सारथी: काव्य अवलोकन 2

पिछले दो दिन काफी कविताये पढने का अवसर मिला. गजब की कवितायें हैं कई रचनाकरों की. प्रस्तुत है उन में से पांच की कुछ पंक्तियां. उम्मीद है आप भी पढेंगे.

यह पैचाशिक नरमेघ
पैदा कर गया है, दहशत जन जन के मन में
इन बूढ़ों की तो उड़ ही गयी है नींद तब से
बाकी नहीं बचे हैं पलकों के निशान
देखते हैं दृगों के कोर ही कोर
देती है जब तब पहरा पपोटों पर
सील मुहर सूखी कीचड़ की. [पूरी कविता पढें …]

माँ बनकर ये जाना मैनें,
माँ की ममता क्या होती है,
सारे जग में सबसे सुंदर,
माँ की मूरत क्यूँ होती है॥ [पूरी कविता पढें …]

एक मरियल कुत्ता
और एक मरियल आदमी
कूड़ेदान में पड़ी
एक सूखी रोटी के लिए
झगड़ पड़े।
कुत्ते ने कहा–
मैंने देखा है पहले
हक़ मेरा बनता है। [पूरी कविता पढें …]

कौन यह किशोरी?
भोली सी बाला है,
मानों उजाला है,
षोडशी है या रँभा है ?
कौन जाने ऐसी ये बात!
हो तेरा भावी उज्ज्वलतम,
न होँ कटँक कोई पग,
बाधा न रोके डग [पूरी कविता पढें …]

पेसिफ़िक मॉल के ठीक सामने
सड़क के बीचोंबीच खड़ा है देर से
वह चितकबरा
उसकी अधमुंदी आंखों में निस्पृहता है अज़ब
किसी संत की
या फ़िर किसी ड्रग-एडिक्ट की
तीखे शोर , तेज़ रफ़्तार , आपाधापी और उन्माद में
उसके दोनों ओर चलता रहता है
अनंत ट्रैफ़िक [पूरी कविता पढें …]

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Author: Super_Admin

5 thoughts on “सारथी: काव्य अवलोकन 2

  1. बहुत अच्छा रहा आपका अवलोकन… जो छुट गया यहाँ सब आ गया…।

  2. बहुत-बहुत शुक्रिया शास्त्री जी आज मैने मेरी कविता आपकी चुनी हुई कविताओं में देखी,..मुझे विश्वास नही हो रहा है खुद पर..
    आपका आशीर्वाद हमेशा बनाए रखियेगा…

    सुनीता(शानू)

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