***** दो तरीके बताता हू टिप्पणी पाने के या तो लड़की के नाम से ब्लॉग बना ले फिर देख टिप्पणियो का भंडार.. और या फिर आठ दस टिप्पणिया सेव करके रख ले दस रात को सोने से पहले और दस सुबह उठने के बाद टिप्पणी करता चल.. [हिन्दी ब्लॉग जगत की हालत बताता एक ब्लोगर का फ़ोन..] **** हिन्दी ब्लॉग जगत तेजी से पाँव पसार रहा है. नित नए लोग जुड़ रहे हैं. कई ऐसे भी जुड़ना चाह रहे हैं जिनके मन में लिखने के लिए भाव तो बहुत हैं पर शब्दों में ढालने में मार खा जाते हैं. तो अग्रजों को देख पढ़कर ही तो सीखेंगे. कुछ योगदान हम भी दे देते हैं इस शिक्षा में बड़े लोगों के साथ साथ. [एक पोस्ट में इतनी गालियाँ देखकर तो भडासी भी शर्मा जायेंगे फिर भी हम लिख रहे हैं तो इसके पीछे आख़िर कौन सी मजबूरी है?] **** व्यक्तिगत रूप से अब मैं यह महसूस करने लगा हूं कि जिस ब्लाग को मैं या अन्य कुछ साथी हिंदी जगत या लेखनी के विकास का एक जरिया मान रहे थे या कुछ साथी अपने संस्मरण या अपने जज्बात सहेज कर रखने वाला एक सजाया गया कमरा समझ रहे थे दरअसल वह ब्लाग कुछ लोगों के लिए सिर्फ और सिर्फ बकवास निकाले, गाली गलौच करने एक दूसरे की बखिया उधेडने और एक दूसरे को नीचा दिखाने का जरिया बनता जा रहा है। [ब्लाग जगत के लिए यह खतरे की घंटी है] **** प्रतिस्पर्धा हर जगह होती है। हिंदी ब्लॉग में होनी भी चाहिए। लेकिन इसे सकारात्मक तरीके से लिया जाए। भाषा की गरिमा और पाठकों का ध्यान जरूर रखा जाए। जाहिर है मन में आए विचारों को ब्लॉग पर उतारना चाहिए। लेकिन क्या हम कभी डायरी लेखन में ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं जैसा ब्लॉग पर किया जाता है। [ब्लॉग मतलब भड़ास?] ***** पर खतरनाक बात ये है कि इन पोस्ट और इन पर आने वाली टिप्पणियों मे जिस भाषा का इस्तेमाल होता है वो बहुतो को गले नहीं उतरती और उतरनी भी नहीं चाहिए. आख़िर हम सब जुड़े हैं कुछ कारणों से कोई अभिव्यक्ति की बात कर रहा है, कोई सृजन की बात कर रहा है, कोई मस्ती की बात कर रहा है. तो फ़िर ये अभद्रता कंहा से आगई. आप किसी से सहमत नहीं हैं तो विरोध प्रदर्शन के कई रास्ते है पर अभद्रता या फ़िर गुंडई तो कतई नही. [एक बहस की शुरुआत फ़िर से -- कृपया करें] ***** अखिलेश जी का मानना था कि ब्लागिंग में अराजकता की सहज सम्भावनायें हैं। किसी को कुछ भी लिखने की छूट होने के कारण वह किसी के भी बारे में कुछ भी लिख देगा और दुनिया इसे चटकारे ले-लेकर पढ़ेगी। उदाहरण देते हुये उन्होंने कहा- मान लीजिये किसी प्रसिद्ध साहित्यकार के बारे में कोई घटिया बात लिख कर मेरी किताब में छापने को देता है तो पहले तो मैं इसका सत्यता जांचने का प्रयास करूंगा और उस साहित्यकार से जानकारी करूंगा तब इस बारे में कोई निर्णय करूंगा। लेकिन ब्लाग अभिव्यक्ति का छुट्टा माध्यम होने के नाते लेखक को बेलगाम छोड़ देता है। यह बिना जिम्मेदारी की मिली आजादी है। [ब्लागिंग में अराजकता की सहज सम्भावनायें हैं]
इस विभाग के पिछले 10 पोस्ट




May 29th, 2008 at 1:34 pm
आपने एक मह्त्वापूर्ण मुद्दे पर कई ब्लोगरों के विचारों को संकलित करने का बहुत ही सराहनीय कार्य किया हैं.
आप साधुवाद के अधिकारी है.
हम अगर इसी स्तर पर लगे रहे तो निश्चय ही गुणवत्ता मे सुधार आएगा.
मुझे काफ़ी पहले पाठ्यक्रम मे पड़ी एक लाइन याद आ रही है.
“दृढ़ निश्चय से दुविधा की बेडियाँ कट जाती हैं.”
May 29th, 2008 at 3:00 pm
चलिये लोगों को अभिव्यक्ति तो मिल रही है। अगर लोगों में कुण्ठा ज्यादा है तो वही अभिव्यक्त होगी!
May 29th, 2008 at 5:58 pm
इस विषय को आप न छेड़े शास्त्री जी ,आप अपनी तरह से चलते चलें …..
May 29th, 2008 at 7:02 pm
क्या कहें.
June 1st, 2008 at 6:53 am
सही है।