पिछले तीनचार दिनों से चिट्ठाकार ईसमूह में हिन्दी/अंग्रेजी पर काफी अच्छी चर्चा चल रही है. कई ऐसे प्रस्ताव आये हैं जो महज भावनात्मक है लेकिन कई ऐसे भी प्रस्ताव आये हैं जो जमीनी धरातल पर विषय का सटीक विश्लेषण करते हैं. देवयोग से आज ही एक अंग्रेजी शोध-पत्रिका में लार्ड मेकाले के एक लेख के कुछ हिस्से दिखे जिन में उस ने भारतीय संस्कृति के बारे में काफी हेय तरीके से लिखा है अत: मुझे लगा कि इस विषय पर आज कुछ लिखना जरूरी है. इस चर्चा में अनुनाद जी ने लिखा: “अंग्रेजी आज एक हथियार है। कोई भी शोषण किसी हथियार का सहारा लेकर ही किया जाता है। यदि खेल का नियम (रूल आफ द गेम) इस तरह से बनाया जाय कि एक खिलाड़ी को उस नियम के वजह से फायदा हो और दूसरा उसके कारण जबर्जस्त घाटे में रहे – तो खेल के नियमों को बदलने की जरूरत है।अंग्रेजी भाषा अच्छी हो सकती है; (और भी भाषायें अच्छी हैं) लेकिन प्रश्न यह है कि भारत में उसे जो महत्व दिया जा रहा है क्या वह उसकी अधिकारिणी है और क्या यह भारत के दीर्घावधि भविष्य के लिये ठीक है?” यह एकदम सही विश्लेषण है जिसके जवाब में मैं ने लिखा “अंग्रेजी वाकई में बहुत अच्छी एवं अतिसमृद्ध भाषा है. लेकिन आज हिन्दुस्तान में इसे जो अत्योन्नत स्थान एवं महत्व दिया जा रहा है वह किसी भी भारतीय भाषा के दीर्घावधि भविष्य के लिये किसी भी तरह से अच्छा नहीं है. अंग्रेजी को जो स्थान दिया जा रहा है उसके कारण जाने अनजाने हिन्दी के साथ सौतेला व्यवहार होता है. इससे हिन्दीभाषी हीन भावना से ग्रस्त हो जाता है. उसके समक्ष विकास के रास्ते अवरुद्ध हो जाते है. वह अंग्रेजी की गुलामी के लिये मजबूर हो जाता है.” इस के जवाब में दिनेश जी ने (तीसरा खंबा) लिखा कि “भाई लोगों ! सब के विचार पढ़ लिए हैं। अपना तो एक सूत्र है। हिन्दी को ऐसा बनाओ कि उस का अधिक से अधिक प्रयोग बढ़े। हिन्दी में हर प्रकार की सामग्री बढाओ जिस से उसे तलाश करने के लिए दूसरी भाषा में न जाना पड़े। हिन्दी का प्रयोग करने वाले दूसरी भाषाओं के जितने भी शब्दो का प्रयोग करते हैं उन्हें हिन्दी शब्दकोष में शामिल करो। हिन्दी को लोक की भाषा से लेकर अदालत, कानून, विज्ञान, साहित्य, व्यवसाय और भी जहाँ जहाँ उस का प्रयोग हो सकता है वहाँ प्रयोग के लायक बनाओ। इस के लिए उसे कभी कभी हिंगलिश भी लगना पड़े तो लगने दो। हिन्दी तो आगे ऐसे ही बढ़ेगी और जरूर बढ़ेगी, रोकने वाले कब तक रोकेंगे इसे? हम कहते हैं जिसे रोकना हो रोक ले, यह फिर भी आगे बढ़ेगी। कहीं रोक लोगे तो वह बाधा के बांध तोड़ कर बढ़ेगी। विचार से अधिक जरुरत है काम की। जितना हो सके हिन्दी में काम करो।” आज मैं अपने सारे पाठकों का आह्वान करना चाहता हूँ कि जहां तक हो सके वे हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिये हिन्दी लेखकों को प्रोत्साहित करें. गैर हिन्दी भाषी राज्यों से पत्रमित्र बनायें एवं उनको हिन्दी सीखने में मदद करें. सबसे बडी बात, हिन्दी के उस रूप को विकसित करें जो क्लिष्ट नहीं बल्कि हर व्यक्ति को समझ आये. सरिता जैसी पारिवारिक पत्रिका एवं हंस जैसी साहित्यिक पत्रिका ऐसी हिन्दी के प्रयोग के अच्छे नमूने हैं.
इस विभाग के पिछले 10 पोस्ट




May 22nd, 2008 at 11:50 pm
बिलकुल सही कहा है आपने…..हिंदी है तो हम हैं…हिंदी है तो हमारा अपना एक वजूद है। दिनेश जी की हिंगलिश वाली बात भी बढ़िया है —जिस अंग्रेजी शब्द का अर्थ नहीं पता उसे इंगलिश में ही लिख डालें लेकिन देवनागरी में ..तो भी ठीक है। इतना बढ़िया लिखा है कि सोच रहा हूं कि मैं अपने आलेखों में जो बिना वजह दो-चार पंक्तियां अंग्रेज़ी की डाल देता हूं ………अब तो भई उन से भी परहेज किया करूंगा। अगर कभी डालनी ही होगी तो उसी बात को देवनागरी में लिख दिया करूंगा।
धन्यवाद ..आपने बहुत अच्छे मुद्दे पर लिखा है।
May 23rd, 2008 at 12:43 am
सही कहते है शास्त्री जी. हिन्दी ही हिन्दुस्तान को जोड़ सकती है. आज भी मिट्टी से जुड़े अधिकतर हिन्दी का प्रयोग करते है. हिन्दी पर और हिन्दी बोलने पर गर्व है मुझे.
May 23rd, 2008 at 5:14 am
शास्त्री जी। बहुत दिनों बाद सारथी पुनः दिखाई दिया। आप की लगातार उपस्थिति को हिन्दी चिट्ठाकारी को आवश्यकता है। यह एक प्रकार का अनुशासन उत्पन्न करता है। हो सकता है आप अधिक व्यस्त रहें हों। फिर भी यदि हर सप्ताह में कम से कम तीन दिन भी सारथी आता रहे और संवाद बना रहे।
May 23rd, 2008 at 5:16 am
कहाँ चले गये थे आप? आशा करता हूँ सब बढ़िया होगा.
May 23rd, 2008 at 6:13 am
इन दिनों आप की उपस्थिति नियमित नही है और आप अपनी अनुपस्थिति के चलते भी चर्चित हैं -हिन्दी पर बहुत चर्चा हो गयी है .Let us work now !
May 23rd, 2008 at 7:05 am
हमें हिन्दी को अच्छी अच्छी सामग्रियों से सम्रद्ध बनाने की आवश्यकता है. मैं तो कम से कम इसी काम में लगा ही हुआ हूँ.
May 23rd, 2008 at 7:27 am
चर्चा भी बढि़या रही और आपका आना भी.
आपको मेरा कोरियर मिला या नहीं ?
May 23rd, 2008 at 9:21 am
अपनी अनुपस्थिति के लिये क्षमा प्रार्थी हूँ. अब नियमित मिलेंगे.
भुवनेश, हां वह पेकेट मिल गया. आभार !!
May 23rd, 2008 at 9:38 am
सही है। लेकिन, आपकी हिंदी ब्लॉगिंग में निरंतर उपस्थिति भी हिंदी के लिए बहुत जरूरी है।
May 23rd, 2008 at 11:12 am
हमें तो चारों ओर हिन्दी ही हिन्दी दिखती है, बस देखने वाले की नजर पर है की वह क्या देखता है
आपने सही कहा…हिन्दी ही हिन्दुस्तान को जोड़े हुए है.
May 23rd, 2008 at 1:53 pm
आप सकुशल हैं न। कहां चले गये थे? और कुछ नहीं तो पोस्टें शिड्यूल कर जाते।