छोटे लेखों का जादू

चिट्ठाकारी सफलता के मूल मंत्रों में से एक है 200 शब्द व एक चित्र. कई हिन्दी चिट्ठाकार 500 से लेकर 2000 शब्द के लेख पोस्ट करते है. यह एक बहुत बडी भूल है. चिट्ठा एक छपी पुस्तक नहीं है जिसे लोग फुरसत में, सफर के समय, या बिस्तर पर लेट कर पढ सकें.

Compअधिकतर लोगों के लिये चिट्ठा-पठन एक कठिन काम है जब वे ऑनलाईन जाकर अधिक से अधिक काम कम से कम समय में करने की कोशिश करते है. अत: जाने अनजाने वे लम्बे लेखों एवं लंबी कविताओं को या तो नजरअंदाज कर देते हैं या उनको सिर्फ सरसरी तौर पर देख लेते है. यदि किसी मित्र की रचना हो तो अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लियेअ एक सतही टिप्पणी भर दे देते है. इससे नुक्सान चिट्ठाकर का ही होता है क्योंकि वह तो लिख रहा है लोगों के मन को स्पर्श करने के लिये, लेकिन लेख उनकी आंखों से आगे नहीं जा पाता है.

अनुसंधानों से यह स्पष्ट हुआ है कि (अनुसंधान एवं रिपोर्ट आदि को छोड कर) किसी एक चिट्ठे पर लोगों के ऑनलाईन पढने की अधिकतम लंबाई 200 शब्द है. आपने देखा होगा कि सारथी के मुख्य लेख हमेशा इस सीमा में ही लिखे जाते है. कहानी, अनुसंधान-रपट आदि पर यह सीमा लागू नहीं होती, लेकिन कितने चिट्ठाकार हैं जो इस तरह के चिट्ठे चलाते है. अनुसंधानत्मक “शब्दों का सफर” देखिये कि वे अनुसंधानपरक लेखों को भी कैसे छोटा करके लिखते हैं. आप भी यदि अपने चिट्ठे को पठनीय बनाना चाहते हैं तो छोटे लेख का जादू अपनाईये: 200 से कम शब्द व एक चित्र. (3 से लेकर अधिकतम 5 पेराग्राफ)

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Author: Super_Admin

13 thoughts on “छोटे लेखों का जादू

  1. जी, प्रयास यही रहता है और करता रहूँगा मगर कई बार जरुरी बात इतने में पूरी नहीं हो पाती, इस वजह से माफी चाहता हूँ. कोशिश जारी है जरुर. 🙂

  2. शास्त्री जीं छोटे लेखों के बारे मे आप ने बड़े पते की बात की है और कहानी ऑर अनुसंधान रपटों को इस नियम के बाहर से रखा है.शुक्रिया ,एक अच्छे सुझाव के लिए ऑर इसलिए भी कि कहानी वाली समस्या जिस पर मैंने आपका ध्यानाकर्षण किया था आप ने याद रखी. अपनी बात को कम से कम शब्दों मे कह लेना एक कलात्मकता तो है ही व्यापक शब्द ज्ञान ,अध्ययन ,अनुभव ऑर विशेषज्ञता की मांग भी करता है.लेकिन मात्र लोगों को पढाने के संकुचित उद्देश्य से इस हुनर का प्रदर्शन शायद इस क्षमता की तौहीन है .भवभूति की भी पीडा यही थी कि उनके काल मे उनकी रचनाओं को समझने वाले कम थे लेकिन उन्होंने अपने रचना कर्म से समझौता नही किया -बस इतना भर कहा कि -उपत्स्य्ते कोपि समान धर्मा कालोवधि निरवधि विपुलांच पृथ्वी …..कभी तो कोई पैदा होगा जो मुझे समझ सकेगा ,काल निस्सीम है ऑर धरा असीम .आशय यह कि रचना की गुणवत्ता के साथ समझौता नही होना चाहिए, कोई पढे या न पढे ..ऑर कोई अधिकारी ऑर गुनग्राहक पढे तो ज्यादा समीचीन होगा ,बजाय इसके कि लोग उड़ती नज़र डाल दें ऑर चलताऊ टिप्पदी भर करदें .
    यह भी सही है कि अंतर्जाल पर हिन्दी मे न तो इतने गंभीर लेखन का फिलहाल कोई स्कोप है ऑर न ही ज्यादा गंभीर रचनाकार ऑर पाठक ही हैं जो बिहारी की सत्सैया के दोहरे जैसी रचना कर सके ऑर समझ सकें .फिर भी आपकी यह बात सोलहो आने सच है ऑर सर माथे कि बात को संक्षेप मे कहने का हूनर होना चाहिए -ब्रेविटी इज द सोल आफ विट…पुनश्च…मैं भी २०० तक की लक्ष्मण रेखा पर पहुँच रहा हूँ …शायद टिप्पणी की शब्द सीमा २० शब्द ही होनी चाहिए ..क्षमाप्रार्थी हूँ ……

  3. chote lekh hi ham sab padh paate hain, haan sameer bhai ke bade lekh bhi achhe lagte hain, par unhe apvaad mana ja sakta hai, aapki baat shat-pratishat sahi hai

  4. पेशे से उपदेश देने वाले हैं क्या ? तुरत-फ़ुरत-फौरी पढ़ाना लिखाना फैलायेंगे तब भी याद रखें कि जब बुनियादी प्रश्नों के संधान में लोग सर्च इन्जनों का इस्तेमाल करेंगे तो बड़े लेखों से भी सूचनाएँ मिलेंगी।

  5. जी कोशिश तो अपनी भी यही रहती है. लेकिन 200 शब्द तो बहुत कम हैं. चलिये कोशिश करके देखते हैं.

    हाँ समीर जी और फुरसतिया जी को अपवाद मान लिया जाये.

  6. बहुत सही सुझाव है। मै भी उन पाठकों में से हूँ जो बड़े लेखों को नहीं पढ़ पाता।

    बड़े लेखों के बारे में मेरा सुझाव है कि उनमें जितने अधिक हो सके उपशीर्षक डालें जाँय। बड़े-बड़े अनुच्छेदों के बजाय छोटे-छोटे अनुच्छेद रखे जाँय। महत्वपूर्ण बातों को ‘हाइलाइट’ किया जाय; आदि।

  7. जी पूरी तरह सहमत हूँ आपसे। कभी-कभार आवश्यक हो तो ही लम्बे लेख लिखना चाहिए। लम्बे लेखों की बजाय हो सके तो उन्हें कड़ियों में लिखना चाहिए। मैं भी लगातार कोशिश कर रहा हूँ कि लेख छोटे हों, पहले से काफी सुधार किया है। 🙂

  8. शुक्रिया शास्त्री जी ….आपकी बात से सौ फीसद सहमत हूं। बल्कि आज से कुछ महिने पहले जब मैं ब्लागिंग में नहीं आया था तब भी नारद के किसी मंच पर मैने ऐसी ही प्रतिक्रिया दी थी। इसके अलावा बड़े-बड़े आलेख, लंबी चर्चाएं, नितांत वैयक्तिक किस्म के संवाद जो कभी कभी तो एक ही शहर में रहने वाले कुछ लोग करते रहते हैं जिनके संदर्भ अचानक नज़र पड़ने पर किसी नए पाठक को समझ में भी नहीं आते हैं-ये कुछ ऐसे बिन्दू हैं जो हिन्दी ब्लागिंग में खटकते हैं।
    बहरहाल, अपने विषय की सार्थकता के साथ आपने शब्दों के सफर का संदर्भ दिया इसके लिए आभारी हूं।

  9. अरे भई जो जैसा लिखता है लिखने दीजिये। शुक्र मानिये कि वो लिख रहा है वो भी हिन्दी मे। ऐसी पाबन्दिया लगायेंगे तो आपके 2020 वाले आँकडे तक कैसे पहुँचेंगे? 🙂

  10. सही कहा- चिट्ठाकारी सफलता के मूल मंत्रों में से एक है 200 शब्द व एक चित्र. मेरे चिट्ठेमें शब्द तो इसी अनुपात में होते है, हां चित्रों का अपना मजा है, जो मैने अब तक आजमाया नही. पर क्या फिडसमें चित्रों का कोई महत्व रह पाता हैय़

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