पिछले दो लेखों में मैं ने केरल के बारे में जो कुछ लिखा उसके साथ एक दो बाते और जोडना चाहता हूँ.
1. यदि आप यहां आटोरिक्शा लेकर कहीं जाते हैं तो 90% अवसरों पर उससे मोलभाव करने की या भाडा तय करने की जरूरत नहीं पडती. सरकार ने किलोमीटर के हिसाब से किरायाभाडा तय कर रखा है एवं आपको गंतव्य स्थान पर पहुंचा कर सिर्फ उस तय किये गये हिसाब से ही वह किराया मांगेगा. रात के समय या हडताल आदि के समय अतिरिक्त किराया लगता है लेकिन वे खुद आपको यह बात बता देते है. दस में से सिर्फ एक बदमिजाज आपको मिलेगा जो भाडा अधिक लेगा.
2. बस में कंडक्टर के पास खुले न हों तो वह आप से कह देता है कि उतरते में ले लेना. कई अवसरों पर पाच से दस आदमी उतरते समय पैसा मांगते है. वे जो भी राशि बताते हैं कंडक्टर उतनी राशि बिना किसी शंका के दे देता है.
3. शुद्ध सोने के आभूषणों का चलन यहां बहुत अधिक है. आपको दिनरात एक तोले से लेकर दस तोले तक के शुद्ध सोने का अभूषण पहनी स्त्रियां हर जगह दिख जायेंगी. उनको खतरा महसूस नहीं होता है.
मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि केरल हर चीज में स्वर्ग है. कदापि नहीं. वामपंथियों के कारण यहां मजदूरों की लूट चलती है. लेकिन सामान्य जीवन में कई बातों मे सुधार हुआ है, जिनके बारे में तीन लेखों में मैं बता चुका हूँ. मेरा सवाल यह है कि हिन्दुस्तान के एक प्रदेश में ऐसा कैसे हो रहा है. क्या शिक्षा का असर है? क्या धर्म का असर है. या कई घटकों का मिलाजुला असर है?
दूसरा सवाल यह है कि यदि एक प्रदेश में यह हो रहा है तो दूसरे प्रदेशों में क्यो नहीं हो सकता?
इस विभाग के पिछले 10 पोस्ट




June 28th, 2008 at 11:33 am
यह उदाहरण प्रस्तुत कर
यही प्रश्न मैं भी तो बरसों से अपने मित्रों से पूछ रहा हूँ ।
June 28th, 2008 at 1:11 pm
आप के इन प्रश्नों का उत्तर आप ही बेहतर ढंग से तलाश कर सकते हैं या समाजशास्त्री।
June 28th, 2008 at 1:54 pm
जानकारी के लिए आभार
June 28th, 2008 at 6:59 pm
अब तक ऐसा ११ बार हो चुका है कि जब भी कमेन्ट करती हूँ, प्रकाशित करने से पहले ही कोई न कोई व्यवधान आ ही जाता है. कम्प्लेन नोट की जाए.
June 28th, 2008 at 7:06 pm
निश्चित तौर पर यह शिक्षा का असर है। शिक्षा के प्रसार में ईसाई मिशनरियां महत्वपूर्ण योगदान देते आयी हैं।
June 28th, 2008 at 7:11 pm
अब एक नई कोशिश कम्प्लेन देने की. मेरा मतलब है कि कमेन्ट देने की.
जब सरकार सोचती है कि वैट लागू होना तो होना ही चाहिए.
जब सरकार सोचती है कि गोमती गन्दी है तो लगता है कि हाँ गोमती गन्दी है और इसे साफ़ होना ही चाहिए, नहीं तो रोज़ चार-पाँच गन्दा पानी पीकर मरें, किसीको क्या फर्क पड़ता है.
जब सरकार सोचती है कि परमाणु समझौता सही है तो फ़िर कोई लाख कुछ कर ले, यह तो लागू होकर ही रहेगा.
देखिये बदलाव तो एक पल में आ जाए, बस एक ” सारथी ” मिल जाने भर की देर है.
June 28th, 2008 at 7:29 pm
सारथी चिट्ठा मेरी नज़र में बौद्धिक लोगों का अड्डा है. भले ही इस चिट्ठे पर मुद्दे शास्त्री जी उठाते हैं पर उसे चलाते हैं हम सभी अपनी टिपण्णी के द्वारा ही हैं. इन सभी टिप्पणीकारों से निवेदन है कि एक बार अपने गिरेहबान में झाँक कर देखें और अपनी अंतरात्मा से पूछें कि क्या करते हैं हम इस बदलाव के लिए ? हम सभी को शर्म आएगी, अब ये सोचें कि हम क्या कर सकते हैं (और सिर्फ़ सोचें नहीं बल्कि उसे करें) तभी यह पोस्ट सार्थक सिद्ध होगी और शीर्षक के प्रश्न का जवाब मिल सकेगा.
शास्त्री जी एक ऎसी भी पोस्ट प्रकाशित करें जिसमें लोग यह बता सकें कि आपके इस लेख से प्रभावित हो उन्होंने क्या-क्या किया.
मैंने एक काम किया कि आज अपने लिए हेलमेट खरीद लिया.
क्यों शास्त्री जी ! आया न बदलाव !!!
आपने क्या बदलने की कोशिश की, इस पर भी प्रकाश डालेंगे तो यह चिट्ठा धन्य हो जायेगा.
June 28th, 2008 at 10:43 pm
शिक्षा निश्चित ही प्रथम चरण है इस दिशा में बढ़ने के लिए और दूसरा, गरीबी उन्मूलन..