विषयाधारित चिट्ठे या पूर्णविराम !

पिछले एक लेख में मैं ने लिखा था कि हरफन मौला चिट्ठों के बदले अब विषयों पर आधारित चिट्ठों की जरूरत है. कारण यह है कि कल के चिट्ठजगत-पाठक की रुचि आज के पाठक की रुचि से भिन्न होगी.

Symbol आज अधिकतर हिन्दी चिट्ठों को “आपसी वफादारी” के कारण पाठक मिल रहे हैं. विकास के इस पहले दौर में आपसी वफादारी द्वारा पाठक मिलना जरूरी भी है क्योंकि हर सिस्टम को आरंभ मे अपने आप को संभालना और निर्मित करना चाहिये. कुछ विकास के बाद ही इसे ‘बाहर’ से इतना समर्थन मिल पाता है कि एक स्वतंत्र इकाई के रूप में काम कर सके.

कल को जब चिट्ठों की संख्या 10,000 से ऊपर हो जायगी तो “आपसी वफादारी” की व्यवस्था चल नहीं पायगी. मेरा अनुमान है कि सन 2010 तक यह स्थिति आ जायगी. ऐसे एक जाल-समाज में वे ही चिट्ठे सही तरह से पनप सकेंगे जो अपनी अलग पहचान बना सकेंगे. पहचान बनाने के लिये यह जरूरी होगा कि हर चिट्ठे पर कोई न कोई विशिष्ट सामग्री उपलब्ध हो जो उसे एक पहचान दे और जो अनजान पाठकों को उस तक खीच कर लाये. हम दवाई, अन्न, स्टेशनरी, हार्डवेयर, कपडा, सब्जी, फल आदि लेने के लिये सिर्फ इन निर्देशित साधनों को बेचने वाली दुकानों में जाते हैं. ये दुकाने अपने आप जरुरतमंद को अपनी तरफ खीचती हैं. आप ऐसी दुकानों में नहीं जाते जहां आज दवा, कल दारू, और परसों जलाऊ लकडी बिकती है. यही हाल 2010 तक हिन्दी चिट्ठों का होगा. तब स्वांत: सुखाय लिखने वालों को मिलेंगे अधिकतम 50 पाठक प्रति दिन, एवं विषय-आधारित आधिकारिक चिट्ठों को मिलेंगे 5000 पाठक प्रति दिन. (परिपक्व अंग्रेजी चिट्ठाजगत में आज यह हो रहा है).

यदि आज आपके चिट्ठे की विषयवस्तु स्पष्ट नहीं है, एवं आप “मिलेजुले” लेख (मतलब, जो भी मन में आ गया) लिखते हों तो 2010 आपका वाटरलू होगा. बेहतर है कि आप अपनी “सेना” को उसके पहले ही हथियारों से लैस कर दें जिससे आप विजयी निकलें.

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Author: Super_Admin

11 thoughts on “विषयाधारित चिट्ठे या पूर्णविराम !

  1. बात सही है लेकिन अभी तो केवल लिखना ज्यादा महतपूर्ण है ना कि विषयाधारित लिखना.

  2. बात एकदम सही कही है आपने, आपसी वफादारी से चलने वाले चिट्ठे तब भी शायद आपसी वफादारी से ही चलेंगे। लेकिन भारतीयों की मानसिकता का पैमाना अगर मैं टेलीविजन या सिनेमा को मानू तो मुझे लगता है कि आप की बात खारीज करनी पड़ेगी या फिर २०१० की जगह पर मुझे २०९० पढ़ना चाहिये।

  3. टिप्पणी करने पर सीधे पोस्ट नही होती, अगर ऐसा है तो कुछ चिप्पी टाईप की दिखा दीजिये। टिप्पणी पोस्ट हो गयी है बाद में दिखायी जायेगी टाईप। पता ही नही चलता कि टिप्पणी वाकई में पोस्ट हुई है या नही।

  4. सही कह रहे हैं आप पर यह बात उनके लिए एकदम सटीक बैठती है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ ब्लॉगर हो!! यह मूल अंतर वाली बात है कि जो सिर्फ़ ब्लॉगर होगा वह इतना कुछ लिख सकेगा, अन्यथा रोजी रोटी और अन्य झमेले के बाद जैसा कि काकेश जी ने कहा लिखना बस महत्वपूर्ण रह जाता है!!

  5. यह बिलकुल सही रहा। हमेशा यही व्यक्त किया है। पूर्ण सहमत हूँ मैं, परंतु समय सीमा और भी कम होगी, क्या 2008 ही? और आपसी समझदारी न तो चिट्ठे की जीवन धारा बन सकती है और न ही इसे माना जाय। यह तो बस प्रारम्भिक अवस्था में उंगली पकड़ने के समान है। वाटरलू में तो रण-विद्या ही काम आयेगी। हाँ स्वांत: सुखाय हेतु लिखे जाने वाले चिट्ठों को कोई चिंता की आवश्यकता नहीँ।

  6. आपके विचार नि:संदेह सारगर्भित है , सोचने पर मजबूर कर दिया , मगर व्यक्ति यदि अपनी रूची का ध्यान न रखे तो सब अगड़म -बगड़म हो जाता है , आपके विचार सर आंखों पर, मगर अभी तो लिखना ज्यादा जरूरी है .

  7. बहुत सही लिखा है आपने…अब तो इस ओर भी ध्यान देना जरूरी हो गया है…सचेत करने के लिए धन्यवाद।

  8. शास्त्रीजी
    आपकी सलाह पहले ही मानकर मैंने राजनीति http://www.batangadpolitics.blogspot.com/ और उत्तर प्रदेश http://updiary.blogspot.com/ पर दो अन्य ब्लॉग शुरू कर दिए। लेकिन, अभी लगता है कि लिखना बहुत ही महत्वपूर्ण है। क्योंकि,हिंदी में अभी लिखा ही बहुत कम जा रहा है। फिर भी आपकी सलाह पर मैं काम कर रहा हूं।

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