वसाई का किला

पी एन सुब्रमनियन 

Fort Gate 

बसाई, बसीन या आजकल का वसाई , मुंबई से लगभग 50 कि.मी. उत्तर क़ी ओर अरब महासागर तट पर एक खूबसूरत गाँव है. वैसे तो मुंबई समुद्र तट पर बहुत सारे किले हैं पर यहाँ का किला अपने आप में महत्वपूर्ण है. एक लंबे समय से मै वहाँ जाने क़ी सोचा करता था पर विभिन्न कारणों से किसी का साथ नहीं मिल पाया. इस बार जब मै मुंबई गया तो ठान ही लिया कि भले अकेले जाना पड़े, मै तो जाऊँगा ही. 31 अगस्त को मुझे मौका मिल गया.

 

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एक मित्र को साथ लेकर हम दादर से वीरार जाने वाली ट्रेन मे चढ़ गये. वसाई रोड स्टेशन लगभग एक घंटे में आ गया. हम लोग वहीं उतर गये. बस स्टॅंड नज़दीक ही था. पता चला कि सीधे किले को जाने वाली बस के आने मे अभी देर है.

 

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एक दूसरी बस वसाई गाँव तक ही जा रही थी. लोगों ने कहा कि चढ़ जाओ, वहाँ से ऑटो कर लेना. हम निकल पड़े और थोड़ी ही देर में वसाई गाँव पहुँच गये. बस स्टॅंड मे उतर कर इधर उधर देखा. सड़क के उसपार के एक होटेल पर नज़र पड़ी. सोचा पहले पेट पूजा कर लेते हैं. खाना बढ़िया था और महँगा भी नहीं. बाहर निकल कर थोड़ी सी चहलकदमी क़ी. चारों तरफ हरियाली थी. गाँव सॉफ सुथरा और सुंदर आधुनिक मकानों से भरा था. मुझे लगा कि बसने के लिए इससे सुंदर जगह क्या होगी. ऑटो क़ी कमी नहीं थी. हमने एक को रोका और किले तक जाने के लिए 20 रुपये में उसे पटा लिया. उसने हमें गाँव के अंतिम छोर में उतार दिया और कहा कि किला बगल में ही है. हमने देखा सामने समुद्र क़ी खाड़ी थी और बहुत सारे नाओं का जमघट था. पलट कर बाईं तरफ देखा तो किले का बड़ा दरवाज़ा दिखाई दिया.

 

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इस बीच एक नज़र, संक्षेप में ही सही, इस किले के इतिहास पर भी डाल लें.  बहुत पहले से ही वसाई पश्चिमी तट पर व्यापार का एक बड़ा केन्द्र रहा है. यहाँ का किला गुजरात के सुल्तान, बहादुर शाह के आधीन था. अपने व्यापार के सन्दर्भ में पुर्तगालियों क़ी नज़र गुजरात तट पर स्थित दिऊ द्वीप पर थी. अपनी नौसैनिक बेड़े के बूते वे तटीय क्षेत्रों में बार बार आक्रमण कर अपार क्षति पहुँचाया करते. आख़िरकार उन्होंने वसाई किले पर अपना अधिकार जमा ही लिया. गुजरात सुल्तान के साथ संपन्न, 23 दिसंबर 1534 के एक संधि के द्वारा मुंबई सहित पूरा तटीय क्षेत्र पुर्तगालियों के कब्ज़े में आ गया. फिर उन्हों ने नये सिरे से एक विशाल किला बनवाया. इतना बड़ा कि पूरी बस्ती परकोटे के अंदर ही समा गयी थी. सुरक्षा के लिए किले के चारों ओर 11 बुर्ज बने थे. यह किला अपने भव्य भवनों और कलात्मक चर्चों के लिए विख्यात था. वसाई, भारतीय उपमहाद्वीप में पुर्तगालियों के व्यापारिक गतिविधियों का मुख्यालय बन गया.

 

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सन 1665 में पुर्तगाल की राजकुमारी की शादी इंग्लेंड के राजकुमार से हुई. दहेज में मुंबई का द्वीप समूह और आस पड़ोस के क्षेत्र अँग्रेज़ों को हस्तांतरित किए गये. वसाई का महत्व इस से जाता रहा. लगातार 200 वर्षों तक वसाई का किला पुर्तगाली अधिपत्य में रहा. सन 1739 में मराठा शासक बाजीराव पेशवा के छोटे भाई चीमाजी अप्पा ने वसाई को अपने कब्ज़े में ले लिया. भारी लूटपाट हुई थी. भवनों एवं चर्चों को अपार क्षति पहुँची. चर्च के घंटों को हाथियों पर लाद कर ले जाया गया और उन्हे मंदिरों में स्थापित कर दिया गया. सन 1801 में बाजीराव द्वितीय के निरंकुश शासन से तंग आकर यशवंत राव होलकर ने बग़ावत कर दी. बाजीराव (द्वितीय) परास्त हुआ और भाग कर उसने इसी वसाई के किले में शरण ली. इसके पश्चात कुछ समय के लिए वसाई का नाम बाजीपुर भी रहा है. सन 1802 में बाजीराव और अँग्रेज़ों के बीच एक संधि (बसीन संधि) हुई जिसके तहत बाजीराव को पुनः पेशवा की गद्दी में बिठाने का वचन अँग्रेज़ों ने दिया. अंततोगत्वा वसाई का किला ही नहीं, बल्कि पूरा क्षेत्र अँग्रेज़ों के प्रभुत्व में आ गया.  इस किले को अँग्रेज़ों के द्वारा बसीन पुकारा जाता रहा.

 

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चलिए इतिहास को छोड़ वर्तमान की ओर बढ़ते हैं. बोट जेट्टी की ओर से हमे किले का द्वार दिखता है. जैसा हर किले मे होता है, यहाँ पर भी जीरणावस्था में कील लगे दरवाज़े थे जो खुले मिले. अंदर दाहिनी ओर बने दूसरे दरवाज़े से प्रवेश करने पर लगा कि हम जंगल में आ गये हैं.  वसाई गाव में तो हमे सैकड़ों नारियल के पेड़ दिखे थे. पर यहाँ उनको छोड़ कई अन्य प्रकार के पेड़ दिखे. खजूर के पेड़ों का तो जंगल ही था. लगता है यहाँ के वाशिंदे खजूर के प्रेमी रहे होंगे और जो बीज फेंक दिए गये, सभी अंकुरित हो गये. सामने झाड़ियों के बीच से एक चौड़ी पगडंडी थी.  हम आगे बढ़ते गये. एक के बाद एक भवनों के खंडहर अगल बगल दिखते रहे. चर्चों के भी खंडहर मिले. कुछ का अग्र भाग बहुत ही सुंदर था. कुछ की हालत ठीक ठाक थी, जहाँ तराशे गये पत्थरों का प्रयोग किया गया था.  कुछ चलने के बाद हमे एक छत वाली चर्च भी दिखी. कोई शक नहीं, वे बड़े कलात्मक रहे होंगे. हमे बताया गया था कि बुज़ों पर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ बनी है पर झाड़ झनकाड को देख हिम्मत नहीं हुई. कुछ बड़ी बड़ी इमारतों के पास भी नहीं जा सके. लगा कि हमने ग़लत समय चुना. संभवतः अगस्त का महीना अनुकूल नहीं है. चलते चलते एक दूसरे   दरवाज़े से हम लोग बाहर ही पहुँच गये.

हमे यह समझ नहीं आया कि आरकेलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, जिसके आधीन यह किला है, कर क्या रहा है. कोई देख रेख नहीं और कोई रख रखाव नहीं. यही कारण रहा होगा कि रविवार होने के बावज़ूद हमे कोई पर्यटक नहीं दिखा.

स्थानीय जन जीवन और लोगों क़ी संस्कृति पर 200 वर्षों के पुर्तगाली शासन का प्रभाव देखने के लिए किले के आस पास एवं निकट के वसाई गाँव का भ्रमण आवश्यक लगा पर समयाभाव के कारण लाचार था. घूमने के लिए भी पास ही कई स्थल, जैसे सामुद्री तट (बीच), जलप्रपात आदि हैं.

 

 

लेखक का चिट्ठा: Malhar

छाया चित्र: श्री हिमांशु सरपोत्दार

Posted under भारत

9 Comments so far

  1. anil pusadkar October 19, 2008 5:08 pm

    सच मे दुर्दशा है हमारे देश मे ऐतिहासिक धरोहरों की।मेरे मन भी मुम्बई के आस-पास के किले देखने की इच्छा है,कुछ आपके माध्यम से सुब्रमणियम साहब का लेख पढ कर पूरी हि गई। आभार आपका।

  2. वसई के एक ब्राह्मण की आत्मकथा पढ़ी थी १८५७ की पृष्ठभूमि में। अब यह पोस्ट। वसई के बारे में और जानने का मन हो रहा है।

  3. G Vishwanath October 19, 2008 10:51 pm

    रोचक लेख। चित्र भी अच्छे थे।
    मुम्बई में जन्मा हूँ और १८ साल मुम्बई में रहा हूँ।
    इस किले के बारे में बहुत सुन चुका हूँ लेकिन कभी देखने नहीं गया। अब अगली बार जब मुम्बई जाऊँगा, तो अवश्य यह किला देखने जाऊँगा।

    वैसे अब बेंगळूरु में रह्ते रहते ३४ साल हो गए।
    अब भी यहाँ के सभी दर्शनीय स्थानों को देखा नहीं।
    बस हम जैसे आलसी लोगों को आप जैसे मित्रों का यहाँ आकर, इनके बारे में जानकारी देने का इन्तज़ार है!

  4. Ratansingh October 20, 2008 1:08 am

    रोचक और अच्छी जानकारी के लिए आभार

  5. विनय October 20, 2008 9:52 pm

    बढ़िया रहा इस लेख के साथ जुड़ा अनुभव!

  6. venus kesari October 21, 2008 2:07 am

    आज आपके इस लेख का एक अंश अमर उजाला के ब्लॉग कोना में पढ़ा अच्छा लगा

    वीनस केसरी

  7. sameer yadav October 21, 2008 7:04 am

    आप जैसे सुधि पर्यटकों का घूमना फिरना भी समाजोपयोगी होता है. हमारे जैसे घूम भी आये और बाद में याद करते वक्त भी पत्नी या दोस्तों से पूछे….”यार वो अपन पिछले साल जहाँ गए थे वो कौन सी जगह थी….हाँ ! फोटोग्राफ भी लिया था ….पता नहीं .? .याद ही नही आ रहा. हा हा..!! लिखते रहिये.

  8. Zakir Ali 'Rajneesh' October 21, 2008 6:24 pm

    आपकी इस पोस्ट को कल के अमर उजाला ने अपने सम्पादीय पृष्ठ पर छपने वाले कॉलम “ब्लाग कोना” में स्थान प्रदान किया है। बधाई।

  9. Shastri JC Philip October 22, 2008 5:47 am

    आज से 18 साल पहले 4 दिन वसई में रहा था, लेकिन जानकारी के अभाव के कारण मैं इस एतिहासिक किले को देखने से वंचित रहा.

    आपका लेख पढ कर अच्छा लगा. हिन्दुस्तान इतनी विविधता लिये हुए है कि जब तक कोई बताये नहीं तब तक बहुत सारी बातें अज्ञात रह जाती हैं.

    सस्नेह — शास्त्री

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