मेरे दोस्त का बच्चा हिजडा निकला !!

image लैंगिक विकलांगों पर मैं ने अभी तक जो कुछ लिखा है उन में टिपियाये गये प्रश्नों के उत्तर मैं अगले आलेख में दूँगा. मेरा अनुरोध है कि तब तक पाठकगण एवं विकलांग मित्र सबर के साथ इंतजार करें!

दो दशाब्दी पहले की बात है, बडे भोर को अचानक मेरे एक मित्र का दूरभाष आया कि वह भारी मुसीबत में है अत: मैं तुरंत अस्पताल पहुंचूँ. गिरते पडते वहां पहुंचा तो रोनी सूरत लेकर वह बाहर खडा हुआ था. पूछा तो बताया कि सुबह चार बजे पत्नी का प्रसव हो गया लेकिन बच्चा न नर है न मादा क्योंकि पुरष-स्त्री दोनों लिंग बच्चे के शरीर में  मौजूद है.

मेरे लिये यह पहली जानकारी नहीं थी इस कारण मैं ने उससे कहा कि वह तुरंत ही रेलगाडी से बच्चाजच्चा को लेकर पास के ही एक शहर के सर्जन से मुलाकात करे. उसने ऐसा ही किया. इधर मैं ने सब को खबर दे दी कि बच्चे की कुछ गंभीर समस्या के कारण उसे बडे अस्पताल ले जाना पडा है. उस अस्पताल में जनीतक जांच से पता चला कि वह बच्चा एक लडकी है. सर्जन ने मांबाप को आश्वस्त किया और बच्ची को खिलाने के लिए एक दवा दे दी.

डाक्टर का निर्देश यह था कि दस साल की उमर तक बिना किसी को पता लगे उसका पालनपोषण  करें, दवा देते रहें, और उसके बाद उसकी शल्यक्रिया कर दी जायगी. उस युवा परिवार ने ऐसा ही किया. दवा देते रहे, बच्चे की विकलांगता हरेक से छुपा कर रखी, और  उसे हर तरह से ट्रेनिंग दी कि वह किस तरह से अपनी विकलांगता को छुपा कर रखे. उसे कभी भी हीनभावना से ग्रस्त न होने दिया.

समय आने पर शल्यक्रिया से लिंग को (जो दवा के असर से लगभग सूख सा गया था) हटा दिया गया. तब कहीं मांबाप की जान में जान आई कि अब बच्ची एक लडकी के रूप में चैन की जिंदगी बिता सकती है. वह लडकी असामान्य बुद्धि और हिम्मत की धनी थी एवं आज हिन्दुस्तान के एक कोने में एक उन्नत स्थान पर जी रही है.

आज हिन्दुस्तान में जितने हिजडे हैं, उन में से अधिकतर (1000 में से 990 या अधिक)  इस तरह की जनीतक-गलतियों के मारे हुए हैं. जीन्स के हिसाब से वे या तो पुरुष हैं या स्त्री हैं लेकिन पैदाईश के समय वे जननांगों में विकलांग निकले. समय पर उनको वैज्ञानिक/डाक्टरी मदद न मिल पाई, बल्कि उनके मांबाप ने “लोकलाज” के कारण उनको “फेंक देना” उचित समझा. इस कारण उनको उठा ले जाकर हिजडों ने पाला. वहां वे पल गये, लेकिन पढाई लिखाई न हो पाई, नौकरी पर कोई रखता नहीं है, अत: हिजडों के बीच जो चलन है (पैसा मांगना)  उसी पर चल कर वे जीने की कोशिश कर रहे हैं. इसका सारा दोष सिर्फ उनको देना उनकी दूसरी हत्या है  — पहली हत्या मांबाप नें उनको त्यागने के द्वारा की, दूसरी हत्या मैं और आप अपनी क्रूर और संवेदनाहीन बोली द्वारा करते हैं.

यदि समाज किसी समूह से उस का हर मौलिक अधिकार (शिक्षादीक्षा, घरबार, नौकरी के अवसर) छीन ले, हर चीज उनके लिये वर्जित कर दे, अनको सीधे रास्ते से न तो राशनकार्ड दे, न पासपोर्ट दे, न डाईविंग लाईसेंस दे, बल्कि उनको भूखा और नंगा छोड दें,  और उसके बाद उन पर दोष लगाये कि वे पैसे के लिये छीनाझपटी करते हैं तो दोष समाज का है न कि लैंगिक विकलांगों का. इस नजरिये से वास्तविकता को देखपहचान कर हमें लैगिक विकलांगों के सशक्तीकरण के लिये कार्य करना चाहिये.

हिजडों को घिन से, नीची नजर से, तुच्छ नजर से देखना आसान है. उनके लिये कुछ करना कठिन है.  यदि अभी भी आप सारा दोष लैंगिक विकलांगों पर थोपना चाहते हैं तो युवा सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) का एक वाक्य याद दिलाना चाहता हूँ कि “किसी से उसका जीवन छीनने वाले व्यक्ति से बडा वह होता जो उसे जीवनदान देता है”.

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Photograph by audreyjm529

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Author: Super_Admin

27 thoughts on “मेरे दोस्त का बच्चा हिजडा निकला !!

  1. आप से पूरी तरह से सहमत। जिस देश में स्थिति यह हो कि स्वयं का जीवन चलाना भी बोझ हो वहाँ बच्चे की लैंगिक विकलांगता की चिकित्सा करा पाना कितने लोगों के लिए संभव है? सब से बड़ी बीमारी देश में रोजगार की अनुपलब्धता है। जिस से सारी बीमारियाँ अंततः जुड़ जाती हैं।

  2. नानाजी सच तो ये है कि जब आपका लिखा हुआ पढ़ती हूं और उस पर कोई असहज टिप्पणी आती है तो चीख-चीख कर रोने का मन करता है लेकिन पिताजी व आप के प्रेम ने इतनी ताकत दे दी है कि मैं भिड़ जाती हूं,माफ़ी चाहती हूं इस व्यवहार के लिये लेकिन आप दोनो मेरे ऐसे स्वभाव का कारण जानते हैं कि मेरे साथ कैसा क्रूरतापूर्ण व्यवहार हुआ है परिवार द्वारा,रिश्तेदारों द्वारा और समाज द्वारा तो ऐसे में जब जहां मौका मिलता है अंदर की पीड़ा गुस्से के रूप में बाहर आने लगती है क्योंकि आंसू के रूप में तो बहुत निकल चुकी अब रोना बंद कर चुकी हूं। नियमित ध्यान(मेडीटेशन)करती हूं ताकि गुस्से पर लगाम लग सके, पुनः क्षमा प्रार्थना सहित
    आपकी बिटिया भूमिका रूपेश

  3. दुःख होता है की बिना किसी अपराध के इन हिजडों को समाज से अलग थलग रहने की सजा मिली है….ये आज तक मुख्य धारा में शामिल नहीं हो सके हैं!और तो और सरकार ने भी इनके उत्थान के लिए आज तक कोई योजना नहीं चलायी है…..काश ये भी हम आपकी तरह पढ़ लिख सके, अपनी पसंद का रोजगार चुन सकें…..

  4. भूमिका रुपेश जी की पीडा ह्रदय विदारणीय है. मुझे लगता है की चर्चा एकदम सही दिशा में जा रही है और आशा है कि कुछ ठोस परिणाम और निर्णायक परिवर्तन भी देखने को मिलेंगे. बस कुछ लोग कमर कस लें और बाकी लोग अपना नजरिया बदले.. दिनेश राय जी की बात का कोई व्यवहारिक हल निकलता नहीं दिखता है. अगर ऐसे दुर्भाग्यशाली बच्चों को सरकारी अस्पतालों से कुछ मदद मिल सके तो बहुत बेहतर होगा. जैसे ऐड्स के मरीजो की जानकारी गुप्त रखी जाती है, इन बच्चों की जानकारी भी गुप्त रखी जा सकती है जिससे इलाज पूरा होने तक इन बच्चो को सम्मान और प्यार से कोई वंचित न कर सके. ऐसे बच्चों के लिए अलग से स्कूल आदि खोलने के सुझाव बेहद दीर्घकालिक हैं.. आगामी पीढी के लिए भले ही संघर्ष सीढ़ी की एक पायदान कम हो जाए पर अपने जीते जी आज के बच्चे मुझे नहीं लगता कि टोकरी और फूलदान बनाने के अलावा कुछ और सीख पायेंगे.

  5. सच में बिल्‍कुल ही सत्‍य लिखा है आपने दोषी और कोई नहीं हम हैं हम सब यह समाज और समाजिक लोग जो इस तरह से करते हें बाकी एक नहीं तीन जिंदगीयों को आपने भी सुख प्रदान किया हे उनको एक बेहद अच्‍छी सलाह देकर

  6. बहुत अच्छी जानकारी आपने दी है. इस विषय पर डॉ. अनुसूया त्यागी का एक उपन्यास भी आ चुका है : ‘मैं भी औरत हूं’. इसमें बड़े क़रीने से इस समस्या को उठाया गया है और समाधान भी दिया गया है. आपकी बात को अधिकाधिक प्रसारित किए जाने की ज़रूरत है, ताकि लोगों को ऐसी मुश्किलों के प्रति सही दृष्टि और उनसे निपटने के उपाय भी मिल सकें.

  7. अब हमें इन लैंगिक विकलांगों के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण को सुधारने के लिए ठोस प्रयास करना चाहिए। इस लेखमाला की बातों की चर्चा अपने आस-पास के लोगों के बीच करनी चाहिए। यदि कोई लैंगिक विकलांग ट्रेन बस या बाजार में छेड़छाड़ का शिकार बनता है तो वहाँ यथासम्भव सद्‍भावना का परिचय देते हुए उनकी रक्षा करनी चाहिए। किसी एक अल्पवयस्क लैंगिक विकलांग को चुनकर शिक्षित करने के लिए आर्थिक सहयोग व समर्थन करना चाहिए। हमारा छोटा-छोटा प्रयास जुड़कर इस समाज के लिए एक बड़ा परिवर्तन ला सकता है।

  8. अगर लोगो का अपना पेट नही भरता तो बच्चे ही क्यो करते है, अगर बच्चा राजी खुशी हो, लडका, या लडकी तो रख लेगे, लेकिन ऎसा बच्चा होने पर मजबुरी ? क्यो? मुझे नही अच्छा लगता ऎसा समाज .यह हमारे ही बच्चे है इन के आंसू पोछॊ, इन्हे भी उस भगवान ने ही बनाया है, इन के भी दिल है, यह भी इंसान है, उस भगवान के बनाये खिलोनो को प्यार करो.
    शास्त्री जी बहुत ही अच्छा लगा आप का यह क्रम.
    धन्यवाद

  9. यश सर, आप सही कह रहे है। लैगिक भेद करने वालो को एक तरह से मै कुन्ठाग्रस्त या अनपढ व्यक्ति समझता हु। बल्कि मै तो उनके लिऐ प्रयुक्त होने वाले सम्बोधन “हिजडा” को भी विशेषाअल्न्कार को भी उपयुक्त नही मानता। ग्रामीण ईलाको मे इस तरह के जन्मे व्यक्ति मे कोई भेद भाव नही होता है ना ही उनको कोई विशेष श्रृणी मे रखा जाता है । वो भी सभी घर परिवारो मे आते जाते है । ना कोई उन से मुह फैरता है।

    वो अपनी सामान्य जिन्दगी को यापित करते है। किन्तु शहरो मे ७० और ८० के दशक मे फिल्मो के माध्यम से उनके लैंगिक विकलांगो का जागरण हुआ जो फिल्मी पर्दे वालो ने महज चन्द रुपयो के खातिर इस व्यक्तित्त्व को समाज परीवार से अलग कर दिया । चुकी इस तरह के शारीरिक भिन्नता के मामले इससे पुर्व के दशको मे ज्यादा ही हुआ करते थे पर घर परिवार उसे कुदरत का फैसला मान कर चलते थे।

    उस समय चिकित्सा व्यवस्था इसके इलाज के लिऐ तैयार नही थी या लोगो मे सजगता कि कमी होगी, कुल मिलाकर वो समय फिर भी मानव्यमुल्यो, सवेदनाओ के लिऐ भला था।

    किन्तु आज इस तरह के व्यक्तित्त्व का जन्म तो होता होगा पर जिवन भर उस व्यक्तित्त्व के साथ रहने कि कोई कारण नही, क्यो कि आधुनिक चिकित्सा मे इसका इलाज सम्भव है महज ३०- ५० हजार के खरचे मे उपरोक्त लैंगिक विकलांगता से निपटा जा सकता है।

    दुसरा पहलु शहरो मे इसे पेशे के रुप मे अपनाया जा रहा है जो जन्म से हिजडे नही है पर कर्म से कुछ लोग भेष को अपना रखा है जो इन्सानियत के साथ फुहड मजाक है। क्यो कि ऐसे लोगो के वर्ताव से लोगो के मन मे उन वास्तविक लैंगिक विकलांगो के साथ अलगाव पैदा हुआ।

    मै आपके इस नजरिए से पुर्ण रुप से सहमत हु – “लैंगिक विकलांगों का. इस नजरिये से वास्तविकता को देखपहचान कर हमें लैगिक विकलांगों के सशक्तीकरण के लिये कार्य करना चाहिये.”

  10. यश सर, आप सही कह रहे है। लैगिक भेद करने वालो को एक तरह से मै कुन्ठाग्रस्त या अनपढ व्यक्ति समझता हु। बल्कि मै तो उनके लिऐ प्रयुक्त होने वाले सम्बोधन “हिजडा” को भी विशेषाअल्न्कार को भी उपयुक्त नही मानता। ग्रामीण ईलाको मे इस तरह के जन्मे व्यक्ति मे कोई भेद भाव नही होता है ना ही उनको कोई विशेष श्रृणी मे रखा जाता है । वो भी सभी घर परिवारो मे आते जाते है । ना कोई उन से मुह फैरता है।

    वो अपनी सामान्य जिन्दगी को यापित करते है। किन्तु शहरो मे ७० और ८० के दशक मे फिल्मो के माध्यम से उनके लैंगिक विकलांगो का जागरण हुआ जो फिल्मी पर्दे वालो ने महज चन्द रुपयो के खातिर इस व्यक्तित्त्व को समाज परीवार से अलग कर दिया । चुकी इस तरह के शारीरिक भिन्नता के मामले इससे पुर्व के दशको मे ज्यादा ही हुआ करते थे पर घर परिवार उसे कुदरत का फैसला मान कर चलते थे।

    उस समय चिकित्सा व्यवस्था इसके इलाज के लिऐ तैयार नही थी या लोगो मे सजगता कि कमी होगी, कुल मिलाकर वो समय फिर भी मानव्यमुल्यो, सवेदनाओ के लिऐ भला था।

    किन्तु आज इस तरह के व्यक्तित्त्व का जन्म तो होता होगा पर जिवन भर उस व्यक्तित्त्व के साथ रहने कि कोई कारण नही, क्यो कि आधुनिक चिकित्सा मे इसका इलाज सम्भव है महज ३०- ५० हजार के खरचे मे उपरोक्त लैंगिक विकलांगता से निपटा जा सकता है।

    दुसरा पहलु शहरो मे इसे पेशे के रुप मे अपनाया जा रहा है जो जन्म से हिजडे नही है पर कर्म से कुछ लोग भेष को अपना रखा है जो इन्सानियत के साथ फुहड मजाक है। क्यो कि ऐसे लोगो के वर्ताव से लोगो के मन मे उन वास्तविक लैंगिक विकलांगो के साथ अलगाव पैदा हुआ।

    मै आपके इस नजरिए से पुर्ण रुप से सहमत हु – “लैंगिक विकलांगों का. इस नजरिये से वास्तविकता को देखपहचान कर हमें लैगिक विकलांगों के सशक्तीकरण के लिये कार्य करना चाहिये.”
    मेरे ब्लोग एवम हमारा परिवार

  11. मैं आपके आलेखों को बड़े ध्यान और चाव से पढ़ती हूँ चाहे टिप्पणी करूँ या नहीं | मैंने इन चिट्ठों को ब्लोग्भारती में लिंक किया है, इंतजार किया श्रंखला के ख़तम होने तक | 🙂

    यहाँ http://www.blogbharti.com/cuckoo/society/eunuchism-our-perception/

  12. आपने एक विचारणीय मुद्दे कि ओर ध्यान दिलाया है । धन्यवाद इसके लिये ।

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