अध्यापक या जल्लाद ?

उन्नीससौ अस्सी के दशक का आरंभ! ग्वालियर शहर! शांत जीवन, आवागमन एवं जीवनयापन की अच्छी सुविधा. एक नगर जहां बहुत सारे लोग आपस में एक दूसरे को जानते पहचानते हैं.

हमारे घर के पास का एक विद्यालय. ठंडा का मौसम.  एक शनिवार तीसरी या चौथी कक्षा की एक बालिका घर नहीं पहुंची. मांबाप ने सारा रास्ता ढूंढ मारा. बच्ची का कोई पता नहीं था. प्रधानाचार्या एवं अन्य शिक्षकों के पूछताछ की गई. किसी को कोई पता नहीं. किसी ने उसे नहीं देखा.  पुलीस में रिपोर्ट करवा दी गई. सारा शहर उस बच्ची को ढूंढने में लग गया. इतवार और सोमवार को भी यह क्रम चला क्यों कि सोमवार को विद्यालयों की छुट्टी थी.

मंगलवार को एकदम सुबह बाईयों ने एक एक करके कमरों में झाडू लगाना शुरू किया तो एक कमरे की दीवार नीचे से लेकर लगभग 3 या 4 फुट तक पेंसिल से एक ही बात लिखी हुई थी — "मिस जी मुझे माफ कर दीजिये. आगे से मैं अपना होमवर्क जरूर करके ले आऊंगी". बाईयों को बहुत ताज्जुब हुआ, लेकिन अचानक उनकी घिग्गी बंध गई जब बच्ची के शव को कमरे के एक किनारे ठंड के मारे अकडे पडे देखा.

चपरासी दौडाये गये. मांबाप, पुलिस, अध्यापक सब दौडते दौडते चले आये. कक्षा में घुसते और यह सब देखते ही एक अध्यापिका बेहोश होकर गिर पडी.

शनिवार को उस बच्ची को सजा के रूप में उन्होंने एक खाली कक्षा में बंद कर दिया था. छुट्टी तक सब कुछ भूल गई और वह घर चली गई. चपरासियों ने बंद कमरा देखा तो उसे बंद करके वे भी चले गये. किसी को उस कमरे में बंद, डर से थरथराते, ठंड से ठिठुरते बच्ची के बारें में पता नहीं चला.

यह लगभग 28 साल पहले की घटना है जब अध्यापकों के कुछ तो आदर्श थे. लेकिन इसके बावजूद क्रोध में आपा भूलकर एक अध्यापिका ने जो किया वह जीवन भर कई लोगों के लिये दुख का कारण बन गया.

पिछले दो दिनों से अध्यापकों के बारें में मैं ने जो लिखा उसकी काफी अच्छी प्रतिक्रियायें आईं. लेकिन कुछ लोगों ने मेरे आलेखों को बहुत हल्के से लिया. अनूप शुक्ल ने तो पहले आलेख के बारे मे टिपिया दिया कि "आपका शीर्षक जबरियन सनसनीखेज बनाने की कोशिश है- हमेशा की तरह!". उनको शायद अनुमान नहीं था कि पहला आलेख पढ कर कुछ जल्दी प्रतिक्रिया कर गये. लेकिन उम्मीद हैं कि इस आलेख को पढ कर वे वापस टिपिया जायेंगे कि "शीर्षक ही नहीं, आलेख भी सनसनीखेज है — हमेशा की तरह".

मैं जब आठवीं में पढता था तब से मैं ने ट्यूशन करना शुरू किया. इसके बाद तो औपचारिक और अनौपचारिक रूप से आज तक अध्यापन करता आया हूं.

इस क्षेत्र में मैं ने जो कुछ देखा उस पृष्ठभूमि में अध्यापकों से बहुत सारी बातें कहनी हैं. अभी सिर्फ तीन आलेख आये हैं, लेकिन कम से कम तीन सौ के लिये विषय बचे हुए हैं.

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Author: Super_Admin

22 thoughts on “अध्यापक या जल्लाद ?

  1. बच्चों से तो बच्चो जैसी संवेदना और सहजता का बर्ताव होना चाहिये ! और ऐसे ही लोग अध्यापक के पेशे में आए जो संवेदनशील और दयार्द्र हों !

  2. शास्त्रीजी, आपके लगभग हर लेख के शीर्षक सनसनीखेज होते हैं। यह मैं हल्के में नहीं कह रहा हूं पूरी गंभीरता से कह रहा हूं। अगर आप कहें तो कुछ आपके कुछ लेख और उनके कथ्य के उदाहरण भी कभी पेश कर सकता हूं। लेकिन आपका लिखने का अंदाज है जैसे मन आये लिखें आपने स्वयं इसे अपने एक लेख में स्वीकार किया है कि जानबूझकर आप ऐसा करते हैं।

  3. श्रीमान शास्त्रीजी पहले सनसनी से पाठक(दर्शक) मिलते होन्गे लेकिन वर्तमान में तो,सभी समझदार हो गये है । आपका लेख क्रूर अध्यापको को आइना दिखा रहा है।

  4. फुरसतिया चच्चा की बात सही है, आपके लेखों के शीर्षक पूरी तरह से भीड़ बटोरू होते हैं और आलेख में वह आग नहीं होती पर वे निराशाजनक भी नहीं होते.
    सबसे बड़ी आश्चर्य की बात है कि हम सभी आप से जुड़े रहते हैं चाहे वह प्रशंसा के रूप में हो या विरोधी टिप्पणी के रूप में.
    ऐसा इसलिए क्योंकि सारथी पर हम सार्थक चिंतन करने के साथ-साथ एक सही “सारथी” नेता भी पाते हैं, कभी-कभी जिसे ग़लत कह हम सब अपनी भडास भी निकाल पाते हैं और शास्त्री जी का आदर भी करते हैं. शास्त्री जी कभी अकड़ते नहीं हैं और बच्चे के साथ बच्चा और बड़े के साथ बड़ा बन जाते हैं. अतः हर कोई उनसे जुडाव महसूस करता है. 🙂
    वैचारिक धरातल पर हम अलग हो सकते हैं परन्तु हम सब का मसीहा एक शास्त्री है.
    आप से मैं लड़-सकता हूँ, झगड़ सकता हूँ, अकड़ भी सकता हूँ पर आप के बिना कैसे रह सकता हूँ.
    शास्त्री जी आप निर्विवाद रूप से हमारे नेता हैं.

  5. शायद इसलिए कहते है..”think twice b 4 you act”..

    ऐसे कई किस्से अक्सर अखबारों में आते रहते है.. अध्यापक यदि संवेदनशील न हो तो आपकी जिन्दगी पर भी भारी पड़ सकता है….

    यही रवैया रहा तो शायद स्कुलों के बाहर वैधानिक चेतावनी लगानी पड़े 🙂

  6. वैसे एक बात कहना चाहुंगा कि आपने जिस काल की घटना का जिक्र किया है आप उस समय से जैसे जैसे पीछे की तरफ़ जायेंगे तब आप पायेंगे कि अध्यापकों द्वारा छात्रों को शारीरिक प्रताडना का स्तर काफ़ी बढता हुआ मिलेगा ! और जैसे जैसे आप आगे आते जायेंगे इसमे उतरोतर कमी आती दिखाई देगी !

    शायद आपके आने वाले लेखों मे इस बारे मे भी कुछ विशलेषण मिलेगा !

    राम राम !

  7. आलेख के लिये धन्यवाद.आपका लेख क्रूर अध्यापको को आइना दिखा रहा है।

  8. बहुत दुखद घटना …पढ़ कर उस बच्ची के लिए जाने कितनी दया भावना और पीडा उतर आई मन मे…इस तरह की सजा ??????

    regards

  9. हाँ, ये दु:खद घटना है और ऐसे corporal punishments के सख़्त ख़िलाफ़ हूँ मैं भी। किसी बच्चे को मानसिक तौर पर भी हमें अपमान करने का हक़ नहीं है। मगर हर तस्वीर के दो पहलु होते हैं, इस तरह के अध्यापकओं को जहाँ माफ़ नहीं किया जा सकता वहीं अनुशासन के पक्के मगर बच्चों के सही मायनों में मार्गदर्शक शिक्षकों की भी कमी नहीं है, मैं उन को नमन करती हूँ और उन शिक्षकों/शिक्षिकाओं के साथ आपके अनुभव/आलेख भी पढ़ना चाहूँगी, इस ३०० लेखों मॆं positive भी ज़रूर मिला होगा आपको लिखने को मुझे आशा है।

  10. गुरुदेव को नमन।
    क्या प्रस्तुत लेख एक सामायिक चिन्तन से युक्त उदेश्य पुर्ण लगा ? हमारा भी विकृतियो से दम घुटता है। ओर वही लेखक जिसके हृदय मे आदमी आदमी के लिये प्यार है:॰ छटपटाने लगता है। मैने शास्त्रीजी के जब बिखरे हुए के तीनो विचारो को देखा तो ऐसा लगा कि एक ऐसा साहित्यकार जिसकी प्रेरणाये समाज व राष्ट्र को कुच्छ दे सकती है। कोयले की खान मे कोहनुर हीरे कि तरह छीपा है। शायद शास्त्री जी के उपरोक्त लेखो मे दर्द छिपा रखा है। ओर मुझे उनके इस दर्द से मोहब्बत है।

    अध्यापक ने दिया धोका-
    लिखा किया समझा किया? –
    अध्यापक या जल्लाद ?
    पहले मे आपक्र द्वारा अध्यापको को नैनिकता की पाठ पढाने की कोशिस हुई।
    दुसरे मे आपने आध्यापको के प्रति नैतिक बने रहने कि दुहाई देने लगे।
    और आज स्वम नैतिकता का झोला पहन गुरुदेव चल पडे शिक्षको कि वाट लगाने।

    लोग कन्फीयुज confuse हो गये आपके अलग अलग statment से। पाठक पहले दिन कि टीपणी मे शिक्षक को बुरा कहते है, दुसरे दिन कि टिपणी मे अपने आपको बचाते हुऐ शिक्षको के पक्ष मे बोलते है और वो ही पाठक अपने आप को आज टिपणी के लायक नही समझ पा रहा है। क्यो कि शास्त्री जी ने जो शतरज बिछाया उस पिझडे मे बडे बडे टिपियाकार तडफते नजर आ रहे है।

    क्यो कि बेचारे टिप्णीकारो मे भी तो नैतिकता बाकी है की, एक ही सवाल पर तिन अलग अलग जवाब कैसे दे ?

    आज क्या टिपियाते है?

    E-Guru Rajeev -“शास्त्रीजी आप निर्विवाद रूप से हमारे नेता हैं.”

    ranjan-“शायद इसलिए कहते है..”think twice b 4 you act”..

    ताऊ रामपुरिया-“बहुत दुखद !शायद आपके आने वाले लेखों मे इस बारे मे भी कुछ विशलेषण मिलेगा !

    Prashant (PD-E-guru se sahmati..

    मानोशी-” इस ३०० लेखों मॆं positive भी ज़रूर मिला होगा आपको लिखने को मुझे आशा है।

    बाकी पडे ३०० लेखो के लिये क्या ? आपके विचारो कि happy endig हो ऐसी मे उम्मीद करता हू। happy endig नही तो समझो कि अभी फिल्म बाकी है;

    क्षमा गुरुदेव। क्या करु आखिर शिष्य आपका ही हु।
    (गलती से मेरी यह टीपणी पहले वाले आलेख पर चली गई चुकी उपरिक्त टीपणी इसकेलिए थी. उसे मिटा दे)

  11. बहुत ही हृदय विदारक घटना का उल्लेख किया है। बच्चों के साथ जो भी सख्ती की जाती है वह बच्चों के निर्माण के लिए होती है। उन के जीवन से खेलने के लिए नहीं। पर कुछ लोग इसे कभी नहीं समझेंगे। अनेक तो माता-पिता भी नहीं।

  12. न चाहते हुए भी फ़िर ऐ-गुरु राजीव और अनूप जी कि टिप्पणी से सहमति व्यक्त कर रहा हूँ!!!!

    आपके 300 लेखो का इन्तेजार करने का साहस भी है!!!!!

    फ़िर कहता हूँ कि अध्यापक को समाज से अलग समझना एक बड़ी निरर्थक पहल है!!!!!

    फ़िर उस आदर्श के आदमी को कितना आदर्शवादी माहौल मिलता है , यह भी विचारणीय है?????

    आप कहानी ३००!! सुनाये या 600 !!!

    पर प्रयास यही करें कि इन दर्दनाक हादसों को आम कहानी के रूप में प्रेषित करने कि कोशिशों से बचा जाना चाहिए!!!!

  13. यह घटना लम्‍बे समय तक अखबारों और समारोहों के सार्वजनिक उद्बबोधनों में छाई रही थी । अत्‍यधिक पीडादायक प्रसंग था वह । उसे एक बार फिर पढ कर रोंगेटे खडे हो गए । ईश्‍वर ऐसे अध्‍यापक किसी को न दे ।

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