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	<title>Comments on: क्या आर्यों का &#8216;पणि&#8217; सिंधु सभ्यता से आया?</title>
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	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2009 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>By: अजित वडनेरकर</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1270/comment-page-1#comment-3270</link>
		<dc:creator>अजित वडनेरकर</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 May 2008 20:44:03 +0000</pubDate>
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		<description>बढ़िया पोस्ट है। संस्कृत का पण्य शब्द कारोबार के सिलसिले में प्रयोग होता रहा है। पण्यशाला से ही बना पणसार और फिर पंसारी अर्थात कारोबारी। इस पर मैं शब्दों का सफर में पोस्ट लिख चुका हूं। पण् प्राचीनकाल में मुद्रा भी थी। द्रविड़ भाषा में यही फणम् है। मुंबई का पनवेल भी कारोबारी तट ही था इसी लिए पण्यवेला हुआ पनवेल। शब्दों के सफर पर इसी कड़ी में कुछ और भी आगे लिखूंगा।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बढ़िया पोस्ट है। संस्कृत का पण्य शब्द कारोबार के सिलसिले में प्रयोग होता रहा है। पण्यशाला से ही बना पणसार और फिर पंसारी अर्थात कारोबारी। इस पर मैं शब्दों का सफर में पोस्ट लिख चुका हूं। पण् प्राचीनकाल में मुद्रा भी थी। द्रविड़ भाषा में यही फणम् है। मुंबई का पनवेल भी कारोबारी तट ही था इसी लिए पण्यवेला हुआ पनवेल। शब्दों के सफर पर इसी कड़ी में कुछ और भी आगे लिखूंगा।</p>
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		<title>By: सुशांत झा</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1270/comment-page-1#comment-3266</link>
		<dc:creator>सुशांत झा</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 12 May 2008 19:01:19 +0000</pubDate>
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		<description>बिल्कुल सटीक वर्णन किया है आपने..गौर से देखें तो अाज के भारत में वैसे तो कोई भी अपनी रक्त की शुद्धता का दावा नहीं कर सकता...लेकिन फिर भी अगर आर्य संस्कृति की बात की जाए..तो अभी भी देश का उत्तर और पश्चिमोत्तर भाग आर्यों की संस्कृति का ज्यादा प्रतिनिधित्व करता है..इसकी वजह...यह है कि चुंकि आर्य उत्तर-पश्चिम से आये थे..इसलिए पूरब और दक्षिण में उनका घनत्व कम है। दक्षण में तो सिर्फ ब्रा्ह्मण ही आर्य होने का दावा करते हैं..बल्कि उनमें भी हजारों सालों में कुछ मिश्रण ही हुआ है-रंग इसका प्रमाण है(हलांकि कुछ लोग इसकी वजह दक्षिण का विषुवतीयरेखा के निकट होना मानते हैं) दूसरी तरफ अगर आप देश के पूर्वी हिस्सों की तरफ बढ़े तो वहां भी पितृसत्ता कमी होती जाती है..और मातृ सत्ता का असर साफ दिखता है। गौर कीजीए..पूरा का पूरा पहाड़, और उत्तर पूर्वी भारत शाक्त मत को मानता है..जो मातृसत्ता का प्रतीक है।आर्यों के उच्च वर्ण मछली नहीं खाते थे-लेकिन अभी भी बंगाली और मैथिल ब्राह्मण मछली खाते हैं।जबकि देश का उत्तरी और पश्चिमोत्तर भाग बैष्णब है जो आर्यो के देवता थे। देश का दक्षिणी हिस्सा शैव मत को मानता है जो गैर-आर्यन देवता थे।जाहिर है..आर्यों का पुरुषवादी चरित्र अभी भी दिख ही जाता है। क्या यह आश्चर्य है कि अभी भी सबसे ज्य़ाजा कन्या भ्रूणहत्या पंजाब में ही होती है...आर्यों का गैर-आर्यों के साथ इतना मिश्रण हुआ है कि अगर मिथिलांचल  और बंगाल के लोगों की तुलना  पंजावियों के साथ की जाए तो साफ फर्क दिख जाता है।  जाहिर है..धीरे-धीरे ये बात साफ होती जा रही है कि इस देश में आर्य बाहर से ही आए थे। और अगर अगर सिंधु सभ्यता, आर्यों से पुरानी है तो अार्य ही इसके विनाशकर्ता हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बिल्कुल सटीक वर्णन किया है आपने..गौर से देखें तो अाज के भारत में वैसे तो कोई भी अपनी रक्त की शुद्धता का दावा नहीं कर सकता&#8230;लेकिन फिर भी अगर आर्य संस्कृति की बात की जाए..तो अभी भी देश का उत्तर और पश्चिमोत्तर भाग आर्यों की संस्कृति का ज्यादा प्रतिनिधित्व करता है..इसकी वजह&#8230;यह है कि चुंकि आर्य उत्तर-पश्चिम से आये थे..इसलिए पूरब और दक्षिण में उनका घनत्व कम है। दक्षण में तो सिर्फ ब्रा्ह्मण ही आर्य होने का दावा करते हैं..बल्कि उनमें भी हजारों सालों में कुछ मिश्रण ही हुआ है-रंग इसका प्रमाण है(हलांकि कुछ लोग इसकी वजह दक्षिण का विषुवतीयरेखा के निकट होना मानते हैं) दूसरी तरफ अगर आप देश के पूर्वी हिस्सों की तरफ बढ़े तो वहां भी पितृसत्ता कमी होती जाती है..और मातृ सत्ता का असर साफ दिखता है। गौर कीजीए..पूरा का पूरा पहाड़, और उत्तर पूर्वी भारत शाक्त मत को मानता है..जो मातृसत्ता का प्रतीक है।आर्यों के उच्च वर्ण मछली नहीं खाते थे-लेकिन अभी भी बंगाली और मैथिल ब्राह्मण मछली खाते हैं।जबकि देश का उत्तरी और पश्चिमोत्तर भाग बैष्णब है जो आर्यो के देवता थे। देश का दक्षिणी हिस्सा शैव मत को मानता है जो गैर-आर्यन देवता थे।जाहिर है..आर्यों का पुरुषवादी चरित्र अभी भी दिख ही जाता है। क्या यह आश्चर्य है कि अभी भी सबसे ज्य़ाजा कन्या भ्रूणहत्या पंजाब में ही होती है&#8230;आर्यों का गैर-आर्यों के साथ इतना मिश्रण हुआ है कि अगर मिथिलांचल  और बंगाल के लोगों की तुलना  पंजावियों के साथ की जाए तो साफ फर्क दिख जाता है।  जाहिर है..धीरे-धीरे ये बात साफ होती जा रही है कि इस देश में आर्य बाहर से ही आए थे। और अगर अगर सिंधु सभ्यता, आर्यों से पुरानी है तो अार्य ही इसके विनाशकर्ता हैं।</p>
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		<title>By: Dr.Arvind Mishra</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1270/comment-page-1#comment-3265</link>
		<dc:creator>Dr.Arvind Mishra</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 12 May 2008 15:08:28 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1270#comment-3265</guid>
		<description>विचारोत्तेजक ,इन्द्र का व्यक्तित्व बड़ा विवादास्पद रहा है .वे उद्धारक की भूमिका मे हैं पथ भ्रस्टक की भूमिका में भी ....अवेस्ता मे इन्द्र सरीखा एक चरित्र वर्णित है जो भय मूलक है.जीनोग्रैफी परियोजना से जो नवीनतम तथ्य मिले हैं वे यही संकेत करते हैं की आर्यों के आगमन के हजारो सालों पहले से ही एक मानव-सभ्यता भारत मे स्थापित हो चुकी थी जो अफ्रीका से केरल के समुद्री तट से भारतीय भूभाग मे प्रवेश पा चुकी थी ....और संभवतः  कालांतर में उत्तर की और बढ़ कर साम्राज्य विस्तार भी किया होगा  .कहीं यही  सैन्धव सभ्यता के मूल वासी तो नही थे ....अब मिथकों के परिप्रेक्ष्य में इस संकल्पना को देखें -
देवासुर संग्राम की कथा कहाँ फिट बैठती है .....और राम रावण युद्ध ........???????????
बहुत उलझा मामला है ....मगर अब कुछ झरोखे  खुल रहे हैं ,देवासुर संग्राम में इन्द्र हैं --राम् रावण तक आते आते उनका उल्लेख कम ही है ..हम एक मिश्रित विरासत जी रहे हैं सब कुछ मिला जुला है ..हमारे स्मृति शेषों में कही इन्द्र एक विधर्मी है तो कहीं वह रक्षक की भूमिका मे है .
देवासुर संग्राम कहीं आर्य -सैन्धव महायुद्ध की स्मृति ही तो नही है ?स्त्री लोलुपता इन्द्र के चरित्र मे है ,पराक्रम भी उसका एक प्रमुख दर्शित गुण है .स्त्रियों की स्मृति अवतरण के चलते वह भोगी है ,पर  सोम प्रेमी आर्य पुत्रों की स्मृति परम्परा में वह महा बलशाली है .
आर्यों ने इन्द्र के नेतृत्व में सैधव पुरुषों का संहार किया किंतु स्त्रियों को अपने भोग विलास के लिए रख छोडा -आगामी वंश परम्परा मे इसलिए इन्द्र का विरोधाभासी व्यक्तित्व  ---माँ की तरफ से कुछ बताया गया ,पिता  की तरफ से कुछ .सब गड मड  होता गया ........[यह केवल मेरे मन का फितूर है पर आज की पोस्ट इतनी रोचक थी कि मैं इन उदगारों को रोक न सका .....अब यह एक्सपर्ट विचार के लिए प्रस्तुत है ]-कृपया यह वेब साईट भी देखें -
https://www3.nationalgeographic.com/genographic/</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>विचारोत्तेजक ,इन्द्र का व्यक्तित्व बड़ा विवादास्पद रहा है .वे उद्धारक की भूमिका मे हैं पथ भ्रस्टक की भूमिका में भी &#8230;.अवेस्ता मे इन्द्र सरीखा एक चरित्र वर्णित है जो भय मूलक है.जीनोग्रैफी परियोजना से जो नवीनतम तथ्य मिले हैं वे यही संकेत करते हैं की आर्यों के आगमन के हजारो सालों पहले से ही एक मानव-सभ्यता भारत मे स्थापित हो चुकी थी जो अफ्रीका से केरल के समुद्री तट से भारतीय भूभाग मे प्रवेश पा चुकी थी &#8230;.और संभवतः  कालांतर में उत्तर की और बढ़ कर साम्राज्य विस्तार भी किया होगा  .कहीं यही  सैन्धव सभ्यता के मूल वासी तो नही थे &#8230;.अब मिथकों के परिप्रेक्ष्य में इस संकल्पना को देखें -<br />
देवासुर संग्राम की कथा कहाँ फिट बैठती है &#8230;..और राम रावण युद्ध &#8230;&#8230;..???????????<br />
बहुत उलझा मामला है &#8230;.मगर अब कुछ झरोखे  खुल रहे हैं ,देवासुर संग्राम में इन्द्र हैं &#8211;राम् रावण तक आते आते उनका उल्लेख कम ही है ..हम एक मिश्रित विरासत जी रहे हैं सब कुछ मिला जुला है ..हमारे स्मृति शेषों में कही इन्द्र एक विधर्मी है तो कहीं वह रक्षक की भूमिका मे है .<br />
देवासुर संग्राम कहीं आर्य -सैन्धव महायुद्ध की स्मृति ही तो नही है ?स्त्री लोलुपता इन्द्र के चरित्र मे है ,पराक्रम भी उसका एक प्रमुख दर्शित गुण है .स्त्रियों की स्मृति अवतरण के चलते वह भोगी है ,पर  सोम प्रेमी आर्य पुत्रों की स्मृति परम्परा में वह महा बलशाली है .<br />
आर्यों ने इन्द्र के नेतृत्व में सैधव पुरुषों का संहार किया किंतु स्त्रियों को अपने भोग विलास के लिए रख छोडा -आगामी वंश परम्परा मे इसलिए इन्द्र का विरोधाभासी व्यक्तित्व  &#8212;माँ की तरफ से कुछ बताया गया ,पिता  की तरफ से कुछ .सब गड मड  होता गया &#8230;&#8230;..[यह केवल मेरे मन का फितूर है पर आज की पोस्ट इतनी रोचक थी कि मैं इन उदगारों को रोक न सका .....अब यह एक्सपर्ट विचार के लिए प्रस्तुत है ]-कृपया यह वेब साईट भी देखें -<br />
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	<item>
		<title>By: vijayshankar chaturvedi</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1270/comment-page-1#comment-3264</link>
		<dc:creator>vijayshankar chaturvedi</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 12 May 2008 04:42:59 +0000</pubDate>
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		<description>शास्त्री जी, मेरा आलेख पुनः प्रकाशित करने के लिए धन्यवाद!
भाई दिनेशराय द्विवेदीजी ने मेरे &#039;आजाद लब&#039; वाली पोस्ट पर इसी तरह की अच्छी टिप्पणी की थी. जान पड़ता है कि उनका इस सम्बन्ध में मुझसे कहीं ज्यादा गहन और विस्तृत अध्ययन है. आप उनसे अनुरोध करें कि वह इस सम्बन्ध में दो-चार आलेख लिखें. मैं भी उन्हें re-produce करूंगा. धन्यवाद!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शास्त्री जी, मेरा आलेख पुनः प्रकाशित करने के लिए धन्यवाद!<br />
भाई दिनेशराय द्विवेदीजी ने मेरे &#8216;आजाद लब&#8217; वाली पोस्ट पर इसी तरह की अच्छी टिप्पणी की थी. जान पड़ता है कि उनका इस सम्बन्ध में मुझसे कहीं ज्यादा गहन और विस्तृत अध्ययन है. आप उनसे अनुरोध करें कि वह इस सम्बन्ध में दो-चार आलेख लिखें. मैं भी उन्हें re-produce करूंगा. धन्यवाद!</p>
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		<title>By: दिनेशराय द्विवेदी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1270/comment-page-1#comment-3263</link>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 12 May 2008 02:22:05 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1270#comment-3263</guid>
		<description>विजयशंकर जी का यह आलेख पढ़ा, उन से सहमति है। मेरे विचार में पणि शब्द भी आर्यों में सिन्धु सभ्यता से इण्टरेक्शन के उपरांत ही जन्मा होगा। फिर भी आर्यों से प्राचीन, विकसित और समृद्ध थी सिन्धु सभ्यता। आज भी हिन्दू संस्कृति पर उस का अधिक प्रभाव है बनिस्पत आर्य सभ्यता के। आर्य तत्व लगातार प्रभुत्व स्थापित करने के प्रयत्न करते रहे हैं, आज तक भी। आर्यों की मूल भूमि भारत को बताया जाना भी उसी का एक लक्षण है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>विजयशंकर जी का यह आलेख पढ़ा, उन से सहमति है। मेरे विचार में पणि शब्द भी आर्यों में सिन्धु सभ्यता से इण्टरेक्शन के उपरांत ही जन्मा होगा। फिर भी आर्यों से प्राचीन, विकसित और समृद्ध थी सिन्धु सभ्यता। आज भी हिन्दू संस्कृति पर उस का अधिक प्रभाव है बनिस्पत आर्य सभ्यता के। आर्य तत्व लगातार प्रभुत्व स्थापित करने के प्रयत्न करते रहे हैं, आज तक भी। आर्यों की मूल भूमि भारत को बताया जाना भी उसी का एक लक्षण है।</p>
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		<title>By: समीर लाल</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1270/comment-page-1#comment-3262</link>
		<dc:creator>समीर लाल</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 12 May 2008 01:28:10 +0000</pubDate>
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		<description>चतुर्वेदी जी ने बहुत ज्ञानवर्धक जानकारी दी है, आभार.</description>
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