अकस्मात मन्दिर पहुचे तो अचानक एक बडी भीड के बीच ईसा को पाया. वहां यहूदी धर्म के ज्ञानी एवं बुजुर्ग लोगों के बीच ईसा विराजमान थे एवं उनके धर्मशास्त्रों के बारे में उन विद्वानों के साथ गहन चर्चा में जुटे हुए थे. महज बारह साल की उमर के ईसा के ज्ञान की गहराई एवं विस्तार को देख लोग दांतो तले ऊंगली दबा रहे थे. किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि यह दिव्य एवं ज्ञानी बालक कौन है जो उन बुजुर्ग विद्वानों के साथ बडे सक्षम तरीके से शास्त्रार्थ कर रहा था. धर्मगुरू भी हैरान थे कि यह अनजान दिव्यात्मा कौन है.

ईसा को फौरन उनके मांबाप ने अपने पास बुला लिया एवं उनकी माता ने उनसे पूछा, “बेटे आप ने यह क्या किया. हम एवं आपके पिताश्री कितने दिन से आप को ढूढ रहे हैं.” ईसा ने तुरंत जवाब दिया, “आप और पिताश्री क्यों मेरे बारे में फिकर कर रहे थे. आप दोनों को यह नहीं भूलना चाहिये कि मैं एक विशेष लक्ष्य के साथ इस दुनियां मे आया हूं, अत: मुझ ईश-पुत्र के लिये यह अधिक उचित होगा कि मैं अपने इन्सानी मांबाप के घर में रहने के बदले अपने आसमानी पिता के इस घर में रहूं.” अपने इस कथन के बावजूद सर्वज्ञानी ईसा मन ही मन जानते थे कि जिन इन्सानी मांबाप ने उनको जन्म से लेकर बारह साल की उमर तक पालापोसा एवं प्यार किया था उनको वे इस समय छोड देंगे तो उनकी भावनायें बहुत आहत होंगी. अत: जो उनको कहना था वह ईसा ने कह भी दिया, लेकिन उसके बाद वे मांबाप के साथ घर चले भी गये. ईसा का उद्धेश्य अपने दिव्य उद्भव के बारे में मांबाप को एक बार और याद दिलाना था, जिससे कि जब उनका सेवाकाल आ जाये तो माबाप को विरह का दुख अधिक न हो.

अपने दिव्य उद्भव के बारे में बहुत ही नाटकीय तरीके से एक बार और इस तरह अपने सांसारिक मांबाप को याद दिला कर ईसा उनके साथ अपने गाव वापस पहुंच गये. इस घटना की ऐसी अमिट छाप उनके मांबाप पर पडी कि फिर कभी उन्होंने इस तरह ईसा पर अपना अधिकार नहीं जमाया. वे यह भी समझ गए कि ईश्वर द्वार नियुक्त समय आने पर ईसा अपनी दिव्य सेवा के लिये निकल पडेंगे एवं उस समय उनको टोकना नहीं है. इस घटना के बाद अपनी तीसवी सालगिरह तक ईसा अपने मांबाप के साथ रहे एवं हर कार्य में उनकी मदद की. उन्होंने भी ईसा के आत्मिक जीवन में सामान्य से अधिक जो उपवास एवं ध्यानमनन आदि की आद्त थी उसके बारे में ईसा को टोकना बंद कर दिया. ईसा जब युवा हो गये तब वे यह भी समझ गये कि अब उनका सेवा काल निकट है, एवं वे कभी भी मांबाप को छोड कर सेवा के लिये निकल पड सकते हैं. हुआ भी यही, लेकिन उस तरह से नहीं जैसा उनके सांसारिक मांबाप ने सोचा था.