मौलिक चिंतन जाये भाड में!!

Stones कल के मेरे आलेख पर ab inconvinienti  ने टिपियाया:

हर मौलिक चीज़ भारत में गटर में फेंकने लायक समझी जाती है. विदेशियों की नक़ल उतार कर उनकी बुराइयाँ ज़रूर अपना लेते हैं पर उनकी अच्छी बातें पूरी तरह नज़रंदाज़ कर दी जाती हैं.

इसका एक अच्छा उदाहरण है “प्रेक्टिकल प्रोजेक्ट”. व्यावहारिक प्रोजेक्ट की अवधारणा सबसे पहले पश्चिमी देशों में आई थी जहां बच्चों को पढाई के साथ साथ एक व्यावहारिक कार्य करने को कहा जाता है. इसका मूल लक्ष्य यह था कि सैद्धांतिक पढाई के साथ साथ बच्चे को अपनी दिलचस्पी के किसी क्षेत्र में अपने आप कोई व्यावहारिक काम करे.

अपनी दक्षता के अनुसार कोई विभिन्न तरह के पत्थर इकट्ठे करता है, तो कोई कार्टून काटचिपका कर स्क्रेपबुक बनाता है, तो कोई डाकटिकटों को या सिक्कों को विशिष्ट तरीके से जमा कर लाता है. इसके द्वारा बच्चा किसी बात को सोचने, विश्लेषण करने, योजनाबद्ध तरीके से काम करने आदि को सीखता है.

लेकिन हमारे ठस शालेय अध्यापकों के लिये यह भी एक “परीक्षा” का विषय नजर आता है जहां बच्चे की व्यावहारिक सोच को विकसित करने के बदले उसे परीक्षा देनी पडती है. इतना ही नहीं, उसे ऐसा कोई “प्रोजेक्ट” बनाना पडता है जिसे देख कर अध्यापक एकदम चकित हो जाये, क्योंकि इसके बिना नंबर नहीं मिलते.

फलस्वरूप प्रोजेक्ट बच्चे नहीं उनके अभिभावक तय्यार करते हैं. बाजार में बनेबनाये प्रोजेक्ट “किट” मिल जाते हैं जिसको दोसौ से दोहजार रुपये में खरीद कर प्रोजेक्ट जुगाडा जा सकता है. बस हो गया काम. पिताजी की जेब खाली होती है, अध्यापक चकित हो जाता है, बच्चे को नंबर मिल जाते हैं. हो गया प्रोजेक्ट.

दर असल प्रोजेक्ट नहीं प्रोजेक्ट की अवधारणा का कबाडा हो गया है. मौलिक चिंतन, विश्लेषण, योजना, आदि को ताक पर रख दिया जाता है. इस तरह हर ओर हमारे विद्यालय और अध्यापक मौलिक चिंतन का दमन करते हैं. स्वाभाविक है कि आज वैज्ञानिक जगत में मौलिक चिंतन में भारत का हिस्सा नगण्य है जब कि एक युग में हम चिंतन में जगदगुरु हुआ करते थे.

Picture by faith goble

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Author: Super_Admin

11 thoughts on “मौलिक चिंतन जाये भाड में!!

  1. बड़े शहरों में छोटे बच्चों को स्कूल वाले जो प्रोजेक्ट देते है उसे उनके माता-पिता बना के देते हैं.

    बच्चे जो कुछ भी अनगढ़ तैयार कर सकते हैं वह माता-पिता बेहतरीन तरीके से उन्हें तैयार करके देते हैं.

    दिल्ली में तो दुकानें भी खुल गईं हैं जो हर तरह का प्रोजेक्ट और अस्सैन्मेंट करके देती हैं.

    और इतना सब करने के बाद जिस बच्चे ने खुद मेहनत करके अपना प्रोजेक्ट तैयार किया हो उसे सबसे पुअर नंबर मिलते हैं.

    ज़ाहिर है, एक आठ साल का बच्चा प्रोफेशनल की तरह प्रोजेक्ट नहीं कर सकता, फिर स्कूल वालों को यह सब क्यों नहीं दीखता?

  2. मुझे याद है की आठवी कक्षा के स्कूल के प्रोजेक्टवर्क में मैंने कचरे के ढेर में पड़े तीन कांच के टुकडों को त्रिकोणाकार जोड़कर कैलीडियोस्कोप बनाया था. इसमें मुझे बीस में अट्ठारह मार्क्स दिए गए थे. एक साथी ने पेंसिल सैल और पांच रुपये के छोटे स्पीकर को वायर से तख्ती में जोड़ दिया और लिख दिया “Electrical energy converting into sound energy”. उसे भी अट्ठारह मार्क्स मिले. एक दिन मैं ओजोन छिद्र पर अनगढ़ सा पोस्टर बना कर ले गया, पर उसमे बच्चे की जागरूकता झलक रही थी सो उसमे भी अच्छे नंबर मिले.

    नब्बे के दशक के अंतिम वर्षों में स्कूल छात्रावास में थे. वहां स्कूल से बच्चों को एकल या ग्रुप प्रोजेक्ट मिलता था. साथ मिलकर प्रोजेक्ट करने से व्यवस्थित काम करना तो सीखते ही थे साथ में बेहतरीन टीमवर्क की भी नींव पड़ जाती थी. स्कूल छोटे से हिल स्टेशन में था तो मुश्किल ही था की कोई प्रोजेक्ट बिकाऊ मिल जाए, और अगर मिलता होता तब भी हमारा जेबखर्च इसकी इजाज़त नहीं देता था.

    उन दिनों कोई दबाव नहीं था सिर्फ पास होना काफी था, मैं अपने डिस्लेक्सिया और अस्पर्गर सिंड्रोम के चलते बचपन को पूरा न जी सका पर वे दिन आज के तनावपूर्ण, मशीनी और व्यस्त स्कूली दिनचर्या से काफी अलग थे.

    मैं खाली समय में पढाई करने के बजाए पुस्तकें और पत्रिकाएँ पढ़ा करता था. मानसरोवर और गोदान, गाँधी साहित्य, गोपाल गोडसे, कादम्बिनी के उपलब्ध अंक, धर्मयुग, नंदन, चंदामामा इत्यदि इत्यादि जो मिले चाट जाया करता था. शिक्षा का माध्यम इंग्लिश था पर इंग्लिश पढ़ने का खास दबाव नहीं था, तो हर चीज़ अपनी मातृभाषा में ही पढता था.

    क्या आज के बच्चे इतना नैसर्गिक बौद्धिक विकास पा पाते होंगे? उनपर प्रतियोगी परीक्षा, ९५+ प्रतिशत, ट्यूशन, पियर प्रेशर, अंग्रेजी का बुरी तरह दबाव रहता है. ऐसे माहौल में पले बढे बच्चों से मैं कॉलेज में मिला, उन्होंने कभी पेपर नहीं पढ़ा था, कहने को अधिकतर दो या अधिक भाषाएँ जानते थे पर एक में भी अभिव्यक्ति और शब्द-भंडार ठीक नहीं था. क्रिटिकल थिंकिंग की तो बात ही बेकार है. न कोई कभी पुस्तक पढ़ता था न पत्रिका. कोर्स में अगर उपन्यास भी थे तो डेढ़ सौ के बैच में तीन चार ही थे जिन्होंने सभी उपन्यास आद्योपांत पढ़े थे, बाकी सब गाइड जिंदाबाद.

    भारत का भविष्य ऐसे ही लोगों के हाथ में जा रहा है, क्योंकि वर्तमान युवाओं में पढने वाले और मौलिक सोच रखने वाले बहुत कम बचे हैं.

  3. बिलकुल सही मसला उठाया आपने. शिक्षा क्या, हर मामले में यही हो रहा है. हम अपनी परंपरा छोड़कर भोंड़ी नकल क्लर रहे हैं, चाहे वह किसी की भी हो.

  4. अपने देश मैं इम्पोर्टेड वस्तुओं के साथ साथ इम्पोर्टेड विचारों, हाव भाव, पहनावा, पर्व आदि का ही बोलबाला है |

    मैं १००% सहमत हूँ की – “हर मौलिक चीज़ भारत में गटर में फेंकने लायक समझी जाती है. विदेशियों की नक़ल उतार कर उनकी बुराइयाँ ज़रूर अपना लेते हैं पर उनकी अच्छी बातें पूरी तरह नज़रंदाज़ कर दी जाती हैं |”

    दीपावली की शुभकामनाएं |

  5. अरे! बच्चे तो बच्चे, कालेज में भी प्रोजेक्ट ऐसे ही बनते हैं. उदाहरण के लिये BCA आदि के प्रोजेक्ट विद्यार्थी खुद ना बनाकर शहर के किसी प्रोग्रामर से खरीद लेते हैं. और उसे पैसे दे देते हैं

  6. प्रिय फिलिप,

    दुरुस्त फरमाया। यह बात कोई आज की नहीं वरन सदियो से यही होता चला आ रहा है कि मूल अवधारणा को समझने के बजाय, उसके निकाले हुए मतलब को ही पकड लिया जाता है। मजे की बात यह है कि इस निकाले हुए मतलब का मूल अवधारणा से कोई लेना देना नहीं होता है और यह मतलब निकालने वाले के बोद्धिक स्तर पर निर्भर करता है कि वह अर्थ का अनर्थ करेगा या नहीं।

    महात्मा गाँन्धी की मृत्यु हुए बरसो बीत चुके है परन्तु गाँन्धीवादी आपको आज भी मिल जायेगे, यह अलग बात है की वे नाम के गाँन्धीवादी होगे और असलियत में उनका गाँन्धी होने के अर्थ से दुर दुर तक कोई नाता नही होगा।

    यह सिर्फ भारत की ही समस्या नही है बल्की पुरे विश्व मे यही होता आ रहा है। चाहे राम हो या गौतम बुद्ध हो या महावीर स्वामी हो या मोहम्म्द साहब हो या जिसस क्राइस्ट हो, हमने उनके नाम को पकड कर समुदाय बना लिया और वे असलियत मे क्या थे और उनसे क्या सिखा जा सकता था, उसे भुला दिया।

    धन्यवाद,

    अमित भटनागर

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