इतना तो हर कोई कर सकता है!!

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मेरे पाठकों में हर कोई चाहे तो एक हफ्ते में आधा घंटा घर बैठे ही  देशसेवा के लिये निकाल सकता है. यदि इसे नियमित रूप से पांच साल करते रहें तो आपके शहर में तमाम तरह की सुविधाये बढ सकती हैं और भ्रष्ट लोगों की नीद हराम हो सकती है.

अनुसंधानों द्वारा यह बात बारबार स्पष्ट हुई है कि अखबारों एवं पत्रिकाओं में “संपादक के नाम पत्र” सबसे अधिक पढे जाने वाला एक विभाग है. इतना ही नहीं लगभग हर व्यक्ति का हर तरह का पत्र बिना सेंसरिंग के छाप दिया जाता है.

यदि किसी भ्रष्ट व्यक्ति की कारगुजारी, उसका निकम्मापन, किसी दफ्तर में जिस तरह से मनमाना व्यवहार लोगों से किया जाता है, इस विषय पर महज एक पत्र छप जाये तो उसका असर ऐसा होता है जैसे आप ने शाब्दिक मूठ चला दिया हो.  लेकिन जैसे हाथी को अपनी शक्ति का एहसास न होने के कारण एक पिद्दी महावत उसे अपनी इच्छा के अनुसार नचा लेता है, उसी प्रकार हम लोग अपने अधिकारों को सार्वजनिक रूप से मांगने की शक्ति को  न जानने के कारण अपने अधिकारों से वंचित रह जाते हैं.

अब तो जानकारी के अधिकार (राईट टु इन्फर्मेशन) के जादूई डंडे और पत्र-लेखन के टोटके को जोड दिया जाये तो एक से एक भूत भागते नजर आयेंगे. समस्या सिर्फ पहल करने की है.

एक छोटी सी घटना सुनाता हूँ. कुछ साल पहले हमारे डाकघर में एक बेहद मक्कार आदमी आया था जो नई और आकर्षक डाकटिकटें सिर्फ अपने जानपहचान वालों को देता था. लाख मिन्नत करो वह कह देता था कि टिकट नहीं है. मेरे एक साथी ने एक दिन स्थानीय अखबार को एक पत्र लिखा जो अगले ही दिन अखबार ने छाप दिया. बस फिर क्या था, हर आतेजाते से वह आदमी अपनी ओर से मिन्नत करने लगा कि नई टिकटें आई हैं, बाबूजी लेना चाहेंगे क्या.

अखबार सिर्फ इतना चाहते हैं कि आप बदला निकालने के लिये या द्वेष के कारण पत्र न लिखें. बाकी हर तरह के पत्र छाप दिये जाते हैं. कुछ अखबारों में तो बाकायदा “मुझे शिकायत है” नाम के स्तंभ होते हैं. क्यों न हफ्ते में एक अंतर्देशीय उनको भेजने की आदत डाल लें. कुछ तो कीजिये, बदलाव जरूर आयगा.

Picture: Indian Young Journalist

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Author: Super_Admin

15 thoughts on “इतना तो हर कोई कर सकता है!!

  1. जी सर, यह एक अच्छी बात है। हमे अन्याय भरष्टाचार के विरुध उठाने मे कोई कसर नही छोड्नी चाहिए।
    समजाके हितकारी बात के लिए आभार

    मुम्बई टाईगर पर आज जरुर पढे-बाबा श्री समीरानन्दजी महाराज ने ताऊ को दिया निम्बु मिर्च

    शुभ भावनाओ के साथ

    आपका अपना

  2. बिल्कुल सही बात है। असर तो होता है जी। लेकिन केवल साधारण लोगों पर, एक अदने से कर्मचारी पर और थोड़े जमीर वालों पर।

    लेकिन देश का बेड़ा गर्क करने वाले माफिया, नेता, अपराधी, और ऊँची कुर्सियों पर बैठे भ्रष्ट नौकरशाह इस शर्मिन्दगी से बहुत ऊपर उठ चुके हैं। इनके बारे में स्वयं सम्पादक गण भी रोज लिखते रहते हैं। अखबार की सुर्खियाँ भी इन्हीं के कारनामों से बनती हैं। लेकिन इनके ऊपर असर नहीं दीखता।

  3. करना तो बहुत कुछ चाहिए मगर करता कोई नहीं अगर करते तो स्थिति इस तरह की नहीं होती . रिश्वत माँगने पर रिश्वतखोर को नंगा करने के बजाय रिश्वत दे दी जाती है ताकि अपना काम तो निकले शायद इसी मानसिकता के चलते अपना देश भ्रष्टाचार में सबसे ऊपर आ चुका है .

  4. “अखबार सिर्फ इतना चाहते हैं कि आप बदला निकालने के लिये या द्वेष के कारण पत्र न लिखें. बाकी हर तरह के पत्र छाप दिये जाते हैं.”

    by common reasoning it should be true
    but actually we find they newspapers/ media houses
    also have a hidden agenda
    and that they are biased towards secularism at the expense of hindus
    therefore their selection of letters to editor
    is also selective and in toned down language
    just similar to their own editorials and articles.

    Your excellent post has been back-linked in
    http://hinduonline.blogspot.com/

  5. लोगों को पापुलर करने का नुस्खा है ये तो…
    देश के किसी भी बड़े नेता या भ्रष्टतम अधिकारी का नाम उठा कर देख लीजिये.. जिसने जितना (बद)नाम कमाया उसने उतना ही पैसा भी बनाया. मुझे नहीं लगता की आज वो जमाना है की चिट्ठी पत्री लिखने से या पर्चे बैनर छापने से किसी का कुछ बिगाडा जा सकता है. सिपाही अगर एक रूपया रिश्वत में लेता है तो उसमे से ८० पैसा “ऊपर वालों” को देता है.
    सिद्धार्थ बाबू की सोच व्यवहारिक है.. समस्या भी व्यवहारिक है. इसीलिए आदर्शों और सिद्धांतों के हथियार इसे हरा नहीं सकते.

  6. ऐसा नहीं है सर, कुछ पत्रों में कांट-छांट भी कर देते हैं. और मतलब की बात ही छापते हैं. लेकिन RTI और सूचना वास्तव में एक बड़ा हथियार है.

  7. बहुत अच्छा सुझाव है. इसका असर तेज़ न सही पर रसरी की तरह तो होगा ही : आवत-जात ते सिल पर परत निसान.

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