Bhuvnesh

भुवनेश, शास्त्री, डा. महेश प्रकाश. भुवनेश के घर के सामने

जैसे ही मैं ने पुरातत्व संबंधी बहुत ही महत्वपूर्ण “ककनमठ” जाने की इच्छा के बारे में सारथी में लिखा, उसी समय हिन्दी पन्ना के भुवनेश ने मुझे ईपत्र लिख कर एवं दूरभाष द्वारा ककनमठ एवं उसके लगभग 60 किलोमीटर व्यास के कई सारे महत्वपूर्ण स्थानों की जानकारी दी. उन्होंने इन स्थानों के चित्र भी भेजे. (उनके द्वारा सुझाये गये बटेश्वर एवं चौसठ योगिनी मंदिर के छायाचित्र के लिये इसी साल ग्वालियर वापस जाने का इरादा बना लिया है).

Bhuvnesh2 ककनमठ यात्रा से लौटते समय हम भुवनेश के घर उतरे, पहली बार उन से मुलाकात की, चायनाश्ता किया एवं रात को घर वापस पहुंचे. भुवनेश से मुलाकात मेरे लिये उतना ही महत्वपूर्ण था जितना ककनमठ का दर्शन. कारण स्पष्ट है — वे एक ऐसे मित्र हैं जो सिर्फ चिट्ठाकारी के कारण मुझे मित्ररूप में मिले हैं.

अत: आज का लेख मैं भुवनेश को समर्पित करता हुँ. इसके साथ साथ यह लेख उन सब वरिष्ट एवं कनिष्ट मित्रों को भी समर्पित है जो “सारथी” द्वारा मुझे मिले हैं.


Comments

9 Comments so far

  1. दिनेशराय द्विवेदी on March 27, 2008 7:23 am

    चिट्ठाकारों के बीच अनेक सहृदय,उत्साही,कर्मठ और सामाजिक व्यक्ति हैं। इस माध्यम के बिना जिनसे परिचय संभव न होता। इन में से किसी से भी मिलना सुखद अनुभव ही होगा। आपस में मिलना मानवता के उद्देश्यों को आगे ही बढ़ाएगा।

  2. भुवनेश on March 27, 2008 8:47 am

    शास्‍त्रीजी मैं अप्रैल में इन स्‍मारको को देखने जा रहा हूं. यदि कैमरे का इंतजाम हो सका तो चित्र सहित जानकारी अपने चिट्ठे पर प्रकाशित करूंगा.

  3. समीर लाल on March 27, 2008 9:57 am

    वाह साहब, खूब मुलाकात हो ली आपकी भुवनेश भाई से. बधाई.

  4. ravindra.prabhat on March 27, 2008 12:24 pm

    आपस में विचारों का आदान-प्रदान और सहयोग की भावना रिश्तों में मजबूती का परिचायक होता है , यह सिलसिला बना रहे , यही कामना है !

  5. Sanjeet Tripathi on March 27, 2008 1:06 pm

    बधाई आप दोनों को मुलाकात की!

  6. Isht Deo Sankrityaayan on March 27, 2008 1:18 pm

    मुलाक़ात और घुमक्कडी दोनों की बधाई.पूरे यात्रा वृत्तांत और उसके फोटुओं की प्रतीक्षा रहेगी. धन्यवाद उसके बाद ही देंगे.

  7. मीनाक्षी on March 28, 2008 12:17 pm

    आपके लेख हमारे लिए रास्ता साफ कर रहे हैं. यात्रा-वृत्तांत और ऐतिहासिक जानकारी को दस्तावेज़ बनाना सीख रहे हैं. आभार्

  8. anitakumar on April 1, 2008 7:12 am

    हमें भी इस बात का एहसास हो रहा है कि चिठठाकारी कई नये मित्र दे जाती है। भुवनेश जी के ब्लोग के बारे में पता नही था, अब देखेगें।

  9. vinod on April 5, 2008 10:16 am

    Sarthi is great
    For all indians who are interested in reading

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हिन्दी में टंकण के लिये पहले http://quillpad.in/hindi/ पर चले जाईये. टंकण के बाद उसे यहां नकलचिपका लीजिये

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