आजकल कई चिट्ठाकार अपनी छवि दुरुस्त करने में लगे हैं अत: वे सिर्फ पूरी तरह से पाश्चराईज्ड टिप्पणियां ही अपने चिट्ठे पर छपने देते है जिसमें कही कोई नुक्ताचीनी, विरोध आदि के दर्शन नहीं होते है. इन में से दोचार मित्रों ने पिछले दिनों लिख कर पूछा कि सारथी के लेखों का विरोध एवं खंडन करने वाली टिप्पणियों को मैं क्यों छापता हूँ. इसके कई कारण हैं:
1. मैं पूरी तरह से भारतीय शास्त्रार्थ का कायल हूँ कि खुली चर्चा एवं आपसी तर्क से ही सच्चाई सामने आती है.
2. मेरी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि भी यही सिखाती है: कि हर प्रस्ताव, व्याख्यान, एवं सोच को तर्क की कसौटी पर कसा जाये.
3. चूंकि मैं न तो सर्वज्ञानी हूँ, एवं न ही एक अतिमानव हूँ अत: मुझे हमेशा इस बात का बोध रहता है कि शायद मेरी राय में, नजरिये में, प्रस्तावना में अभी सुधार, संशोधन, की संभावना है.
4. अत: मित्रों से अनुरोध है कि मेरी प्रस्तावनाओं से यदि उनका मतैक्य नहीं है तो जम कर विषय का वस्तुनिष्ठ तरीके से विमर्श करें एवं सच्चाई सबके सामने लाने की कोशिश करें.
5. इस तरह के विमर्श भरी टिप्पणियां खुशी से स्वीकार की जायेंगी एवं उनको माडरेट करके कतई नही हटाया जायगा.
भारतीय चिंतन परंपरा कहती है कि हर विषय का विमर्शनात्मक अध्ययन होना चाहिये एवं सारथी इस नजरिये के साथ आपको टिप्प्णी की पूरी आजादी देता है. लेकिन निम्न प्रकार की टिप्पणियों से बचें:
1. अश्लील एवं आपराधिक कृत्यों/व्यक्तियों को प्रोत्साहित करने वाली टिप्पणियों से बचें. ऐसी टिप्पणियां कभी कभी आती हैं लेकिन उनको बिना किसी तरह के संकोच के, बेदर्दी के साथ, मैं मिटा देता हूँ. ऐसे लोगों का आईपी मैं हमेशा जांचता हूँ, एवं जरूरत पडने पर उनको बेन किया जा सकता है.
2. यदि आप अपनी टिप्पणी पर किसी तरह की प्रतिटिप्पणी या विमर्श नहीं पसंद करते तो कृपया सारथी पर टिप्पणी करने से बचें. आप यदि छत्ता छेड देते हैं तो आप को ही वह भुगतना पडेगा. सारथी आपके एवं आपके विरोधी के बीच हटोबचो का काम करने नहीं आयगा.
तो मित्रों, यदि मेरा कोई लेख या प्रस्ताव आप को पसंद न आये तो जम कर विमर्श करें. मैं बुरा नहीं मानूंगा, बल्कि मुझे अपनी धारणाओं को एक नये सिरे से देखनेसोचना का अवसर मिलेगा.
(ज्ञान जी की नीति): मेरी टिप्पणी की नीति
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September 16th, 2008 at 7:36 am
निंदक नियरे राखिये, पर गंदगी फैलाने वाले नहीं।
September 16th, 2008 at 7:57 am
वाह, आपकी टिप्पणी नीति के कायल हो गए!
September 16th, 2008 at 8:36 am
बिल्कुल सही बात !
September 16th, 2008 at 8:42 am
एकदम सटीक विचार
September 16th, 2008 at 9:55 am
स्पष्ट है.. एसा ही होना उचित है..
September 16th, 2008 at 11:18 am
बढ़िया किया है आपने।
मैने भी बहुत पहले बना कर रखी थी। यह जरूर है कि उसपर दिनांक ऐसा दिया कि वह किसी फीड एग्रेगेटर ने नहीं पकड़ा।
September 16th, 2008 at 11:46 am
शास्त्रीजी,
आपकी इस नीति से सहमत हूँ।
लेकिन आजकल आप जैसे कुछ नामी और सफ़ल चिट्ठाकारों के लेखों पर ही लोग टिप्पणी करते हैं। हजारों ऐसे चिट्ठाकार होंगे जो टिप्पणी के लिए तरसते रहते हैं। उनके लेखों को सगे संबन्धियों के सिवा कोई पढ़ता भी नहीं होगा! सगे सम्बन्धी भी आरंभ में नियमित रूप से पढ़ते हैं लेकिन धीरे धीरे चिट्ठाकार को उन लोगों को पत्र लिखकर याद दिलाना पढ़ता है कि अभी अभी एक ताजा पोस्ट लिखा हूँ जिसे आपकी अमूल्य टिप्पणी की प्रतीक्षा है!
कुछ ऐसे चिट्ठकारों को गालियाँ भी स्वीकार होंगे!
कम से कम किसीने उनका चिट्ठा पढ़ा! उनका चिट्ठा अरण्य रोदन(cry in the wilderness) बनने से बच गया!
कुछ साल पहले, हिन्दी चिट्ठे कम लिखे जाते थे और टिप्पणियों की कोई कमी नहीं थी। सुना है आजकल हिन्दी में ४००० से अधिक चिट्ठे प्रकाशित हो रहें हैं। अधिक से अधिक लोग अब हिन्दी में टाइप करना सीख रहे हैं और आने वाले वर्षों में लाखों लोग चिट्ठे लिखने लगेंगे। कहाँ हैं टिप्पणीकार इनको प्रोत्साहन देने के लिए ? देख रहा हूँ कि आजकल वही लोग जो चिट्ठे लिखते हैं एक दूसरे के चिट्ठे पर टिप्पणी करते हैं।
टिप्पणीकारों को “मोडरेशन” कभी पसन्द नहीं होता। चिट्ठे को ध्यान से पढ़ने के बाद, कभी कभी टिप्पणी करने की तीव्र इच्छा होती है।
और काम सब छोड़कर इस पर समय और परिश्रम लगाने के बाद उनकी यही इच्छा होती है के तुरन्त उनकी टिप्पणी नज़र आए। इस में देर खटकती है। वे यह भी चाहते हैं कि उनकी टिप्पणी पर यदि कोई प्रति-टिप्पणी हो तो तुरन्त उनको ई मेल द्वारा सूचना मिले। कई चिट्ठों में यह सुविधा नहीं है। हम जैसे ब्लॉग प्रेमी बार बार उसी जाल स्थल पर चेक करने के लिए आना पसन्द नहीं करते। हम जैसे लोग कई सारे चिट्ठे पढ़ते हैं और सब पर टिप्पणी करने के इच्छा रखते हैं लेकिन समय का अभाव के कारण नहीं कर पाते। मैं समझ सकता हूँ कि आजकल “स्पैम” के कारण moderation एक necessary evil बन गया है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कुछ विश्वसनीय टिप्पणीकारों के ई मेल पते को चिट्ठाकारों के जाल पते पर सहेज कर, इन विशेष मेहमानों को बिना moderation के टिप्पणी करने के लिए एक Free Pass दिया जाए? अगर ऐसा हो सकता है मैं अवश्य सभी नामी चिट्ठाकारों को लिखकर Free Pass की अपनी अर्जी भेजूँगा (विशेषकर आपको)। अवश्य यदि इसका कोई दुरुपयोग करता है तो तुरन्त कार्यवाही करके इनका यह Free Pass वापस लेकर उनपर moderation फ़िर लागू किया जा सकता है।
आप क्या सोचते हैं इसके बारे में?
शुभकामनाएं
विश्वनाथ, जे पी नगर, बेंगळूरु
September 16th, 2008 at 1:36 pm
सटीक लेख…….
September 16th, 2008 at 4:00 pm
बहुत बढ़िया किया आप ने सबको कायदे से समझा दिया, यह जरूरी भी था.
September 16th, 2008 at 4:26 pm
G Vishwanath जी की इस टिप्पणी-अंश दे मैं सहमत हूँ कि ‘टिप्पणीकारों को “मोडरेशन” कभी पसन्द नहीं होता। … कभी कभी टिप्पणी करने की तीव्र इच्छा होती है। … समय और परिश्रम लगाने के बाद उनकी यही इच्छा होती है के तुरन्त उनकी टिप्पणी नज़र आए। इस में देर खटकती है। … टिप्पणी पर यदि कोई प्रति-टिप्पणी हो तो तुरन्त उनको ई मेल द्वारा सूचना मिले। कई चिट्ठों में यह सुविधा नहीं है। … ब्लॉग प्रेमी बार बार उसी जाल स्थल पर चेक करने के लिए आना पसन्द नहीं करते। … कई सारे चिट्ठे पढ़ते हैं और सब पर टिप्पणी करने के इच्छा रखते हैं लेकिन समय का अभाव के कारण नहीं कर पाते।
September 16th, 2008 at 7:17 pm
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मैं स्वयं इसी नीति का कायल हूँ,
… पर इस दुनिया की रीत निराली,
प्यार को भी समझें… हाय हाय ये सितम
September 16th, 2008 at 7:22 pm
बहुत व्यवस्थित और क्रमबद्ध ढंग से आपने टिप्पणी नीति को स्पष्ट किया। हम आपसे सहमत हैं।
इतना जोड़ना चाहता हूँ कि मॉडरेशन का आभिजात्य उन्हीं को उपलब्ध है जो चिठ्ठाकारी में एक ऊँचा मुकाम हासिल कर चुके हैं। वे ब्लॉगर क्या इस अधिकार का प्रयोग करेंगे जिन्हें ‘अच्छी-बुरी चाहे जैसी’ टिप्पणियों की राह तकते समय कटता है? मैं भी इनमें से ही एक हूँ।
कुछ उदारमना प्रतिष्ठित लोग ऐसे जरूर हैं जो ज्यादा टिप्पणियाँ सहेजने के बावजूद परिमार्जन (moderation) का विकल्प दूर रखते हैं। आदरणीय जी.विश्वनाथ जी को ऐसे चिठेरों से जरूर प्रसन्नता मिलती होगी। लेकिन इस विकल्प पर आपत्ति करने की आवश्यकता नहीं है। वस्तुतः अच्छे टिप्पणीकारों की भी मांग कम नहीं है, यह बनी भी रहेगी। इनकी आवश्यकता परिमार्जन वालों को भी है।
बाकी… पसन्द अपनी-अपनी, ख़्याल अपना-अपना।
September 16th, 2008 at 10:13 pm
विश्वनाथ जी स्पैम वाले ज्यादातर उन चिट्ठों को निशाना बनाते हैं जिनके लेखक रेगुलर ब्लॉग अपडेट नहीं करते। इसलिए रेगुलर लिखने वालों को इस वज़ह से कमेंट माडरेशन की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
जहाँ तक गैर चिट्ठाकारों से संवाद बनाने की बात है तो वो तभी हो सकती है जब आप अपने चिट्ठे पर सब्सक्रिप्शन या फिर चैट बाक्स जैसा टूल डालें। साथ ही अपने चिट्ठे पर निरंतर उपयोगी सामग्री चाहे वो किसी भी विषय से जुड़ी हो का निरंतर समावेश करते रहें। तभी सर्च इंजन से पहुँचने वाले पाठक आपके स्थायी पाठक बनेंगे।
September 17th, 2008 at 12:00 am
सारथी जी,
एक दम अच्छा कीया आपने जो टीप्पडी नीती बना दीया।
बडा ही अच्छा तरीका से लीखे हैं पढने वाले भी मूगध हो जाए।
आईपी ब्लाक – डरा ही दीया।
September 19th, 2008 at 4:55 pm
शब्दों का व्यापर जो भी ल्हुलेआम होता है, उसपर सभी को टिप्पणी करने का हक़ है, मे ये समझता हूँ