कृपया अखबार न पढें !!

सारथी पर कई बार प्रश्न बॉक्स में एक प्रश्न आया है — मैं लोगों के नाम, चेहरे, जगहों के नाम आदि भूल जाता हूँ. सबसे बडी मुसीबत है कि मैं किसी भी किताब को पढ कर याद नहीं रख पाता. क्या करूँ.

उत्तर है कि ऐसा करने के लिये अपने दिमांग को आप ही ट्रेनिंग दे रहे हैं, मजबूर कर रहे हैं,  अत: किसी और को या किसी "याददाश्त की कमी" को दोष देने से कोई फायदा नहीं है. मामला स्पष्ट करने के लिये कुछ प्रश्न पूछता हूँ:

  1. आप रोज अखबार पढते है. क्या आप बता सकेंगे कि कल और परसों की मुख्य खबरें क्या थीं. दूसरे स्तर की खबरें क्या थीं?
  2. कल और परसों तीसरे पन्ने के सबसे ऊपर की खबरें क्या थीं?

आप में से अधिकतर लोग पूछेंगे कि यह भी कोई याद रखने की बात है क्या. अखबार तो सिर्फ आज की खबरों को जानने के लिये पढा जाता है, इनको चार दिन बाद तक याद रखने की क्या तुक है. इस प्रश्न में मेरा उत्तर छुपा हुआ है.

आप रोज घंटों अखबार ऐसी चीजों के लिये पढते हैं को कल भूल जाना है. दूसरे शब्दों में कहा जाये तो रोज आप अपने दिमांग को ट्रेनिंग दे रहे हैं "पढे को भूल जाओ जनाब". अब सवाल यह है कि आपका दिमांग जब इस तरह की ट्रेनिंग पा रहा है तो आप उससे न भूलने को क्यों कह रहे हैं.

बचपन में बच्चों को अक्षरमाला, शब्दार्थ, वाक्य रचना,  संख्या, पहाडा, आदि सिखाये जाते हैं. ये भूलने के लिये नहीं बल्कि आजीवन याद रखने के लिये उनको पढाया जाता है. फलस्वरूप आपकी स्मरणशक्ति विकसित होती है. वह हर चीज को याद रखने की आदत डालती है.

लेकिन परिपक्व हो जाने के बाद आप दिमांग को उलटी ट्रेनिंग देते है. इस कारण आपको नाम, चेहरे, स्थान आदि याद नहीं रह्ते.

आप कहेंगे कि अखबार पढे बिना तो रहा नहीं जा सकता है. सही है. लेकिन इतना ख्याल रखें कि घंटों अखबार, टीवी सीरियल आदि (जिनको भुला देना है) उनको देखने की आदत न पालें. पढने देखने के लिये अधिकतर वे चीजें चुनें जिनको याद रखना है जैसे एतिहासिक जानकारी, वैज्ञानिक जानकारी.  धीरे धीरे आप को पढीदेखी बातें याद करने में पुन: आसानी जो जायगी.

दिनेशराय द्विवेदी जी जैसे किसी वकील से पूछ कर देखें कि वे किस तरह टनों जानकारी याद रखते हैं. मुझ से पूछें (विवरण कल के लेख में दूँगा). डॉ अरविंद मिश्रा से पूछ कर देखें कि किस तरह से वैज्ञानिक जानकारी उनके यादगार में रहती है.  उन लोगों से पूछें जिनको बहुत कुछ याद रखना पडता है. उत्तर कुछ इस प्रकार होगा कि भईया जिस चीज को आप ज्यादा फेरोगे, वह आपकी यदगार में अधिक जम जायगा!

एक महत्वपूर्ण टिप्पणी: (Panchayatnama)

शास्त्री जी, आपने बहुत ही सम-सामयिक प्रश्न उठाया है और उसका बहुत ही सलीके से जबाब भी समझाने की कोशिश की है. काश  की लोग इसे पढ़े और शिक्षा लें. मैंने भी सिर्फ़ इसका बुरा प्रभाव ही देखा है. और कई साल हो गए.. मैंने कभी न्यूज़ पेपर नहीं पढ़ा. बड़ी शांती मिलती है. मैंने भी एक बार अपने एक दोस्त को समझाया.. देख यार, ये पेपर पढने के बजाय अगर तू रोज एक घंटे कोई किताब पढ़ ले तो तेरे को ज्यादा फायदा होगा.

न्यूज़ पेपर सिर्फ़ नेगेटिव समाचारों को खूब प्रमुखता से छापते हैं. उनको पढ़ के हमारा दिमाग भी नेगेटिव प्रोग्राम हो जाता है..
आख़िर हम अपने दिमाग को क्यों रोज टॉर्चर करें, सुबह सुबह उठते ही, खून – खराबे , हताशा, निराशा से भरी हुई एक से एक ख़बरों को पढने के लिए अपने दिमाग को क्यों मजबूर करें… जीने के और भी बेहतर तरीके हैं… काश लोग समझ पाते.. आपका आभार….

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Author: Super_Admin

21 thoughts on “कृपया अखबार न पढें !!

  1. आपकी शैली विषयवस्तु को जमा देती है – शायद अभिव्यंजना शैली. ‘Robert Lynd’ का एक निबंध पढा था Forgetting’. लगभग उसी शैली, और उसी प्रवाह में लिखा गया लेख.वैसे स्मृति और विस्मृति नैसर्गिक प्रक्रियाएं है- ट्रेनिंग से इतर. हाँ यह सच है – “जिस चीज को आप ज्यादा फेरोगे, वह आपकी यादगार में अधिक जम जायगा!”- “अनाभ्यासे विषम विद्या”.

  2. गिरना है एक दिन तो आकाश क्यों चढ़ें।
    गर भूलना है सब कुछ अखबार क्यों पढ़ें।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    http://www.manoramsuman.blogspot.com

  3. शास्त्री जी ,मस्तिष्क की कार्यपद्धति अभी भी अनेक अनसुलझे रहस्यों को समेटे हुए है -जो समकालीन मस्तिष्क अनुसन्धान के विषय बने हुए हैं .मैं अभी साईंटिफिक अमेरिकन ( भारतीय संकरण )का ताजा अंक (नवम्बर ०८) पढ़ रहा हूँ जिसमें इस विषय पर बहुत ही रोचक और आखे खोल देने वाली सामग्री ‘प्लगिंग इनटू द ब्रेन ‘ शीर्षक से प्रकाशित हुयी है -याददाश्त को सजोने संभालने में हिप्पोकैम्पस सरंचना की भूमिका है और वैज्ञानिक इसमें सीधे हस्तक्षेप कर चिप ट्रांसप्लांट और रिमोट सञ्चालन की मिली जुली जुगतों से कई कारनामों को अंजाम देने वाले हैं -जैसे आप के सोने के दौरान ही पूरी पूरी बाईबिल और /या उपनिषद आपके स्मृति बैंक में समाहित हो उठेगा ! तब लोग सचमुच त्रिकालदर्शी हो उठेंगे -ऋतम्भरा प्रज्ञा से युक्त .अभी तो हमें केवल काम की जानकारी ही याद रहती है जिसे हमारा मस्तिष्क जीवनयापन के लिए बहुत जरूरी मानता है -हम अभी भी अपने मस्तिष्क के गुलाम हैं -मस्तिष्क की दासता से देखिये अपने ज्ञान जी कितने त्रस्त रहते हैं और उनका मस्तिष्क धीरे धीरे कम से कम मुझे भी अपनी दासता की गिरफ्त में लेता जा रहा है -हमें इस दासता से मुक्ति चाहिए !

  4. जहां तक मेरा मानना है , लोग जो भी याद रखना चाहते हें , वह याद रह ही जाता है। जिसे वे महत्‍वपूर्ण नहीं समझते , वे ही बात वे भूल जाते हैं।

  5. मानव शरीर में मशतिष्क ही एक ऐसा अंग है जिसके बारे में हम पूर्ण रूपेण समझ नहीं पाए हैं. परंतु यह हम समझ चुके हैं कि इसे प्रशिक्षित किया जा सकता है, चाहे भूलने के लिए ही हो. अँग्रेज़ी में कहावत है “इग्नोरेंस ब्लिसफुल”

  6. यदि मस्तिष्क को सुप्त रखा जाए तो भूलने की आदत बढ़ जाती है . मस्तिष्क में एक एसा तंत्र भी होता है जहाँ सभी बातें रिकार्ड रहती है बस जरुरत है उन्हें जाग्रत करने की . बहुत शानदार अभिव्यक्ति के लिए आभार.

  7. शास्त्री जी, आपने बहुत ही सम-सामयिक प्रश्न उठाया है और उसका बहुत ही सलीके से जबाब भी समझाने की कोशिश की है. काश की लोग इसे पढ़े और शिक्षा लें.

    मैंने भी सिर्फ़ इसका बुरा प्रभाव ही देखा है. और कई साल हो गए.. मैंने कभी न्यूज़ पेपर नहीं पढ़ा. बड़ी शांती मिलती है. मैंने भी एक बार अपने एक दोस्त को समझाया.. देख यार, ये पेपर पढने के बजाय अगर तू रोज एक घंटे कोई किताब पढ़ ले तो तेरे को ज्यादा फायदा होगा.

    न्यूज़ पेपर सिर्फ़ नेगेटिव समाचारों को खूब प्रमुखता से छापते हैं. उनको पढ़ के हमारा दिमाग भी नेगेटिव प्रोग्राम हो जाता है..

    आख़िर हम अपने दिमाग को क्यों रोज टॉर्चर करें, सुबह सुबह उठते ही, खून – खराबे , हताशा, निराशा से भरी हुई एक से एक ख़बरों को पढने के लिए अपने दिमाग को क्यों मजबूर करें…

    जीने के और भी बेहतर तरीके हैं… काश लोग समझ पाते.. आपका आभार….

  8. आप कहेंगे कि अखबार पढे बिना तो रहा नहीं जा सकता है. सही है. लेकिन इतना ख्याल रखें कि घंटों अखबार, टीवी सीरियल आदि (जिनको भुला देना है) उनको देखने की आदत न पालें. पढने देखने के लिये अधिकतर वे चीजें चुनें जिनको याद रखना है जैसे एतिहासिक जानकारी, वैज्ञानिक जानकारी. धीरे धीरे आप को पढीदेखी बातें याद करने में पुन: आसानी जो जायगी.

    ” kuch kuch yhee problem maire stah bhee hai, magar upper likhe lines ne shayad maire problem ka smmadhan kr diya hai, apka bhut bhut shukriya..”

    Regards

  9. @Panchayatnama

    टिप्पणी के लिये आभार !! मुझे आपकी टिप्पणी इतनी महत्वपूर्ण लगी
    कि आपके नाम से उसे आलेख के अंत मे जोड दिया है.

  10. बहुत बढिया लेख लिखा है । दिमाग का गणित भुगोल कुछ कुछ समझ मे आरहा है । जनउपयोगी लेख के लिए आभार ।

  11. सही बात है, इसी कारण मैं सिर्फ़ सम्पादकीय और खेल पेज और मुख्य-पृष्ठ की खबरें और स्थानीय खबरें ही पढता हूँ. ( अब बचा ही क्या 🙂 )

  12. शास्त्रीजी, लेख अच्छा है.. लेकिन ऐसा कहकर तो आप हम अख़बार वालों को बेरोज़गार ही कर देंगे.. हा हा हा 🙂

  13. आपने बहुत काम की बात बताई है ! मैं रोज १२/१३ अखबार आधे घंटे में निपटा देता हूँ ! सिर्फ़ उनके व्यापार वाले पेज पर सरसरी नजर डालकर ! फ्रंट पेज अवोइड करता हूँ ! कोई बोक्स न्यूज सरसरी नजर में आगई तो देख लेता हूँ ! पर भूलने की आदत अब कुछ समय से महसूस कर रहा हूँ ! डाक्टर्स को भी बताया पर उनका कहना है की अटेनलोल ( हाई ब्लड प्रशर के लिए ली जाने वाली दवा ) के लंबे समय से लिए जाने का असर है ! क्या सच है ? भगवान जाने ! शुभकामनाएं !

  14. अखबार के लिए मैं केवल १० या १५ मिनट आरक्षित करता हूँ।
    सुबह सुबह coffee के साथ अखबार के पन्नों पर एक नज़र फ़ेर लेता हूँ।
    यदि कोई सनसनी खबर हो तो उसे पढ़ता हूँ
    लेकिन ज्यादातर समय, कॉफ़ी से पहले अखबार में छपे तथाकथित “खबर” को निपटा लेता हूँ।
    आजकल अखबार में कौनसी नई खबर पढ़ने को मिलती है?
    विज्ञापन छपने के बाद जो स्थान बचता है, उसे में छपे खबर तो पिछली रात को टी वी पर सुन चुके होते हैं।

    हाँ comic strips और cartoon अवश्य देखता हूँ।

    स्मरण शक्ति मेरी तो selective है।
    जो मुझे भूलना चाहिए, उन्हें मैं भुला नहीं पाता।
    गाँठ बाँधने योग्य बातों को याद रख नहीं पाता।

    व्यवसाय संबन्धी मामलों में मैं कोई risk नहीं लेता।
    मेरे पास जेब में एक छोटी सी pocket diary होती है जिसे मैं हमेंशा अपने पास रखकर घूमता हूँ। महत्वपूर्ण बातों को इस diary में नोट कर लेता हूँ।
    ये मेरी बहुत पुरानी आदत है। बाद में इस diary से चुन चुनकर सूचना और विवरण फ़ुरसत मिलने पर अपने कंप्यूटर पर transfer कर लेता हूँ।
    यह फ़ाईल समय समय पर अपने आप को ही ई मेल द्वारा भेजता रहता हूँ ताकि मेरे पास यह सूचना हर समय, हर स्थान पर उपलब्ध रहता है और यह सूचना खोने का डर नहीं रहता।

  15. मनोविज्ञान कहता है की कोई भी देखी सुनी बात हमारे अचेतन मन में हमेशा के लिए छप जाती है किसे चाह कर भी नही मिटाया जा सकता है. बात सिर्फ़ उसे वापस लाने की होती है यानी रिकाल करने की हमारा मष्तिष्क हर एक चीज़ को रिकॉर्ड करता है यदि एकाग्रता से पढ़ा, देखा, सुना जाए तो उसे याद रखना काफ़ी आसान होता है. हाँ अखबार ना पढने की नसीहत आपकी काफ़ी जानदार है. धन्यवाद.

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