एक पति, एक सौ पत्नियां!

आज एक पत्रिका पढ रहा था तो एक बात बडी खटक गई. लेख प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी के बारे में था. लेखक का कहना था कि प्रधान-मंत्री से बडी उम्मीदें थीं, लेकिन वे यह नहीं कर पाये या वह नहीं कर पाये. पढ कर बडा विचित्र लगा.

आप न वह प्रतियोगिता देखी होगी जिसमें आदमी को कमर तक एक बोरी में डाल कर कमर पर उसे बांध दिया जाता है. अब उस से दौडने को कहा जाता है. कोई भी व्यक्ति दो कदम से आगे नहीं बढ पाता है. दर्शक लोग तमाम तरह की बाते कहते हैं कि ऐसा करो या वैसा करो. कुछ बेवकूफ आप बोरियों में कूद जाते हैं, कमर पर बंधवा लेते हैं  और दो कदम के बाद ऐसे गिरते हैं कि आगे कभी किसी को कोई सुझाव न देने की सोच कान पकड लेते हैं.

यह इस देश की विडंबना है कि जिस आदमी को भी जिम्मेदारी के पद पर बैठा दिया जाता है उसे कोई भी निर्णय लेने के लिये सौ लोगों के अनुमति की जरूरत होती है. दायें जाओ तो एक सहयोगी पार्टी नारज होती है, बायें जाओ तो दूसरी, सीधे जाओ तो तीसरी. कहीं न जाओ तो जनता नाराज होती है. अफसोस यह है कि सहयोगी न हों तो सरकार नहीं “बन” सकती, लेकिन सहयोगी हों सरकार नहीं “चल” सकती! हां किनारे खडे लोग एक से एक सुझावे देते जाते हैं क्योंकि वे कभी पाले में नहीं उतरे हैं. सुझाव देने के लिये न तो अकल की जरूरत होती है न समझ की.

Share:

Author: Super_Admin

25 thoughts on “एक पति, एक सौ पत्नियां!

  1. कई महीनों के बाद आपको यहाँ देख मन प्रसन्न हो गया. आपका विश्लेषण “अफसोस यह है कि सहयोगी न हों तो सरकार नहीं “बन” सकती, लेकिन सहयोगी हों सरकार नहीं “चल” सकती!” कितना सामायिक है! आभार.

  2. शुभ पुनरागमन !
    आज तो बस आपके आने की खुशी का इजहार !
    जरा जल्दी जल्दी आया करिए न !

  3. शास्त्री जी,
    बहुत दिनों बाद ब्लॉगलेखन पुनः आरम्भ करने पर आपका हार्दिक स्वागत है। राजनीति तो वैसे ही ‘गन्दा’ खेल कहा जाता है किन्तु अब गंदगी का भी कोई स्तर नहीं रहा।

  4. यह पहला प्रधान मत्री नही, इस से पहले भी कई आये हे, ओर अगर इतनी ताकत नही तो फ़िर उस कुर्सी पर बेठे ही क्यो हे??? बहाने तो हर कोई बना सकता हे जी. यह बोरी वाला खेल भी हम ने स्कुल मे खेला हे ओर इस खेल मै भी बच्चे प्रथम, दुसरे ओर तीसरे स्थान पर आते हे सिर्फ़ मुर्ख ही दो कदम चल कर गिरते हे

  5. बहुत दिनों के बाद आपको देखकर अच्‍छा लगा। वैसे यह बात तो तय है कि कुछ भी करने की तुलना में कहना अधिक आसान होता है।

  6. शास्त्री जी,

    सादर प्रणाम

    काफी दिनों से आपके ब्लॉग के पिछले लेख पढ़ रहा हूँ

    आपके पुनरागमन से प्रसन्नता हुई

  7. जिस ब्लोग को देखकर मै ब्लागिंग के लिये प्रोत्साहित हुआ था।

    लम्बे समय के बाद आपका आना आन्दित कर गया।

  8. सुझाव देने के लिये न तो अकल की जरूरत होती है न समझ की

    मेरा ध्यान भटका दिया आपने लेख की मूल भावना से 🙂

    हाल ही में इसका अनुभव हुआ है मुझे!

  9. शास्त्री जी,
    पिछले कईं दिनों से आपके लेख पढता रहा हूँ
    आपका वापस आना अच्छा लगा

  10. bacha jab chalta hai to ma baab use koob hidyat dete hai thik usi trah desh ke srvesrvs bhi 100 logo ke isare par chal raha hai chlaiye app isra samjah rahen hai ki kahi aur ja rahe hai dekhiye galat disha me mat jai ki drishtrashtr wala shashan desh me chal rah hai.

  11. सच बात. हम नेता बनाते है मगर कैद मे रखते है. क्या पता क्या करेगे? सबका नुक्सान है.

    We have lost our ability to trust. To stop micromanaging. And the leaders micromanage us. An extremely inhibiting state to be in.

    I admire your clarity of thought. I have been blogging about such irrationalities we live as well. We can only change one voice at a time, one act at a time.

  12. सभी पाठक मित्रोंको सादर प्रणाम,

    सभी देवियों और सज्जनों जब आप आंतरजाल पर घुमते है या फिर किसी ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया देते है क्या उसके बदले में आपको पैसे मिलते है ?

    मुझे मिलते है, मै मजाक नहीं कर रहा दोस्तों आप भी आंतरजाल पर घुमते वक्त पैसे कम सकते है.

    मैंने मेरे ब्लॉग पर सारी जानकारी दि है. कृपया एक बार तकलीफ उठाकर देखिएगा जरूर.

    मेरे ब्लॉग का पता

    http://www.moneyprakash.co.cc

    आपका अपना मनी प्रकाश.

    ( आपके इस खुबसूरत ब्लॉग पर मेरे इस कोमेंट को स्थान देने केलिये ब्लॉग के मालिक के हम बेहद शुक्रगुज़ार है )

Leave a Reply to राज भाटिया Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *