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	<title>Comments on: सिर्फ कुछ चिट्ठों को टिप्पणियां मिलती हैं!!</title>
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	<link>http://sarathi.info/archives/1518</link>
	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
	<lastBuildDate>Wed, 18 Jan 2012 18:10:14 +0000</lastBuildDate>
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		<title>By: anupam agrawal</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1518/comment-page-1#comment-4264</link>
		<dc:creator>anupam agrawal</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 22 Oct 2008 09:31:02 +0000</pubDate>
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		<description>आदरणीय शास्त्री जी 
न जाने क्यों मै पहले इस लेख पर नही आ पाया 
मेरा एक सुझाव है कि एक लेख/ब्लॉग में आप या कोई सक्षम व्यक्ति&#039;&#039; ब्लॉग शुरू करते समय /लिखने में क्या ध्यान रखना चाहिए &#039;&#039;पर अपने विचार रखें जिससे जो लोग सीख कर करना चाहते हैं , उन्हें मदद मिलेगी .
और अच्छे हिन्दी जगत का प्रसार भी हो सकेगा</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आदरणीय शास्त्री जी<br />
न जाने क्यों मै पहले इस लेख पर नही आ पाया<br />
मेरा एक सुझाव है कि एक लेख/ब्लॉग में आप या कोई सक्षम व्यक्ति&#8221; ब्लॉग शुरू करते समय /लिखने में क्या ध्यान रखना चाहिए &#8221;पर अपने विचार रखें जिससे जो लोग सीख कर करना चाहते हैं , उन्हें मदद मिलेगी .<br />
और अच्छे हिन्दी जगत का प्रसार भी हो सकेगा</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: atulgaur</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1518/comment-page-1#comment-4256</link>
		<dc:creator>atulgaur</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 21 Oct 2008 01:36:12 +0000</pubDate>
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		<description>आप ने बहूत ही अच्छी बात लिखी है जैसे यदि किसी se आदर चाहते हो तो उसको भी आदर दो एक दिन ऐसा आएगा की वो व्यक्ति तुम्हें स्वयम आदर देने लगेगा</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आप ने बहूत ही अच्छी बात लिखी है जैसे यदि किसी se आदर चाहते हो तो उसको भी आदर दो एक दिन ऐसा आएगा की वो व्यक्ति तुम्हें स्वयम आदर देने लगेगा</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: sachin mishra</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1518/comment-page-1#comment-4251</link>
		<dc:creator>sachin mishra</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 19 Oct 2008 19:31:11 +0000</pubDate>
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		<description>jankari ke liye aabhar.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>jankari ke liye aabhar.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: सिद्धार्थ शंकरत्रिपाठी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1518/comment-page-1#comment-4248</link>
		<dc:creator>सिद्धार्थ शंकरत्रिपाठी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Oct 2008 16:40:50 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1518#comment-4248</guid>
		<description>आपके विश्लेषण से पूरी तरह से सहमत हूँ। ये बात अलग है कि यह सूत्र जानते हुए भी कभी- कभी अपनाना मुश्किल हो जाता है। 

समीर जी या ज्ञान जी की तरह सबसे नहीं बना जा सकता है। समय की कमी, दूसरी रुचियों की ओर भी समय देना, अपना अध्ययन, और सरकारी कामों में सिर खपाने के बाद कभी चिठ्ठों को केवल पढ़कर आगे बढ़ जाने की हिम्मत बचती है। कुञ्जीपटल पर हाथ फेरना कठिन हो जाता है। एक या दो उंगली से टाइप करने की मजबूरी भी थकाने वाली होती है। ऐसे में सन्तोष करने से ही काम चलेगा। फिर भी यह सच है कि ...

&lt;b&gt;उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविषन्ति मुखे मृगाः॥&lt;/b&gt;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपके विश्लेषण से पूरी तरह से सहमत हूँ। ये बात अलग है कि यह सूत्र जानते हुए भी कभी- कभी अपनाना मुश्किल हो जाता है। </p>
<p>समीर जी या ज्ञान जी की तरह सबसे नहीं बना जा सकता है। समय की कमी, दूसरी रुचियों की ओर भी समय देना, अपना अध्ययन, और सरकारी कामों में सिर खपाने के बाद कभी चिठ्ठों को केवल पढ़कर आगे बढ़ जाने की हिम्मत बचती है। कुञ्जीपटल पर हाथ फेरना कठिन हो जाता है। एक या दो उंगली से टाइप करने की मजबूरी भी थकाने वाली होती है। ऐसे में सन्तोष करने से ही काम चलेगा। फिर भी यह सच है कि &#8230;</p>
<p><b>उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणि न मनोरथैः।<br />
नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविषन्ति मुखे मृगाः॥</b></p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Tarun</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1518/comment-page-1#comment-4247</link>
		<dc:creator>Tarun</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Oct 2008 16:28:02 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1518#comment-4247</guid>
		<description>टिप्पणी का महत्व तभी है जब वो सार्थक हो, लेख के साथ वो Extension का काम करे। सिर्फ संख्या के लिये टिप्पणी मिलने से हो सकता है शुरू में अच्छा लगे लेकिन बाद में आपको खुद लगेगा कि क्या मेरा लेख पढ़ा भी या सिर्फ टिप्पणी के लिये टिप्पणी कर दी।

लेख अच्छा हो और पाठक के मतलब का हो तो हमेशा टिप्पणी मिलती रहती है। मेरे उस हिंदी चिट्ठे में सबसे ज्यादा टिप्पणी मिलती है जिसे शायद २-४ ब्लोगरस ही पढ़ते हैं, वरना उसके ज्यादातर पाठक सिर्फ पाठक है। टिप्पणी के मामले में जो पांचवे नंबर की पोस्ट मेरे उस चिट्ठे में है उसको अब तक १४९ टिप्पणी मिली है और जो पहले पर उसे कुल ३५६ And I am still Counting। लेकिन इससे इन चार पांच लेखों की महत्ता बढ़ नही जाती और जिन्हें कम मिले हैं उनकी कम नही हो जाती।

ये भी जरूरी नही कि आप तमाम जानकारी वाला लेख लिखें और उसमें टिप्पणी की बौछार होने लगे, ऐसा भी चिट्ठा है मेरे पास। इसलिये टिप्पणी की चिंता छोड़ ब्लोगर को अपने लेख और उसकी विषयवस्तु में ध्यान देना चाहिये, हाँ तनिक क्षण के लिये दिल को लगता है लेकिन फिर सब चकाचक।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>टिप्पणी का महत्व तभी है जब वो सार्थक हो, लेख के साथ वो Extension का काम करे। सिर्फ संख्या के लिये टिप्पणी मिलने से हो सकता है शुरू में अच्छा लगे लेकिन बाद में आपको खुद लगेगा कि क्या मेरा लेख पढ़ा भी या सिर्फ टिप्पणी के लिये टिप्पणी कर दी।</p>
<p>लेख अच्छा हो और पाठक के मतलब का हो तो हमेशा टिप्पणी मिलती रहती है। मेरे उस हिंदी चिट्ठे में सबसे ज्यादा टिप्पणी मिलती है जिसे शायद २-४ ब्लोगरस ही पढ़ते हैं, वरना उसके ज्यादातर पाठक सिर्फ पाठक है। टिप्पणी के मामले में जो पांचवे नंबर की पोस्ट मेरे उस चिट्ठे में है उसको अब तक १४९ टिप्पणी मिली है और जो पहले पर उसे कुल ३५६ And I am still Counting। लेकिन इससे इन चार पांच लेखों की महत्ता बढ़ नही जाती और जिन्हें कम मिले हैं उनकी कम नही हो जाती।</p>
<p>ये भी जरूरी नही कि आप तमाम जानकारी वाला लेख लिखें और उसमें टिप्पणी की बौछार होने लगे, ऐसा भी चिट्ठा है मेरे पास। इसलिये टिप्पणी की चिंता छोड़ ब्लोगर को अपने लेख और उसकी विषयवस्तु में ध्यान देना चाहिये, हाँ तनिक क्षण के लिये दिल को लगता है लेकिन फिर सब चकाचक।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: G Vishwanath</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1518/comment-page-1#comment-4246</link>
		<dc:creator>G Vishwanath</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Oct 2008 15:48:16 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1518#comment-4246</guid>
		<description>शास्त्रीजी,

इस सूक्ष्म विश्लेषण के लिए धन्यवाद।
समीर लालजी ने हाल ही में अपना ही रेकॉड तोड़ दिया था।
१०० से ज्यादा टिप्पणियाँ मिली थीं उनको।
हिन्दी चिट्ठाजगत में कीर्तिमान किसने स्थापित किया?
सबसे ज्यादा टिप्पणी किसे, कब और किस पोस्ट पर मिली?
जानने के लिए उत्सुक हूँ।

इस विषय में कुछ और विचार मेरे मन में आते हैं जिन्हें यहाँ व्यक्त करने की अनुमति चाहता हूँ।

अब सोचने लगा हूँ की क्या टिप्पणी के पीछे पीछे इस भागदौड की भी कोई सीमा होनी चाहिए?।
यदि किसी को चार या पाँच सौ या उस से भी अधिक टिप्पणियाँ मिलती हैं तो वह क्या करें? (VIP चिट्ठाकार को अवश्य मिलते होंगे)। टिप्पणीयों की सही संख्या क्या होनी चाहिए, जिसे चिट्ठाकार अपना लक्ष्य माने?

ज़ाहिर है कि एक विशेष सीमा के बाद चिट्ठाकार इन टिप्पणियों को पढ़ भी नहीं पाएंगे। यदि पढ़ने लगेंगे तो पढ़ते ही रहेंगे और अगले चिट्ठे के लिए समय नहीं रहेगा। यदि पढ़ेंगे भी तो हर टिप्पणी का उत्तर देना असंभव हो जाएगा।
सब के नाम एक समान/सामूहिक संदेश ही लिख सकेंगे।
लेकिन इससे पाठक सन्तुष्ट नहीं होगा। हर पाठ अपनी टिप्पणी को विशेष समझने लगता है। वह चाहता है के तमाम टिप्पणियों में से केवल उसकी टिप्पणी का चयन हो और उसपर चिट्ठाकार की प्रति-टिप्पणी छप जाए।

(मैं ऐसा नहीं हूँ! कृपया यकीन कीजिए!)
टिप्पणिकार का भी अहं होता है। यदि उसकी टिप्पणी हर बार नज़रनदाज़ किया जाता है तो वह टिप्पणी करना बन्द कर देगा या कहीं और चला जाएगा।
इस लिए चिट्टाकार को चाहिए कि हर नए टिप्पणीकार का कम से कम शुरू में स्वागत हो। नए टिप्पणीकार को महसूस होना चाहिए के मेरे विचार की भी कोई महत्ता है। चिट्ठाकार ने मेरा अस्तित्व को स्वीकारा। उसने मुझे &quot;नोटिस&quot; किया। 
बाद में यदा कदा, बारी बारी से इन टिप्पणीकारों का उल्लेख करते रहना उचित और लाभदायक होगा। चिट्ठाकारों के लिए इस तरह का &quot;पब्लिक रिलेशन्स&quot; आवश्यक हो जाता है।

मैं समझता हूँ कि हर चिट्ठा अधूरा होता है जब तक उस पर कम से कम एक अच्छी और दमदार टिप्पणी न हो। 

जाते जाते:
चिट्ठाकार को सावधान करने के लिए यह लिख रहा हूँ।
कुछ महीने पहले एक चिट्ठाकार ने अपने मुखप्रष्ट पर एक स्थायी सन्देश चेप दिया था जो कुछ यूँ था &quot;लिखना हमारा विशेषाधिकार है, पढ़ना है तो पढ़ो, नहीं तो रास्ता नापो&quot;

उस दिन से जब कभी इस चिट्टाकार का पोस्ट देखता हूँ तुरन्त कोई रास्ता नापने के लिए निकल जाता हूँ।

शुभकामनाएं</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शास्त्रीजी,</p>
<p>इस सूक्ष्म विश्लेषण के लिए धन्यवाद।<br />
समीर लालजी ने हाल ही में अपना ही रेकॉड तोड़ दिया था।<br />
१०० से ज्यादा टिप्पणियाँ मिली थीं उनको।<br />
हिन्दी चिट्ठाजगत में कीर्तिमान किसने स्थापित किया?<br />
सबसे ज्यादा टिप्पणी किसे, कब और किस पोस्ट पर मिली?<br />
जानने के लिए उत्सुक हूँ।</p>
<p>इस विषय में कुछ और विचार मेरे मन में आते हैं जिन्हें यहाँ व्यक्त करने की अनुमति चाहता हूँ।</p>
<p>अब सोचने लगा हूँ की क्या टिप्पणी के पीछे पीछे इस भागदौड की भी कोई सीमा होनी चाहिए?।<br />
यदि किसी को चार या पाँच सौ या उस से भी अधिक टिप्पणियाँ मिलती हैं तो वह क्या करें? (VIP चिट्ठाकार को अवश्य मिलते होंगे)। टिप्पणीयों की सही संख्या क्या होनी चाहिए, जिसे चिट्ठाकार अपना लक्ष्य माने?</p>
<p>ज़ाहिर है कि एक विशेष सीमा के बाद चिट्ठाकार इन टिप्पणियों को पढ़ भी नहीं पाएंगे। यदि पढ़ने लगेंगे तो पढ़ते ही रहेंगे और अगले चिट्ठे के लिए समय नहीं रहेगा। यदि पढ़ेंगे भी तो हर टिप्पणी का उत्तर देना असंभव हो जाएगा।<br />
सब के नाम एक समान/सामूहिक संदेश ही लिख सकेंगे।<br />
लेकिन इससे पाठक सन्तुष्ट नहीं होगा। हर पाठ अपनी टिप्पणी को विशेष समझने लगता है। वह चाहता है के तमाम टिप्पणियों में से केवल उसकी टिप्पणी का चयन हो और उसपर चिट्ठाकार की प्रति-टिप्पणी छप जाए।</p>
<p>(मैं ऐसा नहीं हूँ! कृपया यकीन कीजिए!)<br />
टिप्पणिकार का भी अहं होता है। यदि उसकी टिप्पणी हर बार नज़रनदाज़ किया जाता है तो वह टिप्पणी करना बन्द कर देगा या कहीं और चला जाएगा।<br />
इस लिए चिट्टाकार को चाहिए कि हर नए टिप्पणीकार का कम से कम शुरू में स्वागत हो। नए टिप्पणीकार को महसूस होना चाहिए के मेरे विचार की भी कोई महत्ता है। चिट्ठाकार ने मेरा अस्तित्व को स्वीकारा। उसने मुझे &#8220;नोटिस&#8221; किया।<br />
बाद में यदा कदा, बारी बारी से इन टिप्पणीकारों का उल्लेख करते रहना उचित और लाभदायक होगा। चिट्ठाकारों के लिए इस तरह का &#8220;पब्लिक रिलेशन्स&#8221; आवश्यक हो जाता है।</p>
<p>मैं समझता हूँ कि हर चिट्ठा अधूरा होता है जब तक उस पर कम से कम एक अच्छी और दमदार टिप्पणी न हो। </p>
<p>जाते जाते:<br />
चिट्ठाकार को सावधान करने के लिए यह लिख रहा हूँ।<br />
कुछ महीने पहले एक चिट्ठाकार ने अपने मुखप्रष्ट पर एक स्थायी सन्देश चेप दिया था जो कुछ यूँ था &#8220;लिखना हमारा विशेषाधिकार है, पढ़ना है तो पढ़ो, नहीं तो रास्ता नापो&#8221;</p>
<p>उस दिन से जब कभी इस चिट्टाकार का पोस्ट देखता हूँ तुरन्त कोई रास्ता नापने के लिए निकल जाता हूँ।</p>
<p>शुभकामनाएं</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: ajaykumarjha</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1518/comment-page-1#comment-4244</link>
		<dc:creator>ajaykumarjha</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Oct 2008 14:27:26 +0000</pubDate>
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		<description>shashtri jee,
bilkul kharee aur sachhi baat kahee hai aapne aur bilkul sapsht tareeke se, ye baat bahut se log bilkul theek theek samajh gaye honge, aur anya bhee samajh jaayenge, ki ye blogjagat hai jiske liye ek daayaraa banaanaa jarooree hai aur aapkaa us daayre mein rahnaa bhee, koi akelaa nahin chal saktaa.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>shashtri jee,<br />
bilkul kharee aur sachhi baat kahee hai aapne aur bilkul sapsht tareeke se, ye baat bahut se log bilkul theek theek samajh gaye honge, aur anya bhee samajh jaayenge, ki ye blogjagat hai jiske liye ek daayaraa banaanaa jarooree hai aur aapkaa us daayre mein rahnaa bhee, koi akelaa nahin chal saktaa.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: प्रवीण त्रिवेदी-प्राइमरी का मास्टर</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1518/comment-page-1#comment-4243</link>
		<dc:creator>प्रवीण त्रिवेदी-प्राइमरी का मास्टर</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Oct 2008 12:56:56 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1518#comment-4243</guid>
		<description>आपके कथन से मै सहमत हूँ , पर यदि थोडी विश्लेषणात्मक टिपण्णी हो तो ज्यादा बेहतर लगता है .......आख़िर अधिक टिप्पणियां अधिक आकर्षण का , अधिक traffic का जरिए तो हैं ही !</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपके कथन से मै सहमत हूँ , पर यदि थोडी विश्लेषणात्मक टिपण्णी हो तो ज्यादा बेहतर लगता है &#8230;&#8230;.आख़िर अधिक टिप्पणियां अधिक आकर्षण का , अधिक traffic का जरिए तो हैं ही !</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Shastri JC Philip</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1518/comment-page-1#comment-4242</link>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Oct 2008 11:23:44 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1518#comment-4242</guid>
		<description>@Dr parveen chopra

हर्र एक आयुर्वेदिक सूखा फल होता है (मुनक्के समान) जो बहुत सी बातों के लिये उपयोगी है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@Dr parveen chopra</p>
<p>हर्र एक आयुर्वेदिक सूखा फल होता है (मुनक्के समान) जो बहुत सी बातों के लिये उपयोगी है.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: विनय</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1518/comment-page-1#comment-4241</link>
		<dc:creator>विनय</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Oct 2008 11:08:36 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1518#comment-4241</guid>
		<description>आपने बिल्कुल सही कहा शास्त्री जी फल के लिए कर्म करना पड़ता है। लेकिन कुछ अपवाद भी हैं जैसे कुछ‌ महिलाओं के चिट्ठे हैं जिन पर न टाइप सही होता हैं और न ही कही जाने वाली बात में दम मगर लोग उनके चिट्ठे पर जाकर उनकी बेहूदा रचना पर वाह-वाही करते हैं। (नोट: महिलाएँ इस टिप्पणी को अन्यथा न लें जो बेहतर रचनाएँ दे रही हैं और दूसरों का सहयोग कर रहीं उनका अंतर्मन तो स्वयं जानता है)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपने बिल्कुल सही कहा शास्त्री जी फल के लिए कर्म करना पड़ता है। लेकिन कुछ अपवाद भी हैं जैसे कुछ‌ महिलाओं के चिट्ठे हैं जिन पर न टाइप सही होता हैं और न ही कही जाने वाली बात में दम मगर लोग उनके चिट्ठे पर जाकर उनकी बेहूदा रचना पर वाह-वाही करते हैं। (नोट: महिलाएँ इस टिप्पणी को अन्यथा न लें जो बेहतर रचनाएँ दे रही हैं और दूसरों का सहयोग कर रहीं उनका अंतर्मन तो स्वयं जानता है)</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Dr parveen chopra</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1518/comment-page-1#comment-4240</link>
		<dc:creator>Dr parveen chopra</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Oct 2008 10:43:50 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1518#comment-4240</guid>
		<description>गुरूदेव, बहुत पते की बातें कही हैं आपने । पढ़ कर अच्छा लगा और खास कर शुद्ध हिंदी ....मैंने यह फिटकरी वाली कहावत सैंकड़ों बार सुन रखी है लेकिन इस के असली शब्द आज दिखे। मैं हर्र की जगह नमक समझा करता था ...वैसे हर्र का मतलब ?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>गुरूदेव, बहुत पते की बातें कही हैं आपने । पढ़ कर अच्छा लगा और खास कर शुद्ध हिंदी &#8230;.मैंने यह फिटकरी वाली कहावत सैंकड़ों बार सुन रखी है लेकिन इस के असली शब्द आज दिखे। मैं हर्र की जगह नमक समझा करता था &#8230;वैसे हर्र का मतलब ?</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Gyan Dutt Pandey</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1518/comment-page-1#comment-4239</link>
		<dc:creator>Gyan Dutt Pandey</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Oct 2008 09:54:17 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1518#comment-4239</guid>
		<description>आप सही कह रहे हैं। टिप्पणी निवेश पर बहुत निर्भर है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आप सही कह रहे हैं। टिप्पणी निवेश पर बहुत निर्भर है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Shastri JC Philip</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1518/comment-page-1#comment-4237</link>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Oct 2008 08:59:05 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1518#comment-4237</guid>
		<description>@सुब्रमनियन जी, आभार! दूसरी गलती भी ठीक कर दी गई है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@सुब्रमनियन जी, आभार! दूसरी गलती भी ठीक कर दी गई है.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Shastri JC Philip</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1518/comment-page-1#comment-4236</link>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Oct 2008 08:12:45 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1518#comment-4236</guid>
		<description>@सुब्रमनियन जी एवं अजित, मैं ने गलती सुधार दी है.

@सरिता जी, मेरा विषय गिनती बढाने के लिये की गई टिप्पणी नहीं है, बल्कि इस प्रश्न का उत्तर है कि कुछ लोगों को क्यों अधिक टिप्पणियां मिलती हैं.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@सुब्रमनियन जी एवं अजित, मैं ने गलती सुधार दी है.</p>
<p>@सरिता जी, मेरा विषय गिनती बढाने के लिये की गई टिप्पणी नहीं है, बल्कि इस प्रश्न का उत्तर है कि कुछ लोगों को क्यों अधिक टिप्पणियां मिलती हैं.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: पा.ना. सुब्रमणियन</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1518/comment-page-1#comment-4235</link>
		<dc:creator>पा.ना. सुब्रमणियन</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Oct 2008 08:11:39 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1518#comment-4235</guid>
		<description>पुनः क्षमा करें. मैने दो वाक्यों मे सुधार की गुंजाइश बताई थी. एक तो सुधर गयी. दूसरी रह गयी.
&quot;टिप्पणियों की इच्छा करना आम टिप्पणीकारों के लिये&quot; 
&quot;टिप्पणीकारों&quot; की जगह पुनः &quot;चिट्ठाकारों&quot; होना चाहिए</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पुनः क्षमा करें. मैने दो वाक्यों मे सुधार की गुंजाइश बताई थी. एक तो सुधर गयी. दूसरी रह गयी.<br />
&#8220;टिप्पणियों की इच्छा करना आम टिप्पणीकारों के लिये&#8221;<br />
&#8220;टिप्पणीकारों&#8221; की जगह पुनः &#8220;चिट्ठाकारों&#8221; होना चाहिए</p>
]]></content:encoded>
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