नारी मुक्ति, 1960 आदि, एवं हकीकत

आज “नारी मुक्ति आंदोलन”  (विमन्स लिबरेशन) एक सुपरिचित वाक्यांश बन गया है. लेकिन इसका इतिहास बहुत कम लोग जानते हैं.

1960 आदि में, धनधान्य से भरपूर, हर ओर नौकरी की संभावना से भरपूर, हर चीज बहुत सस्ती कीमत पर उपलब्ध संयुक्त राज्य अमरीका ने कई नये एवं  सामाजिक-नैतिक सतह पर  भ्रष्ट  आंदोलनों को जन्म दिया. इनमें से हिप्पी आंदोलन से सब परिचित हैं. लेकिन परिवारनियोजन के लिये भूणहत्या, विवाहेतर यौन संबंधों को सामाजिक स्वीकृति, नारी मुक्ति आंदोलान आदि भी इसी युग के सडेगले अमरीकी दिमांग की देन है.

खाली दिमांग शैतान का घर होता है. इसी कारण अमरीका में जब सब कुछ अच्छा चल रहा था तब बहुत से खुराफाती दिमांगों ने इस कारण इन आंदोलनों को जन्म दिया. जब हम नारी मुक्ति आंदोलन का नाम सुनते हैं तो एकदम लगता है कि उसका लक्ष्य स्त्रियों को सामाजिकआर्थिक विषमता से छुडाना होगा. लेकिन मूल अमरीकी नारी मुक्ति आंदोलन का लक्ष्य यह नहीं था. असल लक्ष्य था विवाह,  परिवार, एवं इससे संबंधित सब कुछ तहसनहस करके स्त्रियों के यौनिक, वैवाहिक, एवं पारिवारिक जीवन में अराजकत्व पैदा करना था.

आज नारी मुक्ति का नारा लगाने वाले बहुत सारे लोग (सब नहीं) इस अमरीकी अराजकतावादियों का अंधानुकरण कर रहे हैं. अराजकत्व कभी भी आजादी नहीं देता है, बल्कि बचीखुची आजादी को खतम कर देता है. इस अराजकत्व का असर सब जगह हुआ. उदाहरण के लिए एक अराजकत्ववादी (मेरे स्टोप्स) के अनुयायियों ने भारत को करोडों रुपये दिये जिससे कि सारे भारत में भूणहत्या के केंद्र स्थापित किये जा सकें.

सारथी के कुछ मित्रों को मेरी स्टोप्स क्लिनिक नाम याद होगा. एक पाश्चिमी  अराजकत्ववादी महिला की संस्था के मार्फत जो करोडों रुपये हिन्दुस्तान आये उसका फायदा किसको मिला, क्या स्त्रियों को? क्या उनकी सामाजिक एवं आर्थिक विषमता कम हो गई? कदापि नहीं. बल्कि इन करोडों रुपयों का प्रयोग मुख्यत: दो तरीके से किया गया:

1. जवानों को व्यभिचार करने की आजादी मिल गई क्योंकि अब 100 रुपये में, एकदम गोपनीय तरीके से, बिना कोई प्रश्न पूछे “सफाई” करवाने की आजादी हो गई.

2. स्त्री भ्रूण की हत्या आसान हो गई. बिना किसी को बताये, 100 रुपये में मेडिकल-हत्या.

अमरीकी अराजकत्ववादी नारी मुक्ति आंदोलन ने कुल मिला कर हिन्दुस्तान को क्या दिया — एक जम कर व्यभिचार करने वाली युवा पीढी (क्योंकि अब गर्भ के बाद जन्म देने का सरदर्द खतम हो गया है) एवं भारत के लगभग हर प्रदेश में स्त्रियों की संख्या में कमी! यह किस तरह की नारी मुक्ति है, किस तरह उनकी सामाजिक विषमताओं को खतम करता है. यह तो उनको और अधिक बर्बाद कर रहा है.

असली नारीमुक्ति के लिये अराजकत्व नहीं बल्कि स्त्रीपुरूष के बीच जो सामाजिक एवं आर्थिक विषमता है उसे दूर करना होगा. इसके लिये अमरीकी कूडेकर्कट को फेंक कर, भारतीय समाज की जरूरतों पर आधारित, नारी मुक्ति आंदोलन कोई चालू करे तो ही काम होगा.

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Author: Super_Admin

5 thoughts on “नारी मुक्ति, 1960 आदि, एवं हकीकत

  1. naari ko jo log bandhan mae maantey haen aur rakhtey haen wahi ” naari mukti ” ki baat karegey . naari aazad haen aur azaad hee rhaegee . naari aur purush kae adhikaar saman haen aur samamn hee rahegae .
    aur samay 1960 sae 60 saal aagey aagayaa haen aaj naari kyaa chahtee haen aur kyaa kartee haen iskae liyae usko ek paripak umr kae baad kisi sae nahin puchchnaa haen . usko kyaa pehannaa haen kya khanaa haen uskae liyae kyaa sahii haen kyaa galat haen wo aaj samjhtee haen .
    bhartiyae samvidhaan nae naari ko baraabri kaa adhikaar diaya hae aur samay haen ki har koi is baat ko samjhey aur in baato par dicussion karey naa ki is par discussion ho ki naari kyaa pehnatee hae aur uskae sharee ka kaunsa anga kitna sunder hota haen aur kis ang sae purush ke kaamuktaa kitni badhtree haen

  2. नारी मुक्ति आंदोलन का इतिहास बताने का शुक्रिया। पर मुझे लगता है इन दिनों ब्लॉग जगह पर इस विषय पर कुछ जरूरत से ज्यादा लिखा जा रहा है।

  3. आप नारी मुक्ति आंदोलन के केवल मात्र एक छोटे से भाग का उल्लेख कर रहे हैं जो पथभ्रष्ट हो गया था। सारे नारी मुक्ति आंदोलन को उस नजरिए से देखना उस आंदोलन के साथ घोर अन्याय है।

    नारी मुक्ति का उद्घोष 19वीं शताब्दी में ही हो चुका था।
    किसी भी आंदोलन का मुख्य उद्देश्य यथास्थिति को परिवर्तित कर समाज को आगे ले जाना हो तो वह एक प्रगतिशील कदम कहा जाता है। हर प्रगतिशील कदम का विरोध होता है। और वे तमाम ताकतें जिन के निजाम को इस से खतरा होता है वे इन आंदोलनों में सेंध लगा कर इन्हें पथभ्रष्ट करने का प्रयत्न भी करती हैं। यह नारी मुक्ति आंदोलन के साथ भी हुआ है। इसी सेंध के फलस्वरूप जो दृश्य उपस्थित हुआ जो वह नारी मुक्ति आंदोलन के लिए भी घातक था अब नष्ट प्रायः है। उस का उल्लेख आज नारी मुक्ति आंदोलन के साथ करना वास्तव में इस आंदोलन को बदनाम करना है।

    नारी मनुष्य समाज का एक अहम हिस्सा है। यह समाज उस के बिना एक कदम भी नहीं चल सकता है। पुरुष और नारी मनुष्य समाज के दो पैर या गाड़ी की कल्पना करें तो दो पहिए हैं। इन के कर्तव्य और अधिकार बराबर हैं। एक को कम मह्त्व देने से समाज लंगड़ा ही रहेगा, जो किसी हद तक है भी। एक पहिया छोटा होने पर गाड़ी आगे जाने के बजाय गोल गोल ही घूमती रहेगी एक ही स्थान पर। यही यथास्थितिवाद है। एक स्थान पर पानी रुकता है तो वह सड़ने लगता है।

  4. मैं यह फिर कहूंगा और कहता ही जाउंगा कि हम बासी कढी में उबाल लाने की कोशिश कर रहे हैं और औचित्यहीन मुद्दों पर समय जाया कर रहे हैं.देश का क़ानून तो सभी को मान्य है पर हम विषाक्तता ,विषमता और वैमनष्य का वातावरण बना कुछ हासिल नहीं कर पायेंगे अपितु बहुत कुछ खोते जायेंगे –

  5. Dear Madam,

    I have come across a family where in the husband has badly hit the wife black and blue. The girl doesn’t want to return to her husband as she believes he might also kill her. She has a daughter, 5 years old. Now the wife is at her mother’s house. What action do we take in order to not to create any publicity but still punish the husband of that girl. Please advise.

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