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	<title>Comments on: चिट्ठाकारी: थक गये हम!!</title>
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	<link>http://sarathi.info/archives/1081</link>
	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>By: मीनाक्षी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1081/comment-page-1#comment-2581</link>
		<dc:creator>मीनाक्षी</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Jan 2008 20:45:16 +0000</pubDate>
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		<description>अरविन्द जी सही कह रहे हैं.. गज़ल कविता रोज़ नही बन सकते...लेख लिखने के लिए समय चाहिए और समय आगे भागता है और हम उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे... हाथ से फिसलता ही जाता है..फिर भी कभी कभी उसे आगे से दबोच कर कुछ लिख लेते है...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अरविन्द जी सही कह रहे हैं.. गज़ल कविता रोज़ नही बन सकते&#8230;लेख लिखने के लिए समय चाहिए और समय आगे भागता है और हम उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे&#8230; हाथ से फिसलता ही जाता है..फिर भी कभी कभी उसे आगे से दबोच कर कुछ लिख लेते है&#8230;</p>
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		<title>By: arvind mishra</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1081/comment-page-1#comment-2580</link>
		<dc:creator>arvind mishra</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Jan 2008 12:40:20 +0000</pubDate>
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		<description>शास्त्री जी ,आप भी सहमत होंगे कि सृजनात्मक लेखन रद्दी के भाव रोजाना  सम्भव नही है .शायर ने ठीक ही कहा है कि &#039; गजल के शेर कहाँ रोज रोज होते हैं .रही रोज कुछ न कुछ टिपियाने की बात तो लगे रहो मुन्ना भाई ,शायद कुछ फर्क पड़ ही जाय . मगर हाँ कई ऐसे ब्लॉग हैं जहाँ एक मिशन के रूप मे बहुत अच्छा लिखा जा रहा है  ,उनके चलते  रहने मे आपके  सतत प्रोत्साहन  ने स्तुत्य भूमिका निभाई है.पर उन्हें भी गुणवत्ता से समझौता नही करना चाहिए .आपको ब्लॉगर सम्मान के लिए बधाई ,दरअसल यह सम्मान का ही प्रकारांतर से सम्मानित होना हुआ.
एक नारा उछाल रहा हूँ -कम लिखो ,काम का लिखो .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शास्त्री जी ,आप भी सहमत होंगे कि सृजनात्मक लेखन रद्दी के भाव रोजाना  सम्भव नही है .शायर ने ठीक ही कहा है कि &#8216; गजल के शेर कहाँ रोज रोज होते हैं .रही रोज कुछ न कुछ टिपियाने की बात तो लगे रहो मुन्ना भाई ,शायद कुछ फर्क पड़ ही जाय . मगर हाँ कई ऐसे ब्लॉग हैं जहाँ एक मिशन के रूप मे बहुत अच्छा लिखा जा रहा है  ,उनके चलते  रहने मे आपके  सतत प्रोत्साहन  ने स्तुत्य भूमिका निभाई है.पर उन्हें भी गुणवत्ता से समझौता नही करना चाहिए .आपको ब्लॉगर सम्मान के लिए बधाई ,दरअसल यह सम्मान का ही प्रकारांतर से सम्मानित होना हुआ.<br />
एक नारा उछाल रहा हूँ -कम लिखो ,काम का लिखो .</p>
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		<title>By: प्रशान्त प्रियदर्शी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1081/comment-page-1#comment-2579</link>
		<dc:creator>प्रशान्त प्रियदर्शी</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Jan 2008 11:10:27 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1081#comment-2579</guid>
		<description>मैं आपकी बात मान कर आजकल लगभग हर दूसरे दिन कोई ना कोई चिट्ठा पोस्ट कर रहा हूं.. और वो भी एक नहीं दो-दो चिट्ठा.. और दोनों को ही मिला कर अभी तक इस महीने में अब-तक 13-14 पोस्ट कर चुका हूं.. ये आपके द्वारा उत्साह वर्धन का ही कमाल है..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मैं आपकी बात मान कर आजकल लगभग हर दूसरे दिन कोई ना कोई चिट्ठा पोस्ट कर रहा हूं.. और वो भी एक नहीं दो-दो चिट्ठा.. और दोनों को ही मिला कर अभी तक इस महीने में अब-तक 13-14 पोस्ट कर चुका हूं.. ये आपके द्वारा उत्साह वर्धन का ही कमाल है..</p>
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		<title>By: parulk</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1081/comment-page-1#comment-2578</link>
		<dc:creator>parulk</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Jan 2008 10:54:26 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1081#comment-2578</guid>
		<description>aap sahi kah rahey hain SARGAM naam se shaastriiy sangeet kaa mera blog sirf samay na honey ke karaan sust padaa hai...karen to kya karen</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>aap sahi kah rahey hain SARGAM naam se shaastriiy sangeet kaa mera blog sirf samay na honey ke karaan sust padaa hai&#8230;karen to kya karen</p>
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		<title>By: परमजीत बाली</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1081/comment-page-1#comment-2577</link>
		<dc:creator>परमजीत बाली</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Jan 2008 07:05:28 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1081#comment-2577</guid>
		<description>सारथी जी,बात तो सही है कि कुछ समयाभाव व कुछ आर्थिक कारणों से चिट्ठाकार पीछे हटनें लगते हैं। लेकिन ब्लोग लिखनें का एक नशा है जो उन्हें फिर इस ओर धकेल देता है। आप ने सही कहा-&quot;पैर उतना ही फैलाये जितनी बडी चादर है, लेकिन फैलाये जरूर&quot;
हम भी यही कोशिश कर रहे हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सारथी जी,बात तो सही है कि कुछ समयाभाव व कुछ आर्थिक कारणों से चिट्ठाकार पीछे हटनें लगते हैं। लेकिन ब्लोग लिखनें का एक नशा है जो उन्हें फिर इस ओर धकेल देता है। आप ने सही कहा-&#8221;पैर उतना ही फैलाये जितनी बडी चादर है, लेकिन फैलाये जरूर&#8221;<br />
हम भी यही कोशिश कर रहे हैं।</p>
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		<title>By: काकेश</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1081/comment-page-1#comment-2576</link>
		<dc:creator>काकेश</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Jan 2008 05:41:50 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1081#comment-2576</guid>
		<description>मै‌ तो अपने बारे मे‌ कह सकता हूं कि मुझे थकावट नही‌ है पर समयाभाव है और्   चिट्ठाकारी मे‌ ज्यादा रस भी नही‌ आ रहा इसलिये समय को ठीक से उपयोग नही‌ कर पा रहा शायद. चलिये इस लेख से कुछ प्रेरणा तो मिलेगी ही.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मै‌ तो अपने बारे मे‌ कह सकता हूं कि मुझे थकावट नही‌ है पर समयाभाव है और्   चिट्ठाकारी मे‌ ज्यादा रस भी नही‌ आ रहा इसलिये समय को ठीक से उपयोग नही‌ कर पा रहा शायद. चलिये इस लेख से कुछ प्रेरणा तो मिलेगी ही.</p>
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		<title>By: Sahebali</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1081/comment-page-1#comment-2575</link>
		<dc:creator>Sahebali</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Jan 2008 05:05:28 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1081#comment-2575</guid>
		<description>आपकी इस पोस्ट को पढ़ कर एक पुराना शेर याद आया,
गिरते हैं शह सवार ही मैदाने जंग मे,
वो क्या खाक गिरेंगें जो घुटनो के बल चलें।
फिलिप साहब गिरना भी ज़रूरी है संभलने के लिए,न हों बेकरार करें थोड़ा और ईंतजार,
मेरे हिसाब से समाचार को छोड़कर बाकी सभी लेख रोज नहीं लिखे जा सकते क्योंकि हर विषय मे शोध,खोज,एवं अन्य सामग्री एकत्र करने मे समय तो लगता ही है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपकी इस पोस्ट को पढ़ कर एक पुराना शेर याद आया,<br />
गिरते हैं शह सवार ही मैदाने जंग मे,<br />
वो क्या खाक गिरेंगें जो घुटनो के बल चलें।<br />
फिलिप साहब गिरना भी ज़रूरी है संभलने के लिए,न हों बेकरार करें थोड़ा और ईंतजार,<br />
मेरे हिसाब से समाचार को छोड़कर बाकी सभी लेख रोज नहीं लिखे जा सकते क्योंकि हर विषय मे शोध,खोज,एवं अन्य सामग्री एकत्र करने मे समय तो लगता ही है।</p>
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		<title>By: Sahebali</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1081/comment-page-1#comment-2574</link>
		<dc:creator>Sahebali</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Jan 2008 05:04:08 +0000</pubDate>
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		<description>आपकी इस पोस्ट को पढ़ कर एक पुराना शेर याद आया,
गिरते हैं शह सवार ही मैदाने जंग मे,
वो क्या खाक गिरेंगें जो घुटनो के बल चलें।
फिलिप साहब गिरना भी ज़रूरी है संभलने के लिए,न हों बेकरार करें थोड़ा और ईंतजार,
मेरे हिसाब से समाचार को छोड़कर बाकी सभी लेख रोज नहीं लिखे जा सकते क्योंकि हर विषय मे शोध,खोज,एवं अन्य सामग्री एकत्र करने मे समय तो बगता ही है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपकी इस पोस्ट को पढ़ कर एक पुराना शेर याद आया,<br />
गिरते हैं शह सवार ही मैदाने जंग मे,<br />
वो क्या खाक गिरेंगें जो घुटनो के बल चलें।<br />
फिलिप साहब गिरना भी ज़रूरी है संभलने के लिए,न हों बेकरार करें थोड़ा और ईंतजार,<br />
मेरे हिसाब से समाचार को छोड़कर बाकी सभी लेख रोज नहीं लिखे जा सकते क्योंकि हर विषय मे शोध,खोज,एवं अन्य सामग्री एकत्र करने मे समय तो बगता ही है।</p>
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		<title>By: mamta</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1081/comment-page-1#comment-2573</link>
		<dc:creator>mamta</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Jan 2008 05:01:53 +0000</pubDate>
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		<description>कह तो आप ठीक रहे है ।  अगर कुछ दिन ना लिखे तो मन कुछ उचट सा जाता है। पर फिर जहाँ लिखना शुरू करते है तो वापिस उसी मूड मे आ जाते है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कह तो आप ठीक रहे है ।  अगर कुछ दिन ना लिखे तो मन कुछ उचट सा जाता है। पर फिर जहाँ लिखना शुरू करते है तो वापिस उसी मूड मे आ जाते है।</p>
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		<title>By: अन्नपूर्णा</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1081/comment-page-1#comment-2572</link>
		<dc:creator>अन्नपूर्णा</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Jan 2008 04:23:36 +0000</pubDate>
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		<description>आपकी बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं। मेरे चिट्ठे तो इतने सूने रहते है कि समझ में ही नहीं आता कि किसी को मेरे चिट्ठों की जानकारी है भी या नहीं।

कैसा रहेगा अगर हम चिट्ठाकारी को एक पत्रिका की तरह बना दे।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपकी बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं। मेरे चिट्ठे तो इतने सूने रहते है कि समझ में ही नहीं आता कि किसी को मेरे चिट्ठों की जानकारी है भी या नहीं।</p>
<p>कैसा रहेगा अगर हम चिट्ठाकारी को एक पत्रिका की तरह बना दे।</p>
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	<item>
		<title>By: Gyan Dutt Pandey</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1081/comment-page-1#comment-2571</link>
		<dc:creator>Gyan Dutt Pandey</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Jan 2008 02:39:59 +0000</pubDate>
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		<description>आपने मन की बात कर दी!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपने मन की बात कर दी!</p>
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	<item>
		<title>By: Sanjeeva Tiwari</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1081/comment-page-1#comment-2570</link>
		<dc:creator>Sanjeeva Tiwari</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Jan 2008 02:10:28 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1081#comment-2570</guid>
		<description>प्रेरणा और जूनून तो होनी ही चाहिए तभी समय भी निकलता है और मानसिक तौर पर हम तैयार भी होते हैं फलत: भाव शव्‍दों का रूप लेते हैं । इसके न रहने पर चिट्ठाकारी व्‍यर्थ प्रलाप एवं समय-श्रम-धन को नष्‍ट करने का साधन ही प्रतीत होता है ।

आपको सृजन सम्‍मान में शीर्ष 22 की श्रेणी में प्रथम स्‍थान पाने के लिए बधाई ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>प्रेरणा और जूनून तो होनी ही चाहिए तभी समय भी निकलता है और मानसिक तौर पर हम तैयार भी होते हैं फलत: भाव शव्‍दों का रूप लेते हैं । इसके न रहने पर चिट्ठाकारी व्‍यर्थ प्रलाप एवं समय-श्रम-धन को नष्‍ट करने का साधन ही प्रतीत होता है ।</p>
<p>आपको सृजन सम्‍मान में शीर्ष 22 की श्रेणी में प्रथम स्‍थान पाने के लिए बधाई ।</p>
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	<item>
		<title>By: Sanjay Gulati Musafir</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1081/comment-page-1#comment-2569</link>
		<dc:creator>Sanjay Gulati Musafir</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Jan 2008 01:28:35 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1081#comment-2569</guid>
		<description>कभी कभी आपके शब्दों से खुद से बगावत करने की बू आती है। पर सच तो यह भी है कि हौसला खुद को हराकर ही किया जा सकता है। 

मुझे अच्छे से याद है, मेरा एक लेख किसी मित्र के ब्लॉग पर छपा था। लेख का विषय ही था कि हर रोज तो क्या हफ्ते में एक बार लिखना भी मुश्किल है - अगर कोई प्रेरणा न हो तो। 

आपकी प्रतिक्रिया आई। आच्छा लिखते हो, पर हफ्ते के कम से कम चार लेख लिखो। मैंने सोचा कोई &#039;सिरफिरा&#039; होगा, लेख पडा नहीं और प्रतिक्रिया लिख गया। तब पहली बार &#039;सारथी&#039; से मुलाकात हुई। 

अब मुडकर देखता हूँ तो समझ आता है, कि आप मुझे अपने अंतर्मन को हराने के लिए अपने ही तरीके से प्रेरित कर रहे थे। 

लीजिए शास्त्री जी, अब मेरे सिरफिरे होने का प्रमाण लीजिए। जो कहता था लेख नहीं लिखा जाता - प्रतिक्रिया लिखने में ही एक लेख लिख गया। 

धन्यवाद 
संजय गुलाटी मुसाफिर</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कभी कभी आपके शब्दों से खुद से बगावत करने की बू आती है। पर सच तो यह भी है कि हौसला खुद को हराकर ही किया जा सकता है। </p>
<p>मुझे अच्छे से याद है, मेरा एक लेख किसी मित्र के ब्लॉग पर छपा था। लेख का विषय ही था कि हर रोज तो क्या हफ्ते में एक बार लिखना भी मुश्किल है &#8211; अगर कोई प्रेरणा न हो तो। </p>
<p>आपकी प्रतिक्रिया आई। आच्छा लिखते हो, पर हफ्ते के कम से कम चार लेख लिखो। मैंने सोचा कोई &#8216;सिरफिरा&#8217; होगा, लेख पडा नहीं और प्रतिक्रिया लिख गया। तब पहली बार &#8216;सारथी&#8217; से मुलाकात हुई। </p>
<p>अब मुडकर देखता हूँ तो समझ आता है, कि आप मुझे अपने अंतर्मन को हराने के लिए अपने ही तरीके से प्रेरित कर रहे थे। </p>
<p>लीजिए शास्त्री जी, अब मेरे सिरफिरे होने का प्रमाण लीजिए। जो कहता था लेख नहीं लिखा जाता &#8211; प्रतिक्रिया लिखने में ही एक लेख लिख गया। </p>
<p>धन्यवाद<br />
संजय गुलाटी मुसाफिर</p>
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