विज्ञान ने ईश्वर को नकार दिया है ?

आजकल कई लोगों के बीच ईश्वर को नकारना एक फैशन सा बन गया है. अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में यह प्रवृत्ति अधिक दिखती है. चार अक्षर अंग्रेजी के पढते ही बहुत से बच्चों को यह लगने लगता है कि जब तक आत्मा, परमात्मा आदि अवधारणाओं को न नकारा जाये तब तक शायद उनकी पढाई पूरी नहीं होती है.

चूंकि भौतिकी मेरा इष्ट विषय है, अत: कई मुसीबत के मारे विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में अकसर आनाजाना लगा रहता है. जब विद्यार्थीयों को पता चलता है कि मैं घोर आस्तिक हूं तो अकसर वे पूछते हैं कि कोई व्यक्ति किस तरह से ईश्वर पर एवं भौतिकी पर एक समान या एक ही समय आस्था रख सकता है. उनके हिसाब से यह एक बहुत तार्किक एवं बौद्दिक प्रश्न है. मेरी नजर में यह प्रश्न कुछ इस तरह का है कि “यह कैसे हो सकता है कि आप लिखते भी जा रहे हैं एवं अपने लिखे को पढते भी जा रहे हैं”. प्रश्न ही अशुद्ध है. गलत प्रश्न पूछेंगे तो जबाब भी गलत ही मिलेगा.

जो लिखा जाता है वह स्वाभाविक रूप से उसी समय पढा भी जाता है. तभी तो लिखने वाले को मालूम हो पाता है कि वह क्या लिख रहा है, कितना लिख लिया है, एवं कितना बचा है. लिखना एवं पढना एक दूसरे के पूरक हैं. उनको अलग करने की कोशिश वही करता है जो कभी न तो पढा है, न जिसने कभी लिखा है.

सिर्फ वे ही लोग यह दावा करते हैं कि विज्ञान ने ईश्वर को नकार दिया है जिनका पाला न तो ईश्वर से पडा है न विज्ञान से.

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Author: Super_Admin

14 thoughts on “विज्ञान ने ईश्वर को नकार दिया है ?

  1. कृपया यह तो स्पष्ट कीजिए कि क्या विज्ञान के द्वारा ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध किया जा सकता है? अगर हाँ, तो कैसे?

  2. एक वैज्ञानिक ने एक बड़ी अन्तर्राष्ट्रीय सभा में विभिन्न तर्क आदि देकर प्रमाणित कर दिया कि there is no God. किन्तु मंच से उतरते ही उसके मुख से निकला — “Thanks God! that I have prooved there is no God!”

  3. Why a feild labour who works very hard but remains distress because he doesn’t get opportunities but when one has to rise like Dhirubhai opportunities visit his door it is why because god want to help him?
    I think that you get opportunities because some divine force is helping and your luck is good , your stars are bright but if he is not helping you then you will face bad luck, miss opportunities and your condition will remain distress.
    You are able to criticise existence of God because that divine power wants you to do so and have given you opportunities to be in that position that pepole are hearing you.

  4. जो लोग ऐसी बात करते है उनके बारे मे सिर्फ़ इतना कहा जा सकता है “कुए के मेढक” .

    चार आखर अग्रेजी के पढ़ अपने आप को ख़ुद खुदा समझते है , मई तो सिर्फ़ इतना कहूँगा जो अपने का नही हुआ वो क्या परायी संस्कृती का होगा. मई कोई बड़ा ज्ञाता तो नही पर इतना ज़रुर जनता हूँ की हमारे ग्रंथों में जो लिखा है विज्ञानं उसे ही अब साबित करने मे लगा है. जैसे मोबाइल फ़ोन टीवी , पुरानी कहानियो मे संजय ने आकों देखा हल सुनाया था , लोगो के पास अपनी बात बिना किसी साधन के दूसरो के पास पहुचने की विद्य होती थी, नए युग का हवाई जहाज देखो क्या पहले पुस्पक विमान नही होते थे. एटम की खोज तो अंगरेजी विज्ञानं ने अभी की है पर महावीर तो कबका इसे सिद्द कर गए है ऐसे बहुत से उदाहरण है जो सिद्द हो चुके है हमारे सस्त्रों से .

    जो लोग इसे नही मानते उनके लिए मैं एक शब्द हमेशा उपयोग करता हूँ

    पढे लिखे गवार

  5. i feel god is there but he is not JUST for everyone .yes every one preaches that what ever god does does for our welfare but sometimes one does feel that what welfare god has in mind when 3 children die together in a family or when 2 children of same family do not get the same love from their parents . the faith is hard to keep when on eis constantly tested and one cant always feel happy that ok i dont have slippers to wear but see the other person has no legs .
    destiny , fate karma and god are just figmentof imagination for some , for others they are blessings and for few they are curses

  6. hi rachna,
    I was having 2 dogs – 1 male and 1 female the male dog healthy died in just 1 year and the female dog who became 70% blind due to some illness is living happily(you can call) this is called destiny which is linked to your previous karmas.
    If u will do good u will get everything you expect in your next avtaar also but today everyone is thinking only for its prosperity and wants to live a joyful short life i today.
    According to me as my view is that numbers of total living beings are fixed only the formation is of diffrent species.
    My view is that we have ruined the jungle but not the creature of jungle as you will find a number of junglees in our society nowadays as we have ruined the foxes but the fox like behaviour is most commonly found in our society.
    Dogs, maneaters everything you will find just study the behaviours of people around you.

  7. Now I tell you of myself as I feel that I am a very egoistic man and I am trying to rise on my own without taking help from my parents and my plan is to not inherit a rupee of my parents.
    Doing everything on its own is a very tough task and I regular face crisis situation but when I look in space and just ask help from the Divine power some one in form of Human being comes to my rescue and belive that always they are not my parents or close relatives.
    They help me because some divine power wants them to help me.

  8. क्षमा करें अन-ईश्वर वाद भी हमारी संस्कृति का हिस्सा है, इसलिए जो अन-ईश्वर वादी को बेवकुफ कहता है, उनके लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं है. यह भी एक प्रकार की असहिंष्णुता है.

  9. ये तो एक ना ख़त्म होने वाला विषय है। अगर माने तो पत्थर मे भी भगवान है और ना माने तो कुछ भी नही है।

  10. सबसे सही जबाब ममता जी का है…
    “कांट” ने कहा है कि ईश्वर आस्था का प्रतीक है आपके अंदर आस्था है तो ईश्वर है नहीं तो………
    मैं यहाँ कहना चाहता हूँ कि पाश्चात्य दार्शनिकों ने ईश्वर के अस्तित्व में तीन प्रमाण दिये–
    1) विश्वकारण संबंधी (Cosmological Argument)
    2) प्रयोजन मूलक (Teleological Argument)
    3) सत्तामूलक तर्क (Ontological Argument)
    साधारण रुप में ये सारे तर्क एक सीमा पर आकर खंडित हो जाते हैं… कांट आगे कहता है, ईश्वर किसी भी युक्ति द्वारा सिद्ध करना एक प्रयास मात्र है… मानवीय बुद्धि सीमित है जिससे असीम सत्ता को सिद्ध करने का प्रयास आंशिक होगा… भारतीय दर्शन में इसका सही जबाब है– नैषां तर्केण मत्तिरापनेय।
    इसकारण कांट नैतिक आधार पर ईश्वर की सत्ता को मानता है…
    ये बात अलग है कि कुछ मानववादियों जैसे सार्त्र… नित्शे…शिलर… आदि ने मानव को हि एकमात्र सबकुछ माना पर यहाँ भी अहंवाद का जन्म हो गया और तत्वमीमांसा के कई प्रश्न अधुरे रह गये…।
    मैं तो शंकर के ब्रह्म को मानता हूँ जो सवर्था सबसे युक्ति संगत है… अविद्या के मिटते ही मैं और परमात्मा एक हो जाते हैं
    अहं ब्रह्मास्मि…॥

  11. अगर हम हैं, तो कोई ना कोई तो हमारा जन्मदाता होगा ही।इसी लिए मै मानता हूं…यदि आप नही मानते…तो इस से किसी को क्या फरक पड़ेगा?….यह बहस बहुत पुरानी है…जो जान लेते हैं वे मान लेते हैं …जो नही जान पाते…वह नही मानते..

  12. शास्त्रीजी,

    कक्षा १२ तक मेरी शिक्षा हिन्दी माध्यम से हुयी है । इसके बावजूद मैं अभी तक नास्तिक और आस्तिक के बीच में झूल रहा हूँ ।

    हिन्दू धर्म मुझे ईश्वर में अविश्वास/संदेह की आजादी देता है और इसमें कभी कभी मैं काफ़ी सुकून पाता हूँ ।

    ऐसे विषय तो विश्वास पर सधे हैं, आप स्वयं कुछ भी मानने के लिये स्वतन्त्र हैं । लेकिन इसमें अंग्रेजी शिक्षा पद्यति का दोष मुझे तो नजर नहीं आता । आप मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता इसलिये हर व्यक्ति जब तक ईश्वर के अस्तित्व को स्वयं महसूस न कर ले, अविश्वास की स्थिति कोई गलत बात तो नहीं है ।

    किसी प्रश्न के उत्तर में ये कहना कि ये ईश्वर कॄत है अथवा कहना “मुझे नहीं मालूम” मूलरूप में एक ही जबाव हैं ।

    इस विषय पर अपने विचार कभी सुलझे मन से रखने का प्रयास करूँगा ।

    और, मैं आपके भाँजे के अतिशीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना करता हूँ ।

  13. विज्ञान और धर्म का विरोध है इस तरह की धारणा पिछली शताब्दी में बनी थी तथा अज्ञानियों द्वारा फैलाई गई थी। अब भी कुछ लोग इसका जप करते मिल जाते हैं।

    आपने निम्न दो पँक्तियों में सारी बात कह दी है।

    सिर्फ वे ही लोग यह दावा करते हैं कि विज्ञान ने ईश्वर को नकार दिया है जिनका पाला न तो ईश्वर से पडा है न विज्ञान से.

  14. मुझे तो लगता है ईसवर को ना तो जाना जेया सकता है और ना ही ना जाना जा सकता है,मै तो भाई अग्येय्वादिओन [आग्नोयिज़म]
    के वर्ग मे हूं.
    तेहि जानही जेहि देहि जनाई जानही तुमहि तुमहि होई जाई [गोस्वामी तुलसीदास]
    अरविंद

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