सिर्फ कुछ चिट्ठों को टिप्पणियां मिलती हैं!!

हिन्दी के सक्रिय (या निष्क्रिय) चिट्ठाकर तो नहीं, बल्कि हिन्दी के सक्रिय/विश्लेषणात्मक चिट्ठाकार हैं श्रीमान जी विश्वनाथ. शायद किसी भी टिप्पणीकार ने उतना ध्यान आकर्षित नहीं किया है जितना विश्वनाथ जी ने किया है. इसका मुख्य कारण हैं इनकी विश्लेषणात्मक टिप्पणियां जो कई बार अपने आप में एक आलेख होते हैं.

कुछ हफ्ते पहले उन्होंने सारथी पर टिप्पणियों पर एक टिप्पणी की थी जिसे उत्तर देने के लिये मैं ने बचा रखा था एवं आज पाठकों के समक्ष सबके लाभ के लिये उत्तर सहित पेश है यह:

लेकिन आजकल आप जैसे कुछ नामी और सफ़ल चिट्ठाकारों के लेखों पर ही लोग टिप्पणी करते हैं।  हजारों ऐसे चिट्ठाकार होंगे जो टिप्पणी के लिए तरसते रहते हैं। उनके लेखों को सगे संबन्धियों के सिवा कोई पढ़ता भी नहीं होगा!  सगे सम्बन्धी भी आरंभ में नियमित रूप से पढ़ते हैं लेकिन धीरे धीरे चिट्ठाकार को उन लोगों को पत्र लिखकर याद दिलाना पढ़ता है कि अभी अभी एक ताजा पोस्ट लिखा हूँ  जिसे आपकी अमूल्य टिप्पणी की प्रतीक्षा है!

कुछ ऐसे चिट्ठकारों को गालियाँ भी स्वीकार होंगे! कम से कम किसीने उनका चिट्ठा पढ़ा! उनका चिट्ठा अरण्य रोदन(cry in the wilderness) बनने से बच गया!

विश्वनाथ जी, हर नया चिट्ठाकार टिप्पणियों के रूप में पाठकों की प्रतिक्रिया चाहता है, लेकिन उनमें से बहुत लोगों को टिप्पणियां नहीं मिलतीं. लेकिन इसका कारण पाठकवर्ग नहीं बल्कि चिट्ठाकार स्वयं हैं. अजित वडनेकर या सुरेश चिपलुनकर जैसे अपवादों को छोड दें तो बहुत कम नये नवेले चिट्ठाकार होते हैं जो अपने पहले चिट्ठे के साथ परिपक्व एवं चिंतनीय सामग्री प्रस्तुत कर पाते हैं. अत:  अपने पहले आलेख के समय से विश्लेषणात्मक टिप्पणियों की इच्छा करना आम  चिट्ठाकारों के लिये गलत है. यदि वे लिखते रहें एवं पाठकों को स्पर्श करने वाले या जनोपयोगी सामग्री प्रस्तुत करें तो शायद पाठक टिप्पणियां प्रारंभ करने लगें.

दूसरी बात, जिन चिट्ठाकारों को बहुत अधिक टिप्पणियां मिलती हैं वे फ्रीफंड में उनकी गोदी में आकर नहीं गिरे हैं, बल्कि क्रमबद्ध तरीके से, एक लम्बे दौरान, किये गये निवेश का फल है. यदि समीर लाल को सबसे अधिक टिप्पणियां मिलती हैं तो वह उन हजारों घंटों का फल है जो उन्होंने दूसरों को प्रोत्साहित करने के लिए निस्वार्थ दिया है. स्वाभाविक है कि जो व्यक्ति लोगों को प्रोत्साहित करता है, उसे अधिक स्नेह मिलता है. आज जिन वरिष्ठ चिट्ठाकारों को अधिक टिप्पणियां मिलती हैं उन सब ने अपने निस्वार्थ सेवा द्वारा यह कमाया है, अत: टिप्पणियां कम-ज्यादा किसी पक्षपात के कारण नहीं बल्कि निवेश के कारण मिलती हैं.

यदि कोई नया चिट्ठाकार वाकई में अरण्य रोदन से बचना चाहता है तो या तो वह एक भी टिप्पणी का इंतजार न करे, या वह अपने जानपहचान का एक चिट्ठाकार मित्र मंडली बना ले जो नियमित रूप से उसके आलेख पढें. यह मेहनत का काम है, लेकिन हर पेशे में ऐसा ही होता है. चाहे डाक्टर हो, वकील हो, या दुकानदार, उसे अपने “कोर-कस्टमर” बनाने पडते हैं. यही कारण है कि मैं बार बार याद दिलाता हूँ कि हर चिट्ठाकार को रोज कम से कम 10 चिट्ठों पर टिप्पणी करनी चाहिये. समय की कमी कोई बहाना नहीं है. समीर जी को देख लें जो कम से कम 50 टिप्पणियां रोज करते हैं. मुझे देख लें, मैं लगभग 6 आलेख एवं 180 टिप्पणियां प्रति हफ्ते हिन्दी में करता हूँ. (अंग्रेजी में एक दर्जन चिट्ठे अलग हैं मेरे. आधे से आय होती है, आधे आय के लिये तय्यार किये जा रहे हैं).

जिनको टिप्पणी चाहिये वे याद रखें कि हर्र लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा होय यहां नहीं चलेगा. सस्नेह – शास्त्री


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21 Comments so far

  1. “सिर्फ कुछ चिट्ठों को ही टिप्पणियां क्यों मिलती हैं!!”, यह प्रश्न अक्सर मेरे मन में भी आता है. चिटठा लेखन मेरे लिए अपने बिचारों को प्रकट करने का एक माध्यम है. तुलसीदास जी ने रामायण में लिखा, ‘स्वान्तः सुखाय रघुनाथ गाथा’. मैं अपने सुख के लिए रघुनाथ की गाथा लिख रहा हूँ. मैं भी अपने सुख के लिए चिट्ठे लिखता हूँ. इस लिए इस प्रश्न ने मुझे कभी परेशान नहीं किया.

    @जिनको टिप्पणी चाहिये वे याद रखें कि हर्र लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा होय यहां नहीं चलेगा.
    शास्त्री जी आपने यह टिपण्णी सस्नेह की है पर कुछ तल्ख़ है.

  2. sajeev October 17, 2008 5:04 pm

    ये टिपण्णी कर कर टिपण्णी पाने का तरीके से मैं सहमत नही हूँ, टिप्पणियों की संख्या से बड़ी चीज़ है पाठक, आप ऐसे लेख लिखें जिसे पाठक मिले…खैर…

  3. Shastri JC Philip October 17, 2008 5:35 pm

    @सुरेश जी, सजीव सारथी जी,

    आप दोनों ने मेरे आलेख के असली मर्म को नहीं समझा!!

    आलेख इस बात का विश्लेषणात्मक उत्तर है कि कुछ लोगों को क्यों एक भी टिप्पणी नहीं मिलती एवं क्यों कुछ को बहुत अधिक मिलती हैं.

  4. क्षमा करें, अनचाहे कुछ ग़लतियाँ घुस पड़ी हैं. नीचे दिए जा रहे दोनो वाक्यों में “टिप्पणीकार” की जगह “चिट्ठाकार” होना चाहिए था.
    “लेकिन इसका कारण पाठकवर्ग नहीं बल्कि टिप्पणीकार स्वयं हैं”
    “टिप्पणियों की इच्छा करना आम टिप्पणीकारों के लिये गलत है”.
    आपने ठीक ही कहा है, आज जमाना मार्केटिंग का है.

  5. सरिता अरगरे October 17, 2008 6:31 pm

    शास्त्री जी ,
    बात आपने पते की कही ,लेकिन महज़ गिनती बढाने के लिए की गई टिपण्णी का क्या औचित्य ? भले ही एक लाइन की एक ही एक ही प्रतिक्रिया हो । मगर उसकी सटीकता में ही लेखक के सफ़लता होती है । मेरी राय में यदि कोई व्यावसायिक लाभ की नहीं सोच रहा है तो उसकी नज़र में टिप्पणी से ज़्यादा पाठकों का आना ज़रुरी है । बहरहाल इसके लिए बेह्तरीन लिखना होगा और करना होगी मेहनत । मेरी राय में ये स्थायी और लांग टर्म इन्वेस्टमेंट होगा ।

  6. अजित वडनेरकर October 17, 2008 7:12 pm

    टिप्पणीकार वाली बात की तरफ मैं भी ध्यान दिलाना चाहता हूं। आप वहां चिट्ठाकार लिखना चाहते थे।
    कोर कस्टमर वाले उदाहरण के जरिये आपने बेहद सरल तरीके से अपनी बात समझा दी है। शुक्रिया…

  7. पुनः क्षमा करें. मैने दो वाक्यों मे सुधार की गुंजाइश बताई थी. एक तो सुधर गयी. दूसरी रह गयी.
    “टिप्पणियों की इच्छा करना आम टिप्पणीकारों के लिये”
    “टिप्पणीकारों” की जगह पुनः “चिट्ठाकारों” होना चाहिए

  8. Shastri JC Philip October 17, 2008 8:12 pm

    @सुब्रमनियन जी एवं अजित, मैं ने गलती सुधार दी है.

    @सरिता जी, मेरा विषय गिनती बढाने के लिये की गई टिप्पणी नहीं है, बल्कि इस प्रश्न का उत्तर है कि कुछ लोगों को क्यों अधिक टिप्पणियां मिलती हैं.

  9. Shastri JC Philip October 17, 2008 8:59 pm

    @सुब्रमनियन जी, आभार! दूसरी गलती भी ठीक कर दी गई है.

  10. Gyan Dutt Pandey October 17, 2008 9:54 pm

    आप सही कह रहे हैं। टिप्पणी निवेश पर बहुत निर्भर है।

  11. Dr parveen chopra October 17, 2008 10:43 pm

    गुरूदेव, बहुत पते की बातें कही हैं आपने । पढ़ कर अच्छा लगा और खास कर शुद्ध हिंदी ….मैंने यह फिटकरी वाली कहावत सैंकड़ों बार सुन रखी है लेकिन इस के असली शब्द आज दिखे। मैं हर्र की जगह नमक समझा करता था …वैसे हर्र का मतलब ?

  12. विनय October 17, 2008 11:08 pm

    आपने बिल्कुल सही कहा शास्त्री जी फल के लिए कर्म करना पड़ता है। लेकिन कुछ अपवाद भी हैं जैसे कुछ‌ महिलाओं के चिट्ठे हैं जिन पर न टाइप सही होता हैं और न ही कही जाने वाली बात में दम मगर लोग उनके चिट्ठे पर जाकर उनकी बेहूदा रचना पर वाह-वाही करते हैं। (नोट: महिलाएँ इस टिप्पणी को अन्यथा न लें जो बेहतर रचनाएँ दे रही हैं और दूसरों का सहयोग कर रहीं उनका अंतर्मन तो स्वयं जानता है)

  13. Shastri JC Philip October 17, 2008 11:23 pm

    @Dr parveen chopra

    हर्र एक आयुर्वेदिक सूखा फल होता है (मुनक्के समान) जो बहुत सी बातों के लिये उपयोगी है.

  14. आपके कथन से मै सहमत हूँ , पर यदि थोडी विश्लेषणात्मक टिपण्णी हो तो ज्यादा बेहतर लगता है …….आख़िर अधिक टिप्पणियां अधिक आकर्षण का , अधिक traffic का जरिए तो हैं ही !

  15. ajaykumarjha October 18, 2008 2:27 am

    shashtri jee,
    bilkul kharee aur sachhi baat kahee hai aapne aur bilkul sapsht tareeke se, ye baat bahut se log bilkul theek theek samajh gaye honge, aur anya bhee samajh jaayenge, ki ye blogjagat hai jiske liye ek daayaraa banaanaa jarooree hai aur aapkaa us daayre mein rahnaa bhee, koi akelaa nahin chal saktaa.

  16. G Vishwanath October 18, 2008 3:48 am

    शास्त्रीजी,

    इस सूक्ष्म विश्लेषण के लिए धन्यवाद।
    समीर लालजी ने हाल ही में अपना ही रेकॉड तोड़ दिया था।
    १०० से ज्यादा टिप्पणियाँ मिली थीं उनको।
    हिन्दी चिट्ठाजगत में कीर्तिमान किसने स्थापित किया?
    सबसे ज्यादा टिप्पणी किसे, कब और किस पोस्ट पर मिली?
    जानने के लिए उत्सुक हूँ।

    इस विषय में कुछ और विचार मेरे मन में आते हैं जिन्हें यहाँ व्यक्त करने की अनुमति चाहता हूँ।

    अब सोचने लगा हूँ की क्या टिप्पणी के पीछे पीछे इस भागदौड की भी कोई सीमा होनी चाहिए?।
    यदि किसी को चार या पाँच सौ या उस से भी अधिक टिप्पणियाँ मिलती हैं तो वह क्या करें? (VIP चिट्ठाकार को अवश्य मिलते होंगे)। टिप्पणीयों की सही संख्या क्या होनी चाहिए, जिसे चिट्ठाकार अपना लक्ष्य माने?

    ज़ाहिर है कि एक विशेष सीमा के बाद चिट्ठाकार इन टिप्पणियों को पढ़ भी नहीं पाएंगे। यदि पढ़ने लगेंगे तो पढ़ते ही रहेंगे और अगले चिट्ठे के लिए समय नहीं रहेगा। यदि पढ़ेंगे भी तो हर टिप्पणी का उत्तर देना असंभव हो जाएगा।
    सब के नाम एक समान/सामूहिक संदेश ही लिख सकेंगे।
    लेकिन इससे पाठक सन्तुष्ट नहीं होगा। हर पाठ अपनी टिप्पणी को विशेष समझने लगता है। वह चाहता है के तमाम टिप्पणियों में से केवल उसकी टिप्पणी का चयन हो और उसपर चिट्ठाकार की प्रति-टिप्पणी छप जाए।

    (मैं ऐसा नहीं हूँ! कृपया यकीन कीजिए!)
    टिप्पणिकार का भी अहं होता है। यदि उसकी टिप्पणी हर बार नज़रनदाज़ किया जाता है तो वह टिप्पणी करना बन्द कर देगा या कहीं और चला जाएगा।
    इस लिए चिट्टाकार को चाहिए कि हर नए टिप्पणीकार का कम से कम शुरू में स्वागत हो। नए टिप्पणीकार को महसूस होना चाहिए के मेरे विचार की भी कोई महत्ता है। चिट्ठाकार ने मेरा अस्तित्व को स्वीकारा। उसने मुझे “नोटिस” किया।
    बाद में यदा कदा, बारी बारी से इन टिप्पणीकारों का उल्लेख करते रहना उचित और लाभदायक होगा। चिट्ठाकारों के लिए इस तरह का “पब्लिक रिलेशन्स” आवश्यक हो जाता है।

    मैं समझता हूँ कि हर चिट्ठा अधूरा होता है जब तक उस पर कम से कम एक अच्छी और दमदार टिप्पणी न हो।

    जाते जाते:
    चिट्ठाकार को सावधान करने के लिए यह लिख रहा हूँ।
    कुछ महीने पहले एक चिट्ठाकार ने अपने मुखप्रष्ट पर एक स्थायी सन्देश चेप दिया था जो कुछ यूँ था “लिखना हमारा विशेषाधिकार है, पढ़ना है तो पढ़ो, नहीं तो रास्ता नापो”

    उस दिन से जब कभी इस चिट्टाकार का पोस्ट देखता हूँ तुरन्त कोई रास्ता नापने के लिए निकल जाता हूँ।

    शुभकामनाएं

  17. Tarun October 18, 2008 4:28 am

    टिप्पणी का महत्व तभी है जब वो सार्थक हो, लेख के साथ वो Extension का काम करे। सिर्फ संख्या के लिये टिप्पणी मिलने से हो सकता है शुरू में अच्छा लगे लेकिन बाद में आपको खुद लगेगा कि क्या मेरा लेख पढ़ा भी या सिर्फ टिप्पणी के लिये टिप्पणी कर दी।

    लेख अच्छा हो और पाठक के मतलब का हो तो हमेशा टिप्पणी मिलती रहती है। मेरे उस हिंदी चिट्ठे में सबसे ज्यादा टिप्पणी मिलती है जिसे शायद २-४ ब्लोगरस ही पढ़ते हैं, वरना उसके ज्यादातर पाठक सिर्फ पाठक है। टिप्पणी के मामले में जो पांचवे नंबर की पोस्ट मेरे उस चिट्ठे में है उसको अब तक १४९ टिप्पणी मिली है और जो पहले पर उसे कुल ३५६ And I am still Counting। लेकिन इससे इन चार पांच लेखों की महत्ता बढ़ नही जाती और जिन्हें कम मिले हैं उनकी कम नही हो जाती।

    ये भी जरूरी नही कि आप तमाम जानकारी वाला लेख लिखें और उसमें टिप्पणी की बौछार होने लगे, ऐसा भी चिट्ठा है मेरे पास। इसलिये टिप्पणी की चिंता छोड़ ब्लोगर को अपने लेख और उसकी विषयवस्तु में ध्यान देना चाहिये, हाँ तनिक क्षण के लिये दिल को लगता है लेकिन फिर सब चकाचक।

  18. आपके विश्लेषण से पूरी तरह से सहमत हूँ। ये बात अलग है कि यह सूत्र जानते हुए भी कभी- कभी अपनाना मुश्किल हो जाता है।

    समीर जी या ज्ञान जी की तरह सबसे नहीं बना जा सकता है। समय की कमी, दूसरी रुचियों की ओर भी समय देना, अपना अध्ययन, और सरकारी कामों में सिर खपाने के बाद कभी चिठ्ठों को केवल पढ़कर आगे बढ़ जाने की हिम्मत बचती है। कुञ्जीपटल पर हाथ फेरना कठिन हो जाता है। एक या दो उंगली से टाइप करने की मजबूरी भी थकाने वाली होती है। ऐसे में सन्तोष करने से ही काम चलेगा। फिर भी यह सच है कि …

    उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
    नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविषन्ति मुखे मृगाः॥

  19. sachin mishra October 19, 2008 7:31 am

    jankari ke liye aabhar.

  20. atulgaur October 20, 2008 1:36 pm

    आप ने बहूत ही अच्छी बात लिखी है जैसे यदि किसी se आदर चाहते हो तो उसको भी आदर दो एक दिन ऐसा आएगा की वो व्यक्ति तुम्हें स्वयम आदर देने लगेगा

  21. anupam agrawal October 21, 2008 9:31 pm

    आदरणीय शास्त्री जी
    न जाने क्यों मै पहले इस लेख पर नही आ पाया
    मेरा एक सुझाव है कि एक लेख/ब्लॉग में आप या कोई सक्षम व्यक्ति” ब्लॉग शुरू करते समय /लिखने में क्या ध्यान रखना चाहिए ”पर अपने विचार रखें जिससे जो लोग सीख कर करना चाहते हैं , उन्हें मदद मिलेगी .
    और अच्छे हिन्दी जगत का प्रसार भी हो सकेगा

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