ईसा जब दो साल के थे तब अचानक विद्वानों का एक बहुत बडा दल यहूदियों की राजधानी यरुशलम में हेरोद के राज दरबार पहुंचा. उन्होंने राजा को बताया कि उनको आकाश में एक विशिष्ट प्रकाश-पुंज दिखाई दिया था जो इस बात का चिन्ह था कि यहूदियों के बीच एक ‘राजा’ का जन्म हुआ था. उन्होंने यह भी बताया कि पिछले दो साल से वे इस यात्रा की तयारी कर रहे थे एवं पैदल एवं ऊटों पर यात्रा कर रहे थे. अब वे उस बालक का दर्शन करना चाहते थे. खबर सुन कर हेरोद के सर पर बिजली कौंध गई. यह खबर यहूदियों के बीच भी आग के समान फैल गई क्योंकि हेरोद एक गैर यहूदी था, एवं जिसने अपने सिंहासन को बचाने के लिये अपने बच्चों तक की हत्या करवा दी थी वह किसी भी हालत में उस यहूदी बालक को जीने न देगा बल्कि अपने आप को बचाने के लिये कत्ले आम करवा देगा. अपनी राजगद्दी को खतरे में देख हेरोद ने उन विद्वानों को बुला कर उस आसमानी प्रकाश पुंज के प्रगट होने के समय की सही सही जानकारी ले ली. उन से यह वचन भी ले लिया कि इस शिशुराज को पा लेने के बाद वे हेरोद को इस की सूचना दे देंगे. इस बीच यहूदी विद्वानों ने अपने धर्मशास्त्रों के आधार पर बताया कि उस समय मुक्तिदाता बेतलहम नामक यहूदी ग्राम में होंगे. यह सुन विद्वान लोग उस गांव की तरफ कूच कर गये.

रास्ते में वह प्रकाश पुंज फिर उनके सामने प्रगट हो गया. इस बार आकाश में स्थिर रहने के बदले वह उनके सामने चलने लगा, एवं शिशु के निवास की ओर उनका मार्गदर्शन करता गया. अंत में वह पुंज उस घर के ऊपर पहूंच कर स्थिर हो गया जहां लगभग दो साल की उमर के ईसा अपने मां बाप के साथ रहते थे. उस विलक्षण बालक का दर्शन होते ही उन लोगों ने समझ लिया कि यही वह जगत की ज्योति हैं जिनकी तरफ उस प्रकाश पुज ने अपने उदय के द्वारा संकेत किया था. उनको साष्टांग प्रणाम करने के बाद एक राजा के लिये उचित भेंट अपने अपने थैलों से निकाल कर उनको चढाया, जैसे स्वर्ण, गंधरस, एवं लोहबान. इसके बाद वे वापस जाने की तय्यारी कर रहे थे कि उनको ईश्वरीय दर्शन मिला कि हेरोद राजा के पास वापस न जाना क्योंकि उसका असली लक्ष्य तो इस दिव्य बालक की हत्या करना है. इस बीच उन विद्वानों की जानकारी के बिना हेरोद के जासूस उनके ऊपर नजर रख रहे थे. लेकिन ईश्वर की ऐसी कृपा हुई कि वे छिप कर उस देश के बाहर चले गये, एवं हेरोद के जासूसों को न तो उनका पता लग पाया, न उस बालक का अता पता मिला. इस पर हेरोद इतना कुपित हुआ कि उसने अपने सैनिकों को भेज कर बेतलहम नगर एवं उसके आसपास के ग्रामों में दो साल एवं उससे कम उमर के जितने बालक थे उनको मरवा डाला.