मेरे पिछले चिट्ठे से आय की तय्यारी 001 में मैं ने हिन्दी चिट्ठों पर विज्ञापन द्वारा आय का एक एतिहासिक सर्वेक्षण प्रस्तुत किया था. आज अंग्रेजी जगत में चिट्ठे द्वार 100 डालर से 1000 डालर प्रति माह आमदनी आम बात है. लेकिन हिन्दीजगत भिन्न है, विज्ञापन का असर कम होता है. आय बहुत कम होती है. लेकिन फिर भी रवि रतलामी जैसे भविष्यदर्शी व्यक्ति ने इस दिशा में पहल की एवं आजकल कई हिन्दी चिट्ठों पर विज्ञापन दिखते हैं. [सारथी पर भी हम ने लेखों के अंत में विज्ञापन देना शुरू किया था, लेकिन मेरे एक चिट्ठा-मित्र के सुझाव के कारण उसे हटा दिया गया है. उनके सुझाव के अनुसार जल्द ही सारथी की बगलपट्टी पर विज्ञापन आने लगेगा].

Ad001

कई मित्र विज्ञापन से आय की बात सुनते हैं तो एकदम से लाखों कमाने की सोचते हैं. लेकिन हर्र लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा होय यहां नहीं चलेगा. रवि जी ने अपने लेख में बताया है कि किस तरह से बहुत ही व्यावहारिक लक्ष्य लेकर वे चले थे: साल भर के इंटरनेट मात्र का खर्चा निकल आये, न कि हर दिन लाटरी खुले.

अत: जो भी व्यक्ति जाल से आय की सोच रहा है वह इस बात को समझ ले कि यदि वह कठोर मेहनत करने को तय्यार है एवं नियमित रुप से रवि जी के समान जनोपयोगी सामग्री परोसने को तय्यार है और आज से यह कार्य चालू कर दे तो 2010 के अंत में वह 10 से 100 डालर (लगभग 400 से 4000 रुपये) प्रति महीना आय की सोच सकता है. अधिकतर लोग 10 के आसपास ही रहेंगे क्योंकि वे मेहनत करना नहीं चाहते. हां, यदि आपको यह आय कम लगती है तो मेरे लेख की उपेक्षा कर दें एवं रोज अपने दिवास्वप्न की लाटरी कटाते रहें. अंत में आपको ये सुझाव मानने ही पडेंगे, लेकिन तब तक आप इस दौड में काफी पीछे छूट चुके होंगे. इसका कारण समझ लें.

1. कुछ लोगों को यह गलतफहमी है कि बस विज्ञापन क्लिक करते रहें आपकी आमदनी बढती रहेगी. ऐसा नहीं है. पहली बात, अधिकतर विज्ञापनदाता विज्ञापन क्लिक होने के लिये नहीं बल्कि माल खरीदे जाने पर उस के कमीशन के रूप में पैसा देते है. अत: यदि आप के क्लिकों से खरीददारी नहीं होती तो आपको कुछ नहीं मिलेगा — समय, बिजली, मेहनत जाया होगी, दिवास्वप्न भंग हो जायगा.

2. कुछ विज्ञापनदाता जरूर विज्ञापन पर क्लिक के लिये पैसा देते हैं, लेकिन अकसर यह 1 सेंट से 2 सेंट प्रति क्लिक होता है. जिसका मतलब है कि सौ बार क्लिक हो तो 1 डालर आपके खाते में. यदि आपको लगता है कि ऐसे विज्ञापनों पर अपने आप क्लिक करके या आपस में क्लिक करके आप आय बढा सकते हैं तो यह मूर्खता है. उल्टे आपको लेने के देने पड जायेंगे. [क्रमश:]

चिट्ठे से आय की तय्यारी 001

आज का चिट्ठा

Pankaj

सहस्त्रों सालों के निरीक्षण परीक्षण से भारतीय मनीषियों एवं
अनुसंधानकर्ताओं ने जो पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान एकत्रिक किया
उसे लुप्त होने से बचाने का एक सराहनीय यत्न.

कृपया चित्र पर चटका लगायें एवं पंकज अवधिया की साधना से
परिचित हो जायें!

 


Comments

3 Comments so far

  1. दिनेशराय द्विवेदी on February 5, 2008 6:41 am

    आज तो विज्ञापनों की इतनी बाढ़ है कि यह संस्कृति का भाग मालूम होने लगी है। कुछ भी अगर विज्ञापनों के बिना होगा तो आँख को भी अजीब सा लगता है। अच्छा लगा कि आप के चिट्ठे पर विज्ञापन आए।

  2. Gyan Dutt Pandey on February 5, 2008 6:43 am

    आप सही कहते हैं। मैने तो अपने ब्लॉग पर विज्ञापन उनकी आर्थिक वैल्यू जांचने को ही लगा रखे हैं।
    और वैल्यू कछुआ गति से बढ़ रही है। वह गति जो थका दे और खरगोश को सुला दे।

  3. kakesh on February 5, 2008 7:00 am

    चलिये देखते हैं.

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हिन्दी में टंकण के लिये पहले http://quillpad.in/hindi/ पर चले जाईये. टंकण के बाद उसे यहां नकलचिपका लीजिये

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