खस: किसी ने सुना है क्या?

इसी तरह लुप्त होती एक चीज है खस का अत्तर. इसका एक तोला आप 25 रुपये से 1000 रुपये तक का खरीद सकते हैं. इसे भी शरीर पर सुबह लगाने पर शाम तक लोग पूछते रहते हैं कि यह भीनी भीनी सुगंध कहां से आ रही है. दो तोला खस साल भर काम आ जाता है.

खस का अत्तर लगाने वालो को सकून देता है, मानसिक तौर पर ठंडाई की अनुभूति देता है, और मन को स्वस्थ रहता है. इसके मनोवैज्ञानिक कारण हैं, लेकिन शायद औषधि स्तर पर भी कई कारक हैं. अफसोस यह है कि कद्रदानों के अभाव में खास का अच्छा अच्छा अत्तर लगभग लुप्त सा हो गया है.

अच्छे किस्म का अत्तर खस के अच्छे गुणों वाले जडों से बनाया जाता है और उसको हलके चंदन या गुलाब के अत्तर का पुट दिया जाता है. इससे अत्तर का तीखापन कम होकर भीना भीना सा गंध देने लगता है. अत्तर अच्छी किस्म का हो तो आप के आसपास के लोगों को यह महक दिन भर मिलती रहेगी जबको आप को अगले स्नान के समय तक यह महक मिलती रहेगी.

मेरा सुझाव है कि मेरे पाठकों में से जो लोग भारतीय चीजों के कद्रदान हैं वे कम से कम एक बार अपने शहर के किसी अच्छे अत्तार से एक तोला खस की उम्दा किस्म का अत्तर खरीदें और प्रयोग करें. बस स्नान करने के बाद बहुत ही हल्के से अपने छाती, गर्दन, और हाथों पर लगा लें. अत्तर की कम से कम मात्रा का प्रयोग पर्याप्त रहता है.

अधुनिक तकनीकी ने एक से एक उत्तर सुंगंधद्रव्य बनाये हैं. उनसे मेरा न तो कोई विरोध है, न ही परहेज. लेकिन उनकी सुंगंध में हमें उन देशी अत्तरों को नजरअंदाज नहीं कर देना चाहिये जिनके गंध को कोई भी अभी तक खतम नहीं कर सका है. इनका उपयोग स्वास्थ्य के लिये अच्छा होगा, और देशी उद्योगों को बल भी मिलेगा.

 

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Author: Super_Admin

25 thoughts on “खस: किसी ने सुना है क्या?

  1. I AM USING IT, I STILL REMEMBERS WE USE TO COVER THE OPEN SPACE OF OUR RESIDENCE BY THE ‘TATA OF KHUS ‘ AND THE AIR COMING THROUGH THAT ‘KHAS TATA ‘ IS FABULOUS.

  2. बहुत सी पुरानी चीजें लुप्त होती जा रही हैं। वस्त्रों को ही लीजिए, साड़ी, सलवार-कमीज, धोती, आदि जीन्स-टीशर्ट की बाढ़ में बहती जा रही हैं। कितने ही लाखों लोगों की रोजी-रोटी इन देशी वस्त्रों से जुड़ी हैं। लोग नई जीवन-शैलियां अपनाते जा रहे हैं, और पुरानी जीवन-शैली से जुड़ी कई चीजें इसी कारण से लुप्त हो रही हैं। इसे पलटना तभी संभव होगा जब हम पुरानी जीवन-शैलियों को न छोड़ें। पर क्या ऐसा करना आसान है?

  3. आज आपने खस की बात की. हम अपनी कहानी सुनाते हैं.

    गर्मियों मे हमने घर मे एक कूलर जी लगा रखे हैं घर के मुख्य हाल में. जिनकी ड्युटी है जब तक बिलजी आये तब तक चलते रहना. उनसे निकली हवा सभी कमरो से गुजरती हुई निकलती है. यह व्यवस्था पिछले २८ साल से इन्ही कूलर महाराज के जिम्मे है.

    इतने सालों मे ना तो ये बीमार हुये ना ही बुढे होने को तैयार. वैसे इनकी खुराक का बजट अच्छा है सो इनका स्वास्थ्य मेंटेन रहता है.

    हमने एक मित्र के कहने पर एक बार गर्मियों मे खस का अतर खरीद लिया…जरा सा इनमे डाल दिया…सारा घर महक ऊठा…आने जाने वाले भी हैरान..की यह खुशबू कहां से आरही है?

    वर्षों से यह सिलसिला चलता रहा…फ़िर इसकी जगह पिछले सालों से सिंथेटिक खस ने ले ली…ओरिजिनल मिलना बंद होगया..

    पर कूलर जी का काम सिंथेटिक से भी चलता रहा..इस साल दुकानदार बोला..साहब केमिकल बहुत महंगा हो गया है सो अबकि बार मैने भाव देखते हुये माल बुलवाया ही नही है..आप तो यह कूलर का सेंट है यह लेजाओ..यकीन मानिये उस मे बिल्कुल भी दम नही है..

    तो इस बार की गर्मियां बिना खस ही बीत रही हैं और युं भी अब ए.सी. मे कौन सा खस लगना है उसको तो लेवेंडर चाहिये और वो भी बिलायती.

    रामराम.

  4. Synthetic fragrances बनाने वालों के लिए आपकी जानकारी अच्छी खबर नहीं है 🙂

  5. पिछले हफ्ते हम लोग चांदनी चौक दिल्ली के बल्लीमारान से खस और मोतिया का इत्र लाये हैं और अपनी गाड़ी और घर मे इस्तेमाल कर रहै हैं। वाकई देशी इत्रों का कोई मुकाबला नही है।

    मनीषा

  6. शहरों में प्राकृतिक खस खोज पाना जरा मुश्किल काम है. यहाँ तो शीशियों में भरा हरा केमिकल ही मिलता है. आइसक्रीम, शर्बत, बर्फ के गोले आदि में तो झमाझम खपत होती है इसकी. बाकी असली नकली तो राम ही राखे.
    वैसे बात चल निकली है तो केवडे के बारे में भी बताइयेगा. हमारे यहाँ तो आज भी शादी बरातों में मेहमानों पर केवडा छिड़कने की परंपरा चल रही है.

  7. शास्त्री जी यह खस का इत्र क्या हम तो खस की ट्टटियो के भी शोकीन थे, पहले कुलर मे इन खस खस की टट्टिययां ही लगती थी, ओर खस खस खाने के काम भी आती है, लेकिन अब हम भारतीया मांड्रन बन गये है, इस लिये इन सब अच्छी बातो से दुर हो गये है, शायद आप को जान कर हेरानगी होगी कि अब यह खस खस विदेशो मै बहुत प्रसिद हो रही है.
    धन्यवाद

  8. क्या इसी ‘ खस ‘को खस खस का शरबत बनाए में इस्तमाल किया जाता है?
    इतर तो यहाँ भी लोग-बाग पसंद करते हैं.लेकिन अगर यह ठंडाई और खाने में में डाले जाने वाला खस है तो जानकारी के लिए बता दूँ कि यू.ऐ.ई में यह एक प्रतिबंधित पदार्थ है.अनजाने में भी अगर लाया गया है तो भी एअरपोर्ट पकडे जाने की पूरी सम्भावना है.

  9. @राज भाटिया

    वाह भाटिया जी, आप वापस आ गए!! आपकी कमी बहुत अधिक अखर गई — जैसे चाचा की कमी अखरती है.

    सस्नेह — शास्त्री

  10. खस के इत्र के हम भी शौकीन हैं, और हम तो खास कन्नौज (उप्र) का बना हुआ मंगाते हैं…

  11. यहां खस और खसखस को लेकर कुछ कंफ़्युजन हो गया लगता है. सु अल्पनाजी और राज भाटिया जी की टिपणी से मुझे कुछ ऐसा आभास हो रहा है. मैं अपनी समझ से कुछ बिंदु स्पष्ट करना चाहुंगा..अगर उपयुक्त समझे तो जानकारी सुधार लें.:)

    १. खस : यह एक घास का प्रकार है जिसकी पहले गर्मी के मौसम में टाटिया कूलर मे और खिडकियों मे लगाई जाती थी.

    २. इसी खस की घास का अतर निकलता है जिसकी चर्चा आज की पोस्ट मे शाश्त्री जी ने की है.

    ३. जो खस का शर्बत बनता है उसमे यही सुगंध डलती है जिसे खस का शर्बत कहा जाता है.

    ४. अब आते हैं खस खस की तरफ़. जिसका जिक्र खाने के लिये भाटिया जी ने किया है..और शायद सु अल्पनाजी ने भी इसको ही प्रतिबंधित होने की बात कही है. इस विषय मे हमारा निवेदन है कि :-

    अ. खस और खस खस दोनों ही अलग चीजे हैं. खस खस खाने के काम आती है. इसका अंग्रेजी नाम poppyseed है. और यह अफ़ीम के पौधे का बीज है.

    ब. यह बहुत बारीक बारीक राजगीरा के दाने से जैसा होता है. आजकल काफ़ी महंगा होगया. यह सब्जी की ग्रेवी बनाने के काम ज्यादा आता है.
    ठंडाई मे मगज के साथ इसको भी प्रयोग किया जाता है. और इसमे नशा बिल्कुल भी नही होता.

    स. अफ़ीम की खेती सरकारी परमिट पर मालवा क्षेत्र के नीमच मंदसौर मे काफ़ी होती है. और सटे हुये राजस्थान प्रांत के रामगंज मंडी..भवानी मंडी क्षेत्र मे भी बहुतायत से होती है.

    द. चुंकि यह हमारे नजदीकी क्षेत्र मे उगाई जाती है अत: जब अफ़ीम का पौधा छोटा होता है तब इसकी पतियां डंठल सहित जो कि बिल्कुल सरसों की भाजी जैसी होती है, वह बाजार मे बिकने आती है और हम उसे बडे आनंद पुर्वक खाते हैं . चिंता ना करें उसमे नशा नही होता बल्कि फ़ायदे मंद होती है. और बडी ही स्वादिष्ट होती है.

    इ. अब अफ़ीम का पौधा जब बडा होगया तब उसमे धतूरे के आकार के डोडे आजाते हैं तब उनमे चीरा लगा दिया जाता है. उसमे से जो दुध जैसा पदार्थ निकल कर इकठ्ठा होता है, वह अफ़ीम होती है. और उसके उपर का खोल होता है उसे डोडा या अम्ल कहते हैं.

    अफ़ीम तो सरकारी खजाने मे जमा हो जाती है और यह जो उपरी खोल होता है यह नशा करने वाले लोग काम मे लेते हैं. इसे ही अम्ल करना या अम्ल का नशा करना कहा जाता है जो कि सामाजिक प्रतिष्ठा और वफ़ादारी का प्रतीक भी होता है. इसी अम्ल के नशे मे हमारे केंद्रिय मंत्री जसवंत सिंह भी दो चार हो चुके हैं . यानि उन्हे सामाजिक रुप से अम्ल कराने का मुकदमा झेलना पडा था.:)

    और इसके अंदर जो बीज निकलते है वही खस खस या poppyseed है. जिसमे बिल्कुल नशा नही होता.

    इसी पोप्पी सीड का एक फ़ार्मुला एक देहाती ने हमको बताया था आंधाशीशी के दर्द के लिये . जिसको सेवन करके ताई आज तक आंधाशिशी ( आधे सर मे दर्द) के दर्द से मुक्त है.

    कि्सी को जरुरत हो तो संपर्क करें.

    शायद पाठकों को अब सारी बाते स्पष्ट हो गई होंगी?

    रामराम.

  12. बहुत बहुत धन्यवाद ताऊ जी ,
    जो इतने अच्छे तरीके से ‘खस ‘और ‘खस खस’ में अंतर समझा दिया.

  13. आप आजकल बहुत महक रहे हैं:)
    हम तो सिर्फ खस का सिंथेटिक अत्तर ही इस्तेमाल करते हैं जब कूलर से गंध आने लगती है. असली(?) अत्तर भी देखा हुआ है लेकिन उसकी सुगंध इतनी तीखी होती हैं कि क्या बताएं. भीनी सुगंध तो नहीं आई. कहीं वो नकली तो नहीं था? नकली चीज़ें ज्यादा चमकीली और तीखी होती हैं.
    खस कि टट्टी के बारे में आजकल लोग भूलते जा रहे हैं. उन्हें मेरे दादाजी खिड़की-दरवाजों पर टांगकर बार-बार उनपर पानी उलीचते थे. बड़ी अच्छी सुगन्धित हवा आती थी उनसे. लेकिन उन्हें खस कि ‘टट्टी’ क्यों कहते थे?

  14. एक हॉलैंड की कंपनी हुआ करती थी. “naarden” इनका भारत में भी कार्यालय और लैब था. एक बार उनके लैब में गए. वहां एक जार पर लिखा था सरईपाली खस. हमें बताया गया की वहां की खस सबसे अच्छी होती है.पिछले साल ही हमारी बोतल ख़त्म हुई. मुफ्त का माल था. अब वह कंपनी बंद हो गयी है.

  15. इत्रोँ का मुझे भी बहुत शौक है –
    मित्टी का इत्र कैसे बनता है ?
    मुझे मित्टी के इत्र की खुश्बु भी पसँद है
    – लावण्या

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