पिछले दिनों गूगल एडसेंस से कमाई के बारें में काकेश का एक दिलचस्प लेख पढा, एवं मुझे लगा कि चिट्ठाकारों को कुछ काम की जानकारी एवं प्रोत्साहन दूँ. आज पश्चिमी देशों में चिट्ठाकारी आय का इतना अच्छा साधन बन चुका है कि कई लोग विज्ञापनों द्वारा आराम से सौ से हजार डालर प्रति माह आय प्राप्त कर लेते हैं. [कुछ बिरले लोग दस हजार डालर प्रति माह तक कमा लेते हैं लेकिन वे अपवाद हैं एवं उनके कारण किसी भी व्यक्ति को दिवास्वप्न नहीं देखना चाहिये].

AdSense हिन्दीजगत में इसके लिये रास्ता खोला था रवि रतलामी ने. रविजी ने इसका व्योरा मेरी व्यवसायिक चिट्ठाकारी का एक (सफल?) साल … में दिया है जिसे आपकी जानकारी के लिये वैसा का वैसा नीचे दिया जा रहा है.

[लेख आरंभ] पिछले वर्ष, आज ही के दिन, मैंने अपने कदम पूर्ण व्यवसायिक चिट्ठाकारी की दुनिया में रखे थे.

मैंने चिट्ठाकारी की शुरुआत ब्लॉगर के इसी चिट्ठे से की थी, पर बीच में कुछ अरसा वर्डप्रेस हिंदिनी पर छींटें और बौछारें में लिखता रहा था. परंतु हिंदिनी की प्रतिबद्धता में व्यवसायिकता का स्थान नहीं होने के कारण मैं वापस अपने पुराने चिट्ठे – यानी इसी चिट्ठे पर आ गया था.

उस वक्त मेरा प्रेरणा स्रोत रहा था सृजनशिल्पी जीरमण जी के चिट्ठा पोस्ट जिसमें हिन्दी चिट्ठाकारी के व्यवसायिक होने-न-होने पर बड़ी अच्छी बहस की गई थी.

हालांकि मेरे उक्त कदम को कई मित्रों ने सहजता से स्वीकार नहीं किया था और, संभवतः वह नाराजगी अभी भी बनी ही हुई है. शुरुआत में मेरे चिट्ठों में विज्ञापनों की बौछार देख कर मेरे कई पाठक बिदक भी गए थे. फ़ुरसतिया जी तो हमेशा मौज लेते रहे और उन्होंने कोई मौका छोड़ा भी नहीं – वे कहते रहे - रतलामी जी के चिट्ठे पर विज्ञापन के बीच पोस्ट है या पोस्ट के बीच विज्ञापन, यह तय करने में किसी बड़े शोधकर्ता को भी पसीना आ जाएगा. परंतु, ये बात भी तय है कि (अंग्रेज़ी के) कुछ महा सफल (व्यवसायिक ही!) ब्लॉगरों की तुलना में मेरे चिट्ठे में हर हमेशा विज्ञापनों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम ही रही है (ऐसा मेरा मानना है). और, मैंने अपने किसी चिट्ठे में यह भी बताया था कि यदि पाठक मेरे चिट्ठे के विज्ञापनों से अपने आप को त्रस्त होता सा महसूस करते हैं तो प्रॉक्सी (जैसे पीकेब्लॉग) के जरिए विज्ञापन मुक्त पढ़ सकते हैं या फ़ीड सब्सक्राइब कर पूरी सामग्री विज्ञापन मुक्त पढ़ सकते हैं.

बहरहाल, विज्ञापन पुराण समाप्त कर आगे चलते हैं – देखते हैं कि क्या मेरी चिट्ठाकारी व्यवसायिक रूप से सफल हुई या नहीं. जब मैंने अपनी चिट्ठाकारी को पूरा व्यवसायिकता का रंग पहनाया था तो मेरे जेहन में सिर्फ यही विचार था कि इससे जैसे तैसे मेरे इंटरनेट का खर्च निकल आए. साल भर बाद, आज की स्थिति में मैं यह कह सकता हूँ कि हिन्दी चिट्ठाकारी के जरिए मेरे इंटरनेट कनेक्शन का मासिक बिल बड़ी आसानी से भरा जा रहा है – और, सिर्फ और सिर्फ यही लक्ष्य तो मैंने तय किया था.

मेरे चिट्ठों की कुछ सामग्री प्रभासाक्षी में नियमित प्रकाशित होती रही जहाँ से पत्रम्-पुष्पम् प्राप्त होते रहे. इसी तरह यदा कदा कुछ सामग्री इतर पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होती रही ( अधिकतर बिना पारिश्रमिक के, :)) तो यहाँ से भी प्राप्त आय को मैंने इसमें शामिल माना है.

तो, भविष्य में क्या कोई हिन्दी चिट्ठाकार अपनी दाल रोटी हिन्दी चिट्ठाकारी के जरिए कमा सकता है?

जी, हाँ. बिलकुल. निश्चित रूप से. परंतु इसमें थोड़ा सा समय लग सकता है. पाठकों के क्रिटिकल मास तक पहुँचने से पहले ये सपना देखना बेमानी होगा. क्रिटिकल मास माने – एक चिट्ठे के नियमित, नित्य, दस हजार पाठक. कौन जाने कब, पर यह दिन आएगा जरूर. चिट्ठों और पाठकों की बढ़ती रफ़्तार को देख कर लगता तो है कि हिन्दी चिट्ठाकारी जल्द ही – अपने चिट्ठाकारों के लिए दाल-रोटी का भी प्रबंध करने लगेगी. [लेख अंत]

हिन्दी जगत हमेशा रवि जी का आभारी रहेगा कि उन्होंने आय का रास्ता ढूढा एवं इसके मामले में खुल कर लिखा. सन 2008 मे स्थिति और अच्छी हो गई है, एवं 2010 तक चिट्ठे द्वारा आराम से सौ डालर (लगभग 4000 रुपये) एक माह में कमाये जा सकते हैं. लेकिन उसकी तय्यारी आज से करनी होगी. [क्रमश:]

ऎडसैन्स से कमाई क्या सचमुच….!!
एड्सेन्स से बढ़ती कमाई
ऎडसैन्स से कमाई डॉलर पेमेंट आने पर एक फ़ीस भी कटती है

चिट्ठा परिचय
Anunad

हिन्दी चिट्ठाकारिता एवं हिन्दी जालजगत के एक समर्पित
व्यक्ति हैं अनुनाद सिंह जी. चिट्ठे पर लिखते कम हैं लेकिन
जो लिखते हैं वह काफी वजनदार या उपयोगी होता है.

कृपया ऊपर दिये गये चित्र को किलकायें, प्रतिभास से मुलाकात करें,
उसको अपने पुस्तचिंह में जोड लें, एवं एक समर्पित लेखक
की कलम (कीबोर्ड) का आनंद लें!!


Comments

8 Comments so far

  1. kakesh on February 4, 2008 6:46 am

    आगे आप और इसके बारे में लिखेंगे उसी की प्रतीक्षा है.

  2. दिनेशराय द्विवेदी on February 4, 2008 6:57 am

    चिट्ठे से अगर उस का खर्च निकाला जा रहा है तो उसे आय नहीं कहा जा सकता। इसे आप केवल मुफ्त में शौक पूरा करना या फिर भला काम करना कह सकते हैं।
    लेकिन अगर यह आय का स्रोत बने तो अनेक व्यावसायिक चिट्ठाकारों को जन्म देगा। ये चिट्ठाकार प्रदूषण फैलाने वाले भी हो सकते हैं। बल्कि मैं कहूँ कि वे तो उगेंगे ही। अगर कोई सार्थक चिट्ठाकार व्यावसायिक होता है तो इस से अच्छा और क्या हो सकता है?

  3. arvind mishra on February 4, 2008 7:49 am

    I wish to add the following which may be relevant to discussion-
    http://hindi.rcmishra.net/2008/01/increasing-adsense-earnings.html

  4. mamta on February 4, 2008 9:26 am

    चिटठा कारी के साथ-साथ अगर आय भी होती है तो ये अच्छी बात है। पर अभी शायद इसमे समय लगेगा।

  5. रवि on February 4, 2008 10:01 am

    दिनेशराय जी का कहना सही है - अंग्रेज़ी में सिर्फ एडसेंस की कमाई के उद्देश्य वाले सैकड़ों चिट्ठे हैं जो काम की सामग्री न देकर इधर उधर की, नकल की हुई सामग्री परोसते हैं और बहुत बार तो असंदर्भित. हिन्दी में भी इसकी पुनरावृत्ति तो निश्चित ही होगी. ऐसे में पाठकों को ही सुसंस्कृत सुशिक्षित होना होगा कि वो अपने काम की सामग्री खोजबीन कर खुद छांटे.

    और, शास्त्री जी, ऐसे बिरले लोगों में (जो दसहजार डालर प्रतिमाह से अधिक कमाते हैं) हमारे भारत के आगरा के रहने वाले श्री अमित अग्रवाल भी हैं जो डिजिटल इंस्पायरेशन नाम का ब्लॉग लिखते हैं - और मेरी प्रेरणा स्रोत भी वे ही रहे हैं!

  6. समीर लाल on February 4, 2008 11:31 am

    बस इसी उम्मीद में लिखे जा रहे हैं. :)

  7. अजित वडनेरकर on February 4, 2008 2:57 pm

    दिनेशजी सही कह रहे हैं मगर शास्त्रीजी अगर आशा बंधा रहे हैं तो वह दिन दूर नहीं है। चार हज़ार रुपए भी बुरे नहीं हैं। शास्त्रीजी मेरे चिट्ठे के बारे में क्या सोचते हैं। यह भी कुछ कमा सकता है या नहीं। इस पर कोई विज्ञापन आ सकता है…:)

  8. राजीव तनेजा on February 5, 2008 12:27 am

    उम्मीद पे दुनिया कायम है….

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हिन्दी में टंकण के लिये पहले http://quillpad.in/hindi/ पर चले जाईये. टंकण के बाद उसे यहां नकलचिपका लीजिये

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