पी एन सुब्रमनियन आयुर्वेद क़ी मान्यता है कि शरीर में वात, पित्त और कफ के असंतुलित होने पर व्यक्ति रोग ग्रस्त हो जाता है. अतः इस भारतीय चिकित्सा पद्धति के द्वारा इन्हीं तीनों विकारों के असंतुलन को ठीक कर रोगी का उपचार किया जाता है. उत्तर भारत में चरक या सुश्रुत संहिता आयुर्वेद के मूल ग्रंथ हैं परंतु केरल में आयुर्वेद बौद्ध धर्म क़ी देन रही है. श्रीलंका में सम्राट अशोक के द्वारा बौद्ध धर्म क़ी स्थापना ईसापूर्व तीसरी शताब्दी में हुई थी. अशोक जनता के स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील था. उसने अपने साम्राज्य के सीमावर्ती इलाक़ों में भी चिकित्सालयों क़ी व्यवस्था क़ी थी. बौद्ध भिक्षु पारंपरिक चिकित्सा प्रदान करने में भी पारंगत रहे होंगे. 8 वीं शताब्दी में केरल से एक भिक्षु वाग भट्ट बौद्ध चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन करने श्रीलंका गया था. वाग भट्ट द्वारा रचित संस्कृत ग्रंथ ‘अष्टांग ह्रुदयम’ और ‘अष्टांग संग्रह’ आज केरल के आयुर्वेद के आधार हैं. ‘ओज़ीचल’ पिज़ीचल’ और ‘धारा’ क़ी विधि भी इन्ही ग्रंथों क़ी देन है. संक्षेप में ‘ओज़ीचल’ जड़ी बूटियों से बनाए गये तेल से मालिश (हाथ और पैर दोनों से) किए जाने को कहते हैं. ‘पिज़ीचल’ के तहत पके गरम चावल क़ी पोटली बनाई जाती है और उस पोटली को औषधीय तेल में डुबा कर, रोगी के शरीर पर, अलग अलग भागों पर, फेरा जाता है. ‘धारा’ में रोगी के मस्तक पर औषधीय तेल को एक धारा के रूप में प्रवाहित किया जाता हैं, जैसे शिवजी के लिंग पर पानी.
केरल में आयुर्वेद के बारे में बताते समय समाज के एक विशिष्ट वर्ग (जाति) के योगदान का उल्लेख करना आवश्यक लग रहा है. वहाँ “ईज़वा” जिन्हे “थिय्या” या “चोवन” भी कहते हैं, बहुमुखी प्रतिभाओं का धनी एक संपन्न वर्ग रहा है. वे सभी प्राचीन काल में बौद्ध धर्म के अनुयायी थे. शंकराचार्य के हिंदू पुनर्जागरण अभियान के तहत उनमे से कई हिंदू धर्म में वापस लिए गये. आज भी उनमे बौद्ध धर्म का प्रभाव उनके त्योहारों में देखा जा सकता है. उनके आराध्य देवताओं में हिंदू देवी देवताओं के अतिरिक्त सित्तन और अरत्तन जैसे बौद्ध देवता प्रमुख हैं. परंतु उस समय एक बड़ा समूह बौद्ध धर्म छोड़ने को तैय्यार नहीं हुआ. स्थानीय शासकों के संरक्षण में ब्राह्मणों का वर्चस्व बढ़ गया था. उनकी तूती बोला करती थी. “ईज़वा” लोगों को ब्राह्मणों क़ी वर्ण व्यवस्था से ही अलग रक्खा गया. एक सुनियोजित प्रक्रिया के तहत वे बहिष्कृत किए गये और अछूतों क़ी श्रेणी में आ गये. परिणाम स्वरूप एक फल फूल रहे वर्ग को रसातल क़ी ओर धकेल दिया गया. कुछ लोगों को अपना व्यवसाय भी बदलना पड़ा और कुछ लोग ईसाई भी बन गये. अब वे ऐसे काम करने लगे जो दूसरे नहीं करते थे. नारियल के पेड़ पर चढ़ कर ताड़ी उतारना, मदिरा बनाना आदि.
अब स्थितियाँ बदल गयी हैं. वास्तव में केरल के अयुर्वेदीय चिकित्सा पद्धति के सूत्रधार यही ‘ईज़वा’ लोग हैं. डच शासकों के द्वारा सन 1675 में पारंपरिक चिकित्सा पद्धति पर ‘हॉर्टस इंडिकस मलॅबारिकस’ नामक ग्रंथ प्रकाशित किया गया था. मलयालम में लिखे इस सर्वप्रथम ग्रंथ का संपादन ‘ईज़वा’ वर्ग के ही एक वैद्य इट्टि अत्चुदन द्वारा किया गया था. इनमे से कई आयुर्वेद, ज्योतिष् विद्या, शश्त्र विद्या आदि में पारंगत हैं. आजकल के सभी प्रमुख अयुर्वेदीय उत्पाद जैसे मेडैमिक्स, चंद्रिका, कामिलारी, क्यूटिकुरा आदि इन्हीं लोगों के हैं. बड़े बड़े उद्योग, अस्पताल भी इन्होने स्थापित किए हैं.
ईज़वा वर्ग में ही जन्मे महान धर्म सुधारक श्री नारायण गुरु (1855 – 1928) का इस समाज के पुनरूद्धार में विशेष योगदान रहा है. (Pic by kruain J&B) See this article in English at Ayurveda in Kerala
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September 15th, 2008 at 1:13 pm
ओह, मुझे मालुम न था कि आयुर्वेद और इज़वा बाह्मणिक हठ के सताये हैं। जाने कितना ज्ञान कर्मकाण्डी ब्राह्मणिक हठ ने उपेक्षित कर दिया!
September 15th, 2008 at 4:13 pm
agar sambhav ho to comment kaa text size badhaa dae plz
September 15th, 2008 at 4:39 pm
आयुर्वेद किसी एक धर्म का नहीं है. हिंदू धर्म की कुछ बुराइयों ने बौद्ध और जैन धर्म को जन्म दिया था. धर्मों के बदलने से भाषा और उपासना पद्धतियाँ परिवर्तित हुईं, परन्तु आयुर्वेद हर काल में फलती-फूलती रही.
दक्षिण भारतीय द्रविड़ों और उत्तर भारतीय आर्यों में यदि आपसी वैमनस्य नहीं रहा होता तो केरल में बौद्ध धर्म के बजाय हिंदू धर्म आयुर्वेद को आगे ले जाता.
अच्छा ज्ञानपरक लेख है.
बहुत दिनों बाद ऐसा अच्छा लेख पढने को मिला,
धन्यवाद.
September 15th, 2008 at 4:43 pm
अायुवेॆद के बारे में अापने बहुत अच्छी जानकारी दी है।
September 15th, 2008 at 7:28 pm
ज्ञान पूर्ण !
September 15th, 2008 at 11:57 pm
अच्छा लगा यह आलेख. पिछली यात्रा के दौरान इस विषय में जानकारी लेने का प्रयास किया था/
September 20th, 2008 at 6:28 pm
आज कल विदेशों में बहुत से लोग आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा को अपना रहे है
March 12th, 2009 at 2:40 pm
[...] (प्रेरणा स्त्रोत : संपत अय्यर, कोच्चि) सारथी में सर्वप्रथम प्रकाशित [...]