कल के मेरे लेख नारीवादी महिलाएं ? पर काफी प्रतिक्रियायें आईं एवं सभी टिप्पणीकारों को मेरा आभार. कई चिट्ठाकार अभी तक यह नहीं समझ पाये कि सच क्या है यह समझने के लिये हर विषय पर खुली चर्चा होनी चाहिये. इस गलतफहमी के कारण हर चर्चा को वे बहुत ही व्यक्तिगत रूप में लेते हैं एवं उन सब को अपना दुश्मन समझते हैं जिनसे उनका मतैक्य नहीं है. अनूप शुक्ल ने इस विषय पर काफी काबिले तारीफ एक निरीक्षण प्रस्तुत किया जो इस तरह है: शास्त्रीजी आजकल यौन-चर्चा कर रहे हैं। नर-नारी सबंधों पर ज्ञान बांट रहे हैं। हमने कल चर्चा करते हुये लिखा-नर-नारी समानता: शास्त्री जी के सौजन्य से! शास्त्रीजी बोले- गलत !! यह तो परमात्मा के सौजन्य से हुआ है!!! हमने इसका मतलब निकाला कि शास्त्रीजी यह बता रहे हैं कि नर-नारी समानता परमात्मा के सौजन्य से है। लेकिन आज जब सुजाता की पोस्ट पढी़ तो इसका अर्थ पता चला कि शायद शा्स्त्रीजी कहना चाह रहे थे- नर-नारी समानता (की बात) गलत (है)!! यह तो (असमानता) परमात्मा के सौजन्य से हुआ।
सुजाता की पोस्ट में शास्त्रीजी की जिन पोस्टों का जिक्र है उनको पढ़कर ताज्जुब होता है कि वे ऐसी शानदार धारणा रखते हैं-
पुरुषों से अधिक स्त्रियां बलात्कार करती हैं, लेकिन वे मानसिक सतह पर करती हैं इस कारण बच जाती हैं. समाज में जहां भी देखें आज अधनंगी स्त्रियां दिखती हैं. पुरुष की वासना को भडका कर स्त्रियां जिस तरह से उनका मानसिक शोषण करती हैं वह पुरुषों का सामूहिक बलात्कार ही है. किसी जवान पुरुष से पूछ कर देखें. पुरुष को सजा हो जाती है, लेकिन किसी स्त्री को कभी इस मामले में सजा होते आपने देखा है क्या. हमें तो तरस आ रहा है शास्त्रीजी की हालत सोचकर। बेचारे पुरुष हैं। अब तक न जाने कितनी बार बलात्कार हो चुका होगा लेकिन बेचारे पुरुष होने के नाते कुछ कह नहीं पाये क्योंकि पता है किसी स्त्री को सजा तो मिलने से रही। लेकिन कविता जी इस बात से तिलमिला उठीं-कितने ही भोथरे तर्क गढ़कर आप पाप को पाप कहने की जद्दोजहद करते रहें पर पाप पाप ही रहेगा। पता नहीं शास्त्रीजी से कौन-कौन से पाठक ऐसे मासूम सवाल पूछते हैं। वे ब्लागर हैं या नानब्लागर! लेकिन शास्त्रीजी धन्य हैं जो ऐसे-ऐसे जबाब दे लेते हैं। सुजाता की सजग पोस्ट काबिले तारीफ़ है। लेकिन अभी हम न करेंगे तारीफ़!! हम अभी चिट्ठाचर्चा कर रहे हैं। बिजी हैं जी। लेकिन अगर हम शास्त्री जी के लिये कहना चाहें- हे ईश्वर! इन्हें क्षमा करना, ये ज्ञानी पुरुष हैं इन्हें पता नहीं ये क्या कह रह हैं तो क्या गलत होगा? आप बता दो तब ही हम उनके लिये ऐसा कहेंगे! अपने मन से नहीं कहेंगे हम जब तक सबकी राय न होगी। वैसे परमजीत बाली कहते हैं- मन नंग तो हर नारी से पंगा मुझे खुशी है कि कम से कम एक लेख ने इतने लोगों को चिंतन के लिये प्रोत्साहित किया, भले ही उनका नजरिया मुझ से भिन्न हो. मैं ने अपने लेख के द्वारा जो कुछ करने की कोशिश की है, उसक एक अच्छा विश्लेषण दिनेश जी ने मेरे मित्र परमजीत बाली के चिट्ठे पर दिया है जो इस तरह है: दिनेशराय द्विवेदी said… इस विषय पर आप के विचार पढ़े। शास्त्री जी ने गलत ही कहा हो। लेकिन उन्हें इस बात के लिए धन्यवाद कि उन्हों ने इस वि्षय को खोल दिया। कम से कम सब तरह के विचार तो सामने आ रहे हैं।
महा पंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपने तिब्बत यात्रा वर्णन में लिखा है कि वहाँ स्त्रियाँ खुले में संपूर्ण नग्न अवस्था में स्नान कर रही थीं, कोई पर्दा न था पुरुषों से। लेकिन उस से उन के साथ संबंध बनाने का विचार उत्पन्न भी नहीं होता था।
मुझे लगता है। हमारी सामाजिक बुनावट में ही वह खोट है जिस से यह समस्या उत्पन्न होती है। नारी की नग्नता को दोष देना उसी सामाजिक बुनावट के छल-छिद्रों को प्रदर्शित करता है।
लोगों को विचार करने दीजिए इस विषय पर। कोई निष्कर्ष शायद निकट भविष्य मे नहीं निकल पाए। लेकिन इस विचार-विमर्श से मन में छुपे विचार तो सामने आएँगे। शायद ये कोई रास्ता कभी दिखा सके. शुक्रिया मित्रो! चर्चा चलने दें. हम में से कोई भी सर्वज्ञानी नहीं है, लेकिन यदि खुले मन से (बिना आपसी वैमनस्य) चर्चा करेंगे तो सत्य की जीत होगी. चर्चा चलने दें!
इस विषय पर अभी कुछ और बाते कहूंगा, जम कर विरोध करें लेकिन इस बार व्यक्ति-विरोध के बदले आशय-विरोध का सहारा लें. सच्चाई अपने आप सामने आ जायगी.

इस विभाग के पिछले 10 पोस्ट




September 4th, 2008 at 10:25 am
व्यक्ति-विरोध के बदले आशय-विरोध का सहारा
yahii hae right choice baby
September 4th, 2008 at 10:45 am
wow…. what great thoguht i like your style man… very cheers good …. i say you are right…. when women wear revealing cloths they are doing balatkar, thank sfor persenting my ideas, i am ur fan now, you rock!
September 4th, 2008 at 11:35 am
आप ने क्या फिदायीन बम फोड़ा है?
September 4th, 2008 at 1:16 pm
विभिन्न देशों में आज भी आदिवासी नग्न अवस्था में ही रहते हैं पर वे सदैव कामरत नहीं रहते. वहाँ पुरूष उन्हें देखकर सदैव उत्तेजित नहीं होते. क्योंकि वो सब उनके लिए रोज़ रोज़ की घटना है. यदि अगर हमारे समाज में भी नग्नता 50-60 साल रह ले तो वैसी स्थिति आ सकती है.
एक बार डिस्कवरी चैनल देख रहा था. एक विदेशी भारत में आया था और एक जगह पर अत्यन्त उत्तेज़क नृत्य करती महिला को देखा. अगल बगल की भीड़ भी मस्त होने लगी पर उस पर कोई विशेष असर नहीं हुआ. क्योंकि उसके समाज में तो इससे भी अधिक खुलापन था. तो खुलेपन और ढंके छिपे होने का भी असर पड़ता है हमारे मन पर.
यह भी एक विचार है जो सम्भव है कि इस चर्चा को उसके उपसंहार तक पहुँचने में सहायता दे.
September 4th, 2008 at 1:18 pm
क्या पता कौन किस तरफ़ है, सबकी अपनी सोच है।
September 4th, 2008 at 2:56 pm
एक विदेशी भारत में आया था और एक जगह पर अत्यन्त उत्तेज़क नृत्य करती महिला को देखा. अगल बगल की भीड़ भी मस्त होने लगी पर उस पर कोई विशेष असर नहीं हुआ
हम भी कहीं उसी और तो नहीं बढ़ रहे -dehumanized -मान्वेतरता और desexualization -काम हीनता की ओर- ऊपर का दृष्टांत आँख खोलने वाला है -किसकी बंद है !
September 4th, 2008 at 8:48 pm
जिससे डरते थे वही बात हो गयी…
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शास्त्री जी, आपकी हिम्मत को दाद देते हैं। इस विचार मन्थन का कुछ तो फल निकलेगा ही। जमाये रहिए जी। हम सुनते जाएंगे और गुनते भी जाएंगे।
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September 4th, 2008 at 9:31 pm
har koi yahee kyun sochtaa hai ki unake vicharon kaa sabhee swaagat hee karenge. are bhai “munde-munde matribhinna”. yadi koi virodh karataa hai to uchit tark se use apne paksh me kijiye na ki lathh banjane lag jaaiye.
September 8th, 2008 at 1:23 am
कुछ कहना उचित नहीं लगता.