कर भला तो हो भला क्यो?

कल मैं ने कृपया लट्टू बंद कर दें!! में अनुरोध किया था कि मित्रगण अनावश्यक बिजलीपानी खर्च करने से बचें. यह सिर्फ हिमशैल का ऊपरी सिरा मात्र है. मेरा असली अनुरोध यह है कि वे हर अनावश्यक खर्च को कम करें. यदि बच्चे घर पर रफ कार्य के लिये पिछले साल की कापियों के पन्नों का उपयोग कर सकें तो ऐसा करने को प्रोत्साहित करें. यदि आसापास की दुकानों में पैदल जाकर पेट्रोल बचा सकें तो बचायें एवं स्वाथ्य लाभ भी करें. लेकिन सवाल है कि क्या मैनेआपने भलाई का ठेका ले रखा है जबकि ताकतवार लोग इस देश को लूटखसोट रहे हैं.

मेरे मित्रों की निम्न टिप्पणियां हमें सोचने को बाध्य करती हैं:

बिजली-पानी के बारें में तो हम तो पहले से ही जागरूक हैं मगर मेरे साथ रहने वाले कुछ मित्र कभी समझते नहीं है इन बातों को.. एक मित्र है जिसने कभी पानी की दिक्कतों का सामना नहीं किया है वो बस पानी का नल खुला छोड़कर कहीं भी चला जाता है.. सोचता है कि हमारे घर में 24 घंटे पानी आता है तो बरबादी कहां हो रही है.. उसे ज्यादा समझाता हूं तो उग्र हो उठाता है.. घर में टेंशन नहीं चाहता हूं सो ज्यादा कुछ नहीं कहता हूं.. उसे कैसे समझाऊं? कुछ उपाय बताईये.. Prashant Priyadarshi

मैं टिप्पणी तो करना नहीं चाह रहा था, किंतु कुछ न कहना भी बेईमानी में गिना जायेगा ।अतएव..1. अजी एक मुहिम चला कर 2000 यूनिट तक बचायी जा सकती है, पर बिल तो मनमाना ही आयेगा , फिर ? 2. हम सब द्वारा बचायी गयी बिज़ली का कितने खुल्लम-खुल्ला तरीके से विभाग  के कर्मचारी चोरी करवाते हैं कि वह चोरी कम डकैती ज़्यादा लगती है । आपके इस पोस्ट से असहमत होने का मैं कई कारण रखता हूँ । एक छोटा कारण तो यही है कि ‘ जब हर शाख पे ऊल्लू बैठा हो…उस बाग़-ए-चमन का क्या होगा अनाधिकृत घृष्टता की भी क्या कोई वज़ह हुआ करती है ? सो, मुझसे तो यहाँ हो ही गयी, यह ! डा.अमर कुमार

वाजिब ओर जायज चिंता है ….एक ओर बात बिजली चोरी ओर उन राज्नेतायो का भी समाधान ढूंढ़ना होगा जो अरसे से बिल दबाये बैठे है ,दूसरे उन hydil कर्मचारियों के बारे में भी सोचना पड़ेगा जो ….कितनी ही बिजली इस्तेमाल करे उन्हें बिल सिर्फ़ एक सीमित ही देना पड़ता है…..Dr anurag

मेरे तीनों मित्रों ने सही सही प्रश्न उठाया है, एवं यह स्पष्ट है कि और भी कई लोगों के मन में ये प्रश्न है. उन लोगों से सबसे पहले मैं एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ — सन 1800 से 1947 तक हिन्दुस्तान के सबसे शक्तिशाली तबके के लोग इस देश को अंग्रेजों की गुलामी में रखने के लिये हर तरह से अंग्रेजों की मदद कर रहे थे. क्रातिकारी लोगों को धोखे से पकडवा रहे थे. सविनय अवज्ञा आंदोलन करने वालों को जेलों में ठूसने के लिये अंग्रेजी शासन का साथ दे रहे थे. ऐसे मौकों पर यदि लोगों ने इस तरह सोचना शुरू किया होता तो हमारी आजादी का क्या होगा? जालियांवाला बाग में वहशी अंग्रेजों ने कमीनेपन की हद कर दी. यदि इसे देख  बाकी सारे देशवासी पीछे हट जाते तो क्या होता?

हर रचनात्मक आंदोलन एक व्यक्ति से शुरू होता है, और वह है मैं और आप. हर क्राति की आग एक व्यक्ति से शुरू होती है, और वह व्यक्ति हैं मैं और आप. यदि नीच, कमीने, एवं लुटेरे लोगों को देख कर मैं और आप पलायनवाद का सहारा लेंगे तो आग कैसे लगेगी, क्राति कैसे होगी. बिना वैचारिक क्रांति के देश में लुटेरों का राज कैसे बंद होगा.

जब मैं और आप पानीबिजली बचायेंगे, जब मैं और आप समय की कीमत पहचानेंगे, तब हम अपनी जिम्मेदारी के प्रति चेतेंगे. जब हम जिम्मेदारी के प्रति चेतेंगे तो हम अपने अधिकारों के बारें में जागृत हो जायेंगे. और जब वह हो जायगा तब क्रांति की आग इस तरह फैल जायगी कि लोग कानून एवं न्याय से डरेंगे.

पिछले 10,000 साल का इतिहास मेरे कथन का गवाह है. आईये रचनात्मकता के इस आंदोलन की शुरुआत मेरेआपके जीवन से करें जिससे हमारे नातीपोते एक सुरक्षित एवं सुभिक्ष भारत में जी सकें. सतयुग आ सकता है, कल, यदि आज मैं और आप पहल कर दे अपने जीवन में.

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Author: Super_Admin

9 thoughts on “कर भला तो हो भला क्यो?

  1. सही है जी….इंसान को दुनिया को बदलने की बजाय खुद को बदलना चाहिए.

    हालांकि इतने बड़े पैमाने पर फैली अव्‍यवस्‍था को देखकर कुछ लोगों का निराश हो जाना स्‍वा‍भाविक है. मैं भी कभी-कभार गुस्‍से में ऐसे ही प्रतिक्रिया करता हूं.

  2. शास्त्रीजी, कभी कभी घर में मोमबत्ती जलाते है तो एक अजब सी सुकून देने वाली खामोशी छा जाती है..धीरे धीरे आँखे उसी रोशनी मे देखने की अभयस्त हो जाती है…अक्सर याद आ जाता है किसी लेखक का एक कथन .. “अकेला दिया हूँ इस सदन का, मुझी से ही रोशनी होगी”…(ठीक से याद नहीं)
    आप सच कहते है अगर हम सब सोच लें कि पहल मुझे ही करनी है तो समाज को बदलने में देर नही लगेगी.

  3. हर रचनात्मक आंदोलन एक व्यक्ति से शुरू होता है,

    सही, बिल्कुल सही।
    और रचनात्मक आंदोलन फेल भी इसलिये होता है कि लोग उसे फेल करते हैं – मैं स्वतंत्रता आन्दोलन के बाद की लोगों की गैर जिम्मेदारी और जनतंत्र की असफलताओं की बात कर रहा हूं।

  4. काश पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का प्रश्‍न सबके लिए महत्‍वपूर्ण होता और हमें इस पर अलग से आग्रह नहीं करने होते तो कितना अच्‍दा होता.

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