मेरे लेख बेटा जब समलैंगिक हो जाये 001 में मैं ने विषय प्रवेश किया था एवं कहा था कि विपरीत लिंगी व्यक्ति के प्रति किसी भी पुरुष या स्त्री का नजरिया उनके मांबाप से मिले नजरिये पर निर्भर करता है. इतना ही नहीं यदि गलत दृष्टिकोण मिला है तो अन्य लोगों द्वारा यह गलती बताने के बावजूद उन में से सिर्फ 20% लोग अपने गलत सोच को बदल पाते हैं.
अनुंसंधानों से पता चला है कि यदि पिता मां के साथ नीच एवं क्रूर तरीके से व्यवहार करता है तो पुत्र के पुरुषविरोधी हो जाने की बहुत अधिक संभावना है. स्त्रीसमलैंगिकों में से बहुत सी कन्यायें इस तरह की पृष्ठभूमि से होती हैं. उसी तरह से यदि मां पुरुषविरोधी एवं हर तरह से पति को नीचा दिखाने वाली एवं घर को तानाशाही से चलाने वाली स्त्री हो तो बेटे के स्त्रीविरोधी होने की संभावना बहुत अधिक होती है. पुरुष समलैंगिकों में से बहुत अधिक लोग इस तरह की पृष्टाभूमि के होते हैं. इसे मन में रख कर मैं ने इस लेखन परंपरा का शीर्षक बेटा जब समलैंगिक हो जाये रखा है. यह शीर्षक लेखन के विषय की ओर इशारा मात्र करता है.
अब वापस आते हैं मूल विषय पर — स्त्रियों के साथ पुरुष का दुर्व्यवहार — जिसकी चर्चा हम ने कुछ दिन पहले शुरू की थी. एक नन्हा बालक यह सीख कर नहीं पैदा होता कि उसे स्त्री को क्या समझना चाहिये, स्त्री को घरसमाज में क्या स्थान देना चाहिये, एवं नारी से किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिये. वह तो एक कोरे कागज के समान कोरा मन लेकर पैदा होता है जिस पर उसके पिता, माता, परिवार के अन्य लोग, बडेबूढे आदि प्रभाव डालते हैं. वह कोरा कागज धीरे धीरे भरने लगता है. इस में से कुछ बातें एक धब्बे के समान उसके मन पर स्थाई असर डाल देते हैं जिनको किसी भी हालत में आसानी से नहीं मिटाया जा सकता है. स्वाभाविक है कि स्त्रीजन के बारें में उसको जो भी नजरिया दिया जाता है वह उससे शायद ही हटे. बलात्कारियों एवं स्त्रीशोषण में लिप्त बहुत से लोग मुलत: स्त्री को सिर्फ भोग्या समझते है. सवाल यह है कि यह सोच कहां से आई एवं कैसे उनके मन में घर कर गई. [शेष अगले लेख में] [Photograph by tp]
पृष्ठभूमि:




January 31st, 2008 at 7:05 am
शिशु एक कोरे कागज के समान कोरा मन लेकर पैदा होता है जिस पर उसके पिता, माता, परिवार के अन्य लोग, बडेबूढे आदि प्रभाव डालते हैं.यहीं से उसे संस्कार मिलते हैं। कुल मिला कर दोष भी संस्कृति का भाग हैं और विकृतियां भी। आप का यह आलेख महत्वपूर्ण मोड़ पर पंहुँच रहा है।
January 31st, 2008 at 10:48 am
आपके विषयों की विविधता देख कर विस्मित हूँ.समलैंगिकता पर जानकारी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस पर खुलकर बातचीत बहुत कम होती है.यह समाज के उन पहलुओं में से है जिसको अंग्रेज़ी में कहा जा सकता है…’swept under the carpet’ .एक सत्य जिसका सामना करना नहीं चाह्ते या वो सत्य जो है पर हम सोचते हैं कि आँख मूँद लेंगे तो नहीं रहेगा .
February 7th, 2008 at 9:39 pm
यह कहना असत्य है कि समलैंगिकता पालन-पोषण का परिणाम है। वैज्ञानिक समुदाय में भी इस प्रकार का कोई सिद्धान्त नहीं है। और यदि यह सत्य होता तो फिर एक ही माँ-बाप द्वारा पले एक ही घर में ऐसा क्यों देखने को मिलता कि एक सदस्य समलैंगिक है और शेष सदस्य इतरलिंगी हैं? ऐसा कहना असत्य होगा कि किसी व्यक्ति की भावनात्मक तथा लैंगिक कामनाएँ विपरीत या फिर सम लिंग के प्रति इस लिए पैदा होती हैं क्योंकि उसका पालन-पोषण किसी विशेष तरीक़े से किया गया है।