पुरुष एवं स्त्री की सोच या वासना का स्वरूप एक जैसा नहीं होता. अत: कोई भी स्त्री आसानी से इस समस्या को पुरुष के कोण से नहीं समझ सकती. बलात्कार को समझने में एक दिक्कत और है: आजकल इस विषय पर जितनी किताबे जनसाधारण के बीच प्रसिद्ध हैं, उनको मनोवैज्ञानिकों ने नहीं बल्कि अमरीका के स्त्री-स्वतंत्रता-आदोलन की नायिकाओं ने लिखा हैं. इन लोगों ने हर तरह के अनुसंधान को नकार कर अपने फिलसफी के कचरे को अपनी किताबों द्वारा प्रचारित किया है.

इन किताबों का असर इतना अधिक है, एवं इनमें जिस झूठ का प्रचार किया गया है, उसका प्रभाव इतना अधिक है, कि इस विषय पर सच लिखने से लगभग सभी डरते है, कतराते है. सच लिखो तो ये छद्म-विद्वान एवं इनकी लेखनी द्वारा प्रभावित लोग सच्चाई के विरुद्ध ऐसा जिहाद छेड देते हैं कि जान बचाने के लिये लेखक/चिट्ठाकार अपने खोल में छुपने को मजबूर हो जाता है. वह कान पकड लेता है कि समाज में स्त्रियां किसी भी तरह का अराजक व्यवहार करे, अनावृत हो कर हर घर के केलेंडर पर आ जाये, लेकिन वह आईंदा इसके विरुद्ध नहीं लिखेगा, इसके मनोवैज्ञानिक असर के बारे में मूंह नहीं खोलेगा. सच्चाई बहुत कडवी होती है एवं मूँह खोलकर उसे कहना कई लोगों को बहुत महंगा पड चुका है.

सच यह है कि जिन समाजों में स्त्रीपुरुष पूरी तरह से अनावृत रहते हैं, वहां विपरीतलिंगी शरीर देख देख कर मन भर जाता है. कोई कृत्रिम आकर्षण नहीं रह जाता. इतना ही नहीं, जो समाज इतने प्राकृत होते है कि वहां स्त्रीपुरुष अनावृत रहते हैं, उन समाजों में पुरुष की वासना को कृत्रिम तरीके से भडकाने के लिये न तो अर्धनग्न नारियां होती हैं, न शरीर को वासनात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, न अनावृत स्त्रीशरीरयुक्त विज्ञापन होते हैं, न ऐसे केलेंडर होते है. वहां अश्लील साहित्य नहीं होता. पिक्चर में गैरशादीशुदा जोडे को एक दूसरे के पीछे भागते, अलिंगन करते, नाचते नहीं दिखाया जाता है. जो प्राकृतिक है उसे कृत्रिम तरीके से वासना भडकाने के लिये प्रयुक्त नहीं किया जाता है.

लेकिन सहस्त्रों साल का मानव इतिहास देखें. जिस जिस समाज में स्त्रियों ने अपने शरीर को प्रदर्शन की वस्तु बनाया, जिन समाजों में पुरुष की वासना को कृत्रिम तरीके से भडकाने में स्त्रियां आगे रहीं उन सब समाजों में स्त्रियों के विरुद्ध अपराध बढे हैं. यहां तक की उन देशों में भी ये अपराध बढे जहां मुक्त यौनाचार चलता है, जैसे कि आज के पश्चिमी देश.

कोई भी अपराध 100% समाप्त नहीं किया जा सकता. लेकिन 99% समाप्त किया जा सकता है. इसके लिये दो काम करने होंगे. पहला, स्त्रियां शरीर प्रदर्शन और कृत्रिम यौनाकर्षण के बारे में मर्यादा का पालन करे. अपने शरीर को प्रदर्शनी न बनायें, कृत्रिम नुमाईश द्वारा अपने अगल बगल में सब को बलात तरीके से आकर्षित करने की कोशिश न करें. दूसरा काम है, कानून कडा किया जाये. बलात्कारी को मृत्युदंड दिया जाये जा उसका लिंगच्छेद किया जाये.

ऐसे कई समाज हैं जिन में पुरुषों के साथ ऐसा ही किया गया था. उन समाजों में पराई स्त्री पर वासनात्मक दृष्टि डालने के बारे में सपना आ जाये तो भी पुरुष कांपते थे. स्त्रियों में मर्यादापूर्ण वेशभूषा, एवं स्त्री के विरुद्ध होने वाले अपराधों के लिये कडे एवं निर्दय कानून दोनों ही जरूरी है.

पृष्टभूमि:

यौनाकर्षण, स्त्रियां, बलात्कार !
यौनाकर्षण: स्त्रियों की जिम्मेदारी/गैरजिम्मेदारी 2
यौनाकर्षण: स्त्रियों की जिम्मेदारी/गैरजिम्मेदारी 1

 

आज के दिन दुनिंयां के सबसे महान प्रजातंत्र की नींव डाली गई
थी. मेरा आपका भाग्य है कि हम उस महान देश के नागरिक
हैं, पुत्र पुत्रियां है.

आईये आज पुन: यह प्रण करें कि हिन्दुस्तान को सन 2020 से
पहले एक विश्व-शक्ति बनाने के लिये हमआप तन, मन, धन
से जुट जायेंगे. जय हिन्द !


Comments

20 Comments so far

  1. dr parveenc hopra on January 26, 2008 6:39 am

    शास्त्री जी, इस विषय पर आप की लिखी पिछली पोस्टें भी देखी हैं। यह जो बलात्कारी को मृत्यु दंड देने अथवा सरे-आम उस का लिंग-छेदन करने संबंधी कानून बनाने की बात आप ने कही है, यह बिलकुल ठीक है। अगर आप किसी पोस्ट में इस संबंधी जानकारी भी उपलब्ध कराएं कि किन किन देशों में ऐसे घिनौने अपराधों के लिए दी जाने वाली सज़ा भी कम से कम उतनी ही खौफनाक है तो बहुत अच्छा होगा। वैसे हम ने भी एक दो देशों के बारे में ऐसा सुन तो रखा है लेकिन पता नहीं वह उस में कितनी विश्वसनीयता है। आप ही प्लीज़ लिखिएगा। शास्त्री जी, एक इतना घिनौना अपराध कि जब कोई सिरफिरा अपने बहशीपन की आग में किसी बेचारी महिला का तो जीवन ही नरक बना देता है…समाज चाहे कुछ कहे या न कहें, बेचारी मानिसक स्तर पर ही कितनी घुटन महसूस करती होगी। और वह दरिंदा कानूनी दांव-पेच खेल कर कैसे खुले में घूमता रहता है। आज समाज को इस के बारे में सोचना ही होगा….विचार करना ही होगा…..आवाज़ उठानी ही होगी….क्योंकि इस दरिंदगी का शिकार होने वाली भी किसी की बहने हैं, बेटियां हैं…..और बेटियां तो बेटियां ही हैं न दोस्त।

    Shastriji, I am very happy to note that Hindi Blogging is heading towards Citizen Journalism….Jai Hindi Blogging…

  2. arvind mishra on January 26, 2008 6:51 am

    विचारोत्तेजक प्रस्तुति ,बलात्कारी मानसिकता को लेकर काफी शोध अनुसंधान हो चुका है ,तदापि यह अभी भी एक गुत्थी है .यौन उद्दीपन एक कारण हो सकता है किंतु कई मनोविग्यानियों की राय मे यह भी बहूत सम्भव है कि इसके पीछे यौन संतुस्ति का मकसद हो ही न हो -बस किसी को नीचा दिखाने ,बदला लेने की नीयत से यह अपराध किया जाता हो .एक पौराणिक उदाहरण द्रोपदी के साथ दुर्योधन का ही बर्ताव देखें -भरी सभा मे दुर्योधन द्वारा द्रोपदी का अपमान किए जाने के पीछे उसका द्रोपदी के द्वारा पहले ही उपहास उडाना -अपमानित होना दर्शाया गया है .
    प्रकृति ने नर नारी को एक दूसरे का पूरक बनाया है -दोनों का बराबर का महत्त्व है मगर भूमिकाएं अलग अलग हैं ,सारी समस्याएं केवल ‘रोल रिवर्सल ‘ के कारण आरही हैं -बलात्कार भी शायद इसी रोल रिवर्सल की ही एक भयावह परिणति है -कहीं नर बलात्कारी बन बैठा है तो कहीं सबलायें[?]- आधुनिक अफ्सराओं -सम्मोहिताओं -के रूप मे मनुष्य का शील संकोच नस्ट कराने पर तुली हुई हैं ,गरज यह कि यह सारा मामला इतना सीधा सपाट नही है जितना आदरणीय शास्त्री जी और सुश्री रचना जी को दिख रहा है .

  3. Gyan Dutt Pandey on January 26, 2008 6:53 am

    मैने बस्तर के इलाके में अपनी प्रोबेशनरी ट्रेनिंग की थी। आदिवासी स्त्रियां एक सफेद साड़ी घुटनों तक पहने और उसी से ऊपर के अंग भी ढंके रहती थीं। प्रारम्भ में यह उद्दीपन करता प्रतीत हुआ। पर एक दिन में ही मन शान्त हो गया।
    फिर तो उन स्त्रियों की सरलता मोहने लगी।

  4. Shastri JC Philip on January 26, 2008 9:01 am

    @dr parveenc chopra

    डॉ प्रवीण, मैं जरूर उस विषय पर लिखूंगा !!

  5. Shastri JC Philip on January 26, 2008 9:03 am

    @arvind mishra

    अरविंद जी शायद 5% बलात्कारी मनोवैज्ञानिक कारण से यह करते है. बाकी शुद्ध वासना के कारण करते है.

  6. Shastri JC Philip on January 26, 2008 9:04 am

    @Gyan Dutt Pandey

    ज्ञान जी, मैं भी उस इलाके में रह चुका हूँ एवं आपकी बातों से शत प्रतिशत सहमत हूँ.

  7. अनिल रघुराज on January 26, 2008 9:04 am

    शास्त्री जी, आपकी बात से 100 फीसदी सहमति है। सचमुच विज्ञापनों में महिलाओं के जिस्म की नुमाइश देखकर तो कभी-कभी जुजुप्सा सी होने लगती है। कठोरतम दंड ही बलात्कारी का दिमाग दुरुस्त कर सकता है।

  8. hello tring tring on January 26, 2008 10:13 am

    पहली जिमेदारी सदा कि तरह स्त्री की
    दूसरी कानून कि
    पुरुष को दंड का भागी पर उसकी कोई जिमेदारी का अब भी उलेख नहीं
    क्या है पुरुष को आप गैर ज़िमेदार मानते हैं यदी हाँ तो ठीक हैं यदि नहीं तो जैसा अरविंद ने कहा रोल रिवेर्सल के लिये तैयार रहे । और जब रोल रेवेर्सल होगा तो हर चीज़ मे होगा । शायद तब आप को एहसास होगा कि पुर्सुह को उसकी जिमेदारी का एशास करा दिया होता तो अच्छा होता ।

  9. Shastri JC Philip on January 26, 2008 10:31 am

    @hello tring tring

    ऐसी जल्दी क्या है. यह लेखन परंपरा अभी खतम नहीं हुई है!! हर चीज समय पर पेश कर दी जायगी.

  10. hello tring tring on January 26, 2008 10:35 am

    हर चीज समय पर पेश कर दी जायगी.
    samay bhaag rahaa hm jawaan nahin bude hotaey hae

  11. Shastri JC Philip on January 26, 2008 10:45 am

    @hello tring tring

    भागने दीजिये समय को. हां यदि आप बूढे हो रहे हैं तो इन विषयों के बदले सन्यास या वानप्रस्थ की सोचे!!

  12. suresh chiplunkar on January 26, 2008 10:49 am

    5% मनोविज्ञान बाकी 95% वासना - एकदम सही लिखा है, वासना भड़काने के कारक चारों ओर मौजूद हैं, कोई इससे कब तक बचा रह सकता है? एक खरी-खरी बात यह है कि - जो पुरुष नारी का अनावृत्त शरीर देखकर एक क्षण के लिये भी उत्तेजित न हो, या तो वह “पुरुष” नहीं है, या फ़िर “महापुरुष” है, और समाज में दोनों की संख्या नगण्य है…

  13. राज भाटिया on January 26, 2008 12:25 pm

    शास्त्री जी,मे आपकी बात से 100 फीसदी सहमति है। लेकिन कभी कभी ( जो आजकल ज्यादा हि हो रहा हे) एक शरीफ़ आदमी को कोई स्त्रि अपने स्बार्थ के लिये, यु ही बदनाम करे, ओर उस पर बलात्कारी का आरोप लगा दे, तो आप का कानुन तो उस बेचारे का सिर ही उडा देगा,आज कल दहेज के नाम पर कया कुछ नही हो रहा,

  14. अतुल शर्मा on January 26, 2008 1:17 pm

    सुरेशजी चिपलूनकर से पूर्णत: सहमत।

  15. उन्मुक्त on January 26, 2008 4:01 pm

    मेरे विचार से यह कहना कि - बलात्कारी को मृत्युदंड दिया जाये जा उसका लिंगच्छेद किया जाये - शायद ठीक नहीं है। इसको करने से, पहले हमें कुछ और पहुलवों को देखना चाहिये।

    १- हर मुकदमें सही नहीं होते हैं बहुत से मुकदमें बलैकमेल करने के लिये चलाये जाते हैं। मुकदमे का फैसला अक्सर कागजी होता है। क्या कागज पर है वही सही है। झूटे मुकदमे और सच्चे मुकदमों में फर्क करना आसान नहीं होता। अमेरिका में लाइबोविट्ज़, नामक फौजदारी के प्रसिद्ध वकील २०वींं शताब्दी में हुऐ हैं। उनकी जीवनी Courtroom नामक पुस्क में है। मैं इस पुस्तक की समीक्षा करते समय कुछ इस प्रकार के मुकदमों का उल्लेख करूंगा।

    २- न्यायधीष फैसला देते समय किस मनोस्थिति से गुजरते हैं। शायद यह अपने में एक बेहतरीन विषय है कि न्यायधीष गण किस बात पर फसला देते हैं। मैं आंकड़े तो नहीं दे सकता पर जितना मुझे मालुम है कि सजा बढ़ाने पर न्यायधीष लोगों को ज्यादा छोड़ते हैं। ऐसे मौकों पर, वे कई बार सोचते हैं कि क्या उनसे गलती तो नहीं हो रही है। किसी जीवन लेकर या लिंगछेदन कर वापस नहीं किया जा सकता है। किसी एक या दो मुकदमे के तथ्य पर यह सब तथ्यों के लिये करना अनुचित होगा।

    मैने विवाह सम्बन्धी अपराधों के विषय में: आज की दुर्गा चिट्ठी लिखते समय इस तरफ इशारा किया है। इन सब को बिन्दुवों को बिना विचारण किये - सजा बढ़ा देना ठीक नहीं।

  16. arvind mishra on January 26, 2008 6:32 pm

    सहमत उन्मुक्त जी ,दरअसल बलात्कारी मनोविकारी होते तो हैं पर उनका लिंगोछेदन या फांसी कबीलाई दण्ड/बर्बरता का द्योतक है ,हम सभ्य समाज मे रहते हैं -क्या भारतीय संविधान इस तरह के दण्ड का हिमायती है ?
    आज कई प्रदेशों मे ,उत्तर प्रदेश के कुछ पश्चिमी जिलों मे प्रेम करने वालों तक को पंचायतें मौत का फतवा दे रही हैं -बेचारे मासूम प्रेमी या तो प्रेम की बलि वेदी पर चढ़ जा रहे हैं या भागे भागे फिर रहे हैं .यहाँ हमारी कबीलाई मानसिकता ही हाबी है .

  17. दिनेशराय द्विवेदी on January 26, 2008 6:59 pm

    आप ने विवादास्पद विषय छेड़ा है। मेरी समझ में इस पर बात करने के पूर्व लेखक को स्पष्ट करना चाहिए था कि वह बलात्कार के कारणों में स्त्री की भूमिका को कितना संभव मानता है। मेरा तो यह सोच है कि बलात्कार के किसी भी मामले में स्त्री का दोष यदि है भी तो वह अत्यन्त गौण ही हो सकता है। शायद अभी इस विषय पर हैलो ट्रिंग ट्रिंग के अतिरिक्त किसी महिला ने कोई टिप्पणी इसी लिए नहीं की है कि वे मान रही हैं कि आप उस गौण भूमिका के सम्बन्ध में ही बात कर रहे हैं। यदि आप उस गौण भूमिका के सम्बन्ध में ही बात कर रहे हैं तो आप की राय से पूरी सहमति है। फिर भी दंड के सम्बन्ध में मैं उन्मुक्त जी से सहमत हूँ। कोर्ट रूम बहुत अच्छी पुस्तक है। यदि वे इस की समीक्षा करेंगे तो अनेक आँखों को खोलेगी। मुझे तो समीक्षा की प्रतीक्षा रहेगी।
    आप ने विषय ठीक चुना है, इस पर बात होनी चाहिए थी और आप से अधिक उचित व्यक्ति इस बात को प्रारंभ करने वाला और हो नहीं सकता था।

  18. दिनेशराय द्विवेदी on January 26, 2008 7:20 pm

    मैं टिप्पणी करने के पहले आप की कल की पोस्ट नहीं पढ़ सका था। उस के आने के पहले ही नेट गायब हो गया था। मुझे रचना जी की टिप्पणियों को पढ़ने का सौभाग्य नहीं मिला था अब पढ़ी हैं। मैं उन के विचारों का सम्मान करता हूँ। वे गलत नहीं है। बलात्कार की किसी भी घटना के लिए बलीकृत को दोष देना उचित नहीं हो सकता है। पर मेरे विचार में आप यहाँ स्त्रियों के दोष की नहीं अपितु बलात्कार के लिए उद्दीपन के कारक की चर्चा कर रहे हैं। मुझे तो रचना जी के तर्कों में और आप की बात में कोई विवाद ही नजर नहीं आया। केवल विषय की सीमाओं को समझ पाने का विवाद दिखाई पड़ता है।

  19. Shastri JC Philip on January 26, 2008 9:20 pm

    @दिनेशराय द्विवेदी

    दिनेश जी, आपने सही विश्लेषण किया कि मेरे कथन में एवं रचना सिंह की टिप्पणियों मे कोई आपसी विरोध नहीं है क्योंकि दोनों अलग अलग पहलुओं के बारे में कह रहे हैं.

    इस विषय पर मुझे अभी काफी कुछ कहना है

  20. Brijmohanshrivastava on April 16, 2008 6:18 pm

    पक्ष और प्रतिपक्ष संसद में मुखर है
    बात इतनी है की कोई पुल बना है -दुष्यंत जी
    बात थी केवल दंड और मर्यादा की -विवाद लीक से हट गया निर्वस्त्र रहने वाले समाज में कम घटनाएं होंगी या सभ्य में -क्या परिस्थियाँ थी नीचा दिखाने दुश्मनी निकालने - झूंठा आरोप लगाया या बेइज्जत करने बात ही प्रथक हो गई इन बातों के लिए तो बात्स्यायण से लेकर फ्रायड तक और आधुनिक मनोविश्लेशकों के विचार के साथ यौन शिक्षा पर भी विचार करना होगा
    एक जघन्य बीभस्त प्री प्लान मर्डर के लिए भी म्रत्यु दंड और बलात्कार के लिए भी -कल को ये होगा की ३५४ छेड़छाड़ के लिए भी म्रत्यु दंड की व्यवस्था की जाए म्रत्यु दंड कोई बच्चों के खेलने का खिलौना नहीं है तथा बर्बर और जंगली अंग भंग का कानून की वर्तमान युग में कल्पना करना ही बेमानी है
    पुरूष समाज ने स्त्री को अव्ला -दीन हीन -दयनीय -शोषित -कुपोषित -डरपोक रखा की चूहे से भी डर जाए -तलवार लेकर घोडे पर बैठी पुरानी रानियों की तरफ -मजाल थी कोई आँख उठा कर देख जाए =पुतली -फूलन =में अतीत दी बात नहीं कर रहा तब वो अबला थीं बाद में बंदूक लेकर बीहड में उतरी तब की बात करता हूँ थी किसी शहरी लडके में हिम्मत की निगाह भर देख सके =किसी महिला थानेदार या मिलिट्री अधिकारी के सामने बलात्कारी के हाथ पांव क्यों ढीले पड़ जाते हैं
    लेकिन महिला को निर्वस्त्र घुमाया जारहा है और गाओं तमाशा देख रहा है इसे मृतक समाज में बलात्कार की घटनाएं तो होंगी ही प्रभावित महिला का पती विक जाता है बाप विक जाता है भाई विक जाता है तो कानून क्या करेगा

Name (required)

Email (required)

Website

हिन्दी में टंकण के लिये पहले http://quillpad.in/hindi/ पर चले जाईये. टंकण के बाद उसे यहां नकलचिपका लीजिये

Close
E-mail It