मेरी पसंद के चिट्ठे 002

इस लेखन परंपरा में मैं बहुत से हिन्दी चिट्ठों का अवलोकन प्रस्तुत करूंगा, लेकिन इस लेख में मैं एक प्रश्न का जवाब देना चाहता हूँ. कई लोगों ने मुझ से पूछा है कि यदि मुझे सिर्फ एक चिट्ठा पढने की अनुमति दी जाये तो मैं किस चिट्ठे को चुनूंगा. मुझे दो बार सोचना नहीं पडेगा. मेरा उत्तर एकदम स्पष्ट है — ज्ञानदत्त पाण्डेय की मानसिक हलचल!!!

मेरे इस चुनाव के पीछे कई कारण है:

1. किसी भी परिवार में ऐसे लोगों की बहुत जरूरत होती है जो एक बडे भाई, एक नायक, या एक ताऊ का रोल अदा करे. हिन्दी चिट्ठाजगत आज जिस नवांकुरित स्थिति में है इसमें तो ऐसे लोगों की जरूरत और अधिक है.

2. ज्ञानदत्त जी एवं उनके लेख इस रोल को बखूबी अदा करते है.

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3.इतना ही नहीं, परिवार के युवा सदस्यों के लिये यह जरूरी है कि वे अपने से बडे लोगों के अनुभव को सुनें, सीखें, पूछे, यहां तक कि उन से वादविवाद भी कर सकें (आदर के साथ). ज्ञान जी एवं उनका चिट्ठा इन सब कार्यों को बखूबी निभाता है.

मेरी और ज्ञान जी की उमर लगभग एक है. इसके बावजूद मैं उनके चिट्ठे को ऐसे नजरिये से पढता हूँ जैसे किसी बडे भाई के कथन को सुन रहा हूँ. आम जीवन की घटनाये उनकी कलम से होकर गुजरती है तो बहुत सजीव हो जाती है. उन्हें पढकर मुझे अपने ग्वालियर के दिनों की तो बहुत याद आती है क्योंकि ग्वालियर एवं इलाहबाद में काफी सामाजिक समानतायें है.

इस लेख द्वारा ज्ञानदत्त पाण्डेय को मेरा प्रणाम, आभार !!

सारथी के मित्रों की प्रतिक्रियाये:

  • *** एकदम सही कहा शास्त्री जी आपने। ज्ञान जी के चिट्ठे पर जाने से वाकई ऐसा लगता है कि आप अपने से किसी बड़े के अनुभव से रूबरू हो रहे हैं। इससे अपने भी अनुभव में इजाफा होता है। बातें भी बड़ी संजीदगी से बोलचाल के अंदाज में पेश की जाती हैं। अनिल रघुराज 
  • *** प्रगतिशील, नारीवादी, धर्मनिरपेक्ष दिखने की ललक से दूर है पाण्डेजी का चिट्ठा. सही चूनाव. (होना एक बात है, दिखने की कोशिश करना अलग बात है) संजय बेंगाणी
  • *** सही जब्ब्बाब…. हम भी इस चिट्ठे के मुरीद है. जब पांडे जी नहीं लिखते तो उनसे पूछ्ते भी है कि क्यों नहीं लिखा भाया जी. अब बोलेंगे ताऊ जी लिक्खो क्यूं नहीं आज… kakesh
  • *** एकदम निरापद पसंद. पाण्डेय जी की रेलगाड़ी ने हिन्दी ब्लागरी को अच्छी गति दी है. नहीं तो कौन इस उम्र में नये शौक पालता है. sanjay tiwari
  • *** सहमत हैं । परिवार के संदर्भ में जो व्याख्या की है,एकदम सटीक है। अजित वडनेरकर
  • *** वाकई!! ज्ञान जी की पोस्ट एक दिन न दिखे तो मजा नही आता और उन्हें ई मेल करके पूछना पड़ता है कि क्या बात है किधर गायब/व्यस्त हैं। Sanjeet Tripathi
  • *** pakki baat,mai bhi is blog kaa mureed ho gaya hoonpakki baat,mai bhi is blog kaa mureed ho gaya hoon  arvind mishra
  • *** ज्ञान दत्त जी मेरे समझ से उन विरले व्यक्तित्व में से एक हैं जिनके भीतर समाहित है अनुभवों का ब्रह्माण्ड , हम सभी को उनके अनुभवों से फायदा उठाना चाहिए , वे नि:संदेह प्रशंसनीय और श्रधेय हैं ! आपका मूल्यांकन सुंदर और सारगर्भित है , बधाईयाँ ! रवीन्द्र प्रभात
  • *** बिल्‍कुल सही । मैं अपने मज़ाकिया अंदाज़ में ज्ञान जी के चिटठे को ज्ञान बिड़ी का केंद्र कहता हूं । संदर्भ ये है कि जबलपुर के अपने दिनों में हम अपने बुजुर्गो की बातों को ज्ञान केंद्र कहते थे फिर अपनी आवारगी में ज्ञान बिड़ी केंद्र कहने लगे । तो ज्ञान जी हमारे लिए ज्ञान बिड़ी केंद्र हैं । अनवरत चलने वाला एक सदाबहार और जरूरी केंद्र । सनद रहे कि हम सभी मित्र धूम्रपान नहीं करते थे, बल्कि ज्ञान का पान करते थे. yunus
  • *** बिलकुल सही चुनाव। ज्ञानदत्तजी के लेखन को देखकर कोई भी कह सकता है कि इस व्यक्ति ने उम्र और दुनिया देखी है। उनके लेखन में अत्यधिक विविधता है। अतुल शर्मा
  • *** ज्ञान जी के चिटठे को तो हम भी सर्वोत्तम श्रेणी में रखते हैं। मीनाक्षी
  • *** अफसरी के साथ ब्लॉगरी बहुत मुश्किल है। उस पर संजीदगी से तो बहुतै मुश्किल है। संजदगी के साथ स्माइली बहुत खूब औ सबके बाद इन सब पर निरंतरता, अद्भुत है ज्ञानजी। हर्षवर्धन
  • *** ज्ञान जी तो निस्संदेह सर्व श्रेष्ठ चिट्ठाकार  है। और जितनी विविधता उनके ब्लॉग मे मिलती है वो काबिले तारीफ है। mamta

 

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Author: Super_Admin

20 thoughts on “मेरी पसंद के चिट्ठे 002

  1. एकदम सही कहा शास्त्री जी आपने। ज्ञान जी के चिट्ठे पर जाने से वाकई ऐसा लगता है कि आप अपने से किसी बड़े के अनुभव से रूबरू हो रहे हैं। इससे अपने भी अनुभव में इजाफा होता है। बातें भी बड़ी संजीदगी से बोलचाल के अंदाज में पेश की जाती हैं।

  2. प्रगतिशील, नारीवादी, धर्मनिरपेक्ष दिखने की ललक से दूर है पाण्डेजी का चिट्ठा. सही चूनाव.

    (होना एक बात है, दिखने की कोशिश करना अलग बात है)

  3. हम भी इस चिट्ठे के मुरीद है. जब पांडे जी नहीं लिखते तो उनसे पूछ्ते भी है कि क्यों नहीं लिखा भाया जी. अब बोलेंगे ताऊ जी लिक्खो क्यूं नहीं आज…

  4. एकदम निरापद पसंद.
    पाण्डेय जी की रेलगाड़ी ने हिन्दी ब्लागरी को अच्छी गति दी है. नहीं तो कौन इस उम्र में नये शौक पालता है.

  5. वाकई!!
    ज्ञान जी की पोस्ट एक दिन न दिखे तो मजा नही आता और उन्हें ई मेल करके पूछना पड़ता है कि क्या बात है किधर गायब/व्यस्त हैं।

  6. यह तो मुझे स्पीचलेस कर दे रहे हैं आप! बहुत धन्यवाद आपने मुझे इतना योग्य माना। इस योग्य रहने के लिये मुझे बहुत मेहनत करनी होगी।

  7. @ज्ञान दत्त पाण्डेय
    आप “स्पीचलेस” हो गये ज्ञान जी, तो मुझ जैसे चिट्ठाकार के लिए पढने के लिये क्या रह जायगा ?

  8. ज्ञान दत्त जी मेरे समझ से उन विरले व्यक्तित्व में से एक हैं जिनके भीतर समाहित है अनुभवों का ब्रह्माण्ड , हम सभी को उनके अनुभवों से फायदा उठाना चाहिए , वे नि:संदेह प्रशंसनीय और श्रधेय हैं ! आपका मूल्यांकन सुंदर और सारगर्भित है , बधाईयाँ !

  9. बिल्‍कुल सही । मैं अपने मज़ाकिया अंदाज़ में ज्ञान जी के चिटठे को ज्ञान बिड़ी का केंद्र कहता हूं । संदर्भ ये है कि जबलपुर के अपने दिनों में हम अपने बुजुर्गो की बातों को ज्ञान केंद्र कहते थे फिर अपनी आवारगी में ज्ञान बिड़ी केंद्र कहने लगे । तो ज्ञान जी हमारे लिए ज्ञान बिड़ी केंद्र हैं । अनवरत चलने वाला एक सदाबहार और जरूरी केंद्र । सनद रहे कि हम सभी मित्र धूम्रपान नहीं करते थे, बल्कि ज्ञान का पान करते थे

  10. बिलकु सही चुनाव। ज्ञानदत्तजी के लेखन को देखकर कोई भी कह सकता है कि इस व्यक्ति ने उम्र और दुनिया देखी है। उनके लेखन में अत्यधिक विविधता है।

  11. बिना हल के चलने वाली
    इस हल चल का तो मैं
    पहले से ही कायल हूं.

    नाम रेल काम अनुभवों से मेल
    हमें पसन्द है ऐसी निराली जेल
    खेल खेल में खेल सिखाती रेल
    सेल में भी नही मिलती ऐसी गेल.

  12. ज्ञान जी के चिटठे को तो हम भी सर्वोत्तम श्रेणी में रखते हैं। http://uninagari.kaulonline.com इस लिंक के माध्यम से बहुत पहले लिखा करती थी। आज फिर से हिन्दी में टिप्पणी लिखने की कोशिश की तो सफलता मिल ही गई।
    अभी हम समय के हाथ में हैं, कभी समय हमारे हाथ में होगा तब हम ब्लॉग जगत में पूरी तरह से उतर आएँगें। अभी तो हम एक गहरी डुबकी लगा कर फिर किनारे हो गए ।

  13. अफसरी के साथ ब्लॉगरी बहुत मुश्किल है। उस पर संजीदगी से तो बहुतै मुश्किल है। संजदगी के साथ स्माइली बहुत खूब औ सबके बाद इन सब पर निरंतरता, अद्भुत है ज्ञानजी।

  14. ज्ञान जी तो निस्संदेह सर्व श्रेष्ठ चिट्ठाकार है। और जितनी विविधता उनके ब्लॉग मे मिलती है वो काबिले तारीफ है।

  15. हम आप के चुनाव से सहमत हैं , ज्ञान जी यकीनन ब्लोग जगत के नेता कहे जा सकते हैं

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