आज सुबह पढा कि हिन्दुस्तान ने चंद्रायण का सफल विक्षेप कर दिया है एवं वह चंद्रमा की ओर अग्रसर है. बडी खुशी हुई. लेकिन मेरी खुशी देख आज कई लोगों ने पूछा कि क्या यह खरबों रुपये की बर्बादी नहीं है.
जब भी कोई खर्चीला कार्य किया जाता है तो बहुत से लोग एकदम पूछते हैं कि जब इस देश में करोडों लोग नंगे एवं भूखे हैं, तो उस समय अरबों रुपये के इस तरह के कार्य करने का क्या औचित्य है. यदि करोडों अरबों रुपये खर्च करके राजनीतिज्ञों की मूर्तियां स्थापित करने के बारें में इस तरह का प्रश्न पूछा जाये तो उसे सही प्रश्न कहा जा सकता है. लेकिन वैज्ञानिक कार्यों के बारे यह प्रश्न गलत होगा. कारण यह है कि अरबों रुपये के वैज्ञानिक अनुसंधानों का लाभ औसत व्यक्ति एकदम समझ नहीं सकता है.
आम व्यक्ति पैसे के मामले में चट मंगनी पट ब्याह वाला हिसाब चाहता है. उसे लगता है कि आज पैसा लगाये तो आज ही परिणाम दिखे. कम से कम कल तो दिखे. लेकिन कई बार अनुसंधान एवं खोज पर लगाये जाने वाले धन का असर पांच या दस साल बाद दिखता है. कई परिणाम इस तरह के भी होते हैं जो एकदम दिख जाते हैं लेकिन जनता को पता नहीं चलता कि वह इन अनुसंधानों का परिणाम है.
उदाहरण के लिये “वेलक्रो” को देख लें. आज हाथघडी के पट्टे से लेकर सर्जिकल वार्ड तक इसका प्रयोग एक आम बात है. वेलक्रो के कारण तमाम तरह के कार्य बहुत आसान हो गये हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसका अविष्कार अमरीकी चंद्रमा-मिशन के अनुसंधान के दौरान हुआ था. इसी तरह कई प्रकार के अतिविशेष लेकिन बहुत ही आम प्रयोग में आने वाले नट-बोल्ट का अविष्कार भी इस मिशन के दौरान हुआ था.
मेरे भौतिकी के आचार्य अकसर कहा करते थे कि वैज्ञानिक अनुसंधानों का “क्या फायदा है” यह प्रश्न एवं एक नवजात शिशु से समाज को क्या फायदा है ये दोनों प्रश्न एक समान गलत हैं. ये हृस्व दृष्टि के कारण पूछे जाते हैं. यदि हर बात में हम इस तरह के प्रश्न पूछने लगें एवं जिन बातों से तुरंत फल न मिले उनको त्यागने लगें तो समाज में लगभग सारे मुख्य कार्य बंद हो जायेंगे. विद्यार्थीगण कल के लिये तय्यारी करना बंद कर देंगे, किसान बीज बोना बंद कर देगा, बागवान आपना काम बंद कर देगा.
मानव समाज में अधिकतर महत्वपूर्ण कार्य दूरदृष्टि एवं काफी लम्बी योजना मांगते हैं. वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास उससे भी अधिक समय मांगते हैं. अत: वैज्ञानिक अनुसंधान पर किया गया खर्चा अपव्यय नहीं बल्कि दीर्घ दृष्टि से किया गया निवेश है.
चंद्रायण के सफल विक्षेप के लिये आप सब को बधाई! जय हिन्द!!












October 21st, 2008 at 8:22 pm
चंदा मामा का हाल चाल पूछने गये हैं
October 21st, 2008 at 8:47 pm
सही कहा लेकिन एक balance तो होना ही चाहिये दोनों में..
October 21st, 2008 at 8:59 pm
ऊँगली उठाने वाले नासमझ है.
October 21st, 2008 at 11:16 pm
जय हिन्द!
October 22nd, 2008 at 12:19 am
क्यूँ एक आदमी अच्छे कपड़े से अधिक अच्छे खाने पर खर्च करता है? क्यूँ एक आदमी खुद से अधिक बच्चों पर खर्च करता है? क्यूँ एक व्यक्ति की इच्छा होती है कि वह अपने बाद बच्चों के लिए कुछ अधिक छोड़ जाए? क्यूँ एक आदमी खाने के बजाय किताब पर खर्च कर देता है? बहुत सी बातें हैं जिस का जवाब सब जानते हैं। फिर भी सवाल उठाते हैं। जब हमने अपने संविधान में समाजवाद को स्थान देते हुए भी खुले बाजार वाले पूंजी तंत्र को अपना लिया है तो भूख, गरीबी, विपन्नता मिटाने की जिम्मेदारी सरकार की नहीं रही। उस की जिम्मेदारी सिर्फ संकट में पूंजीपतियों को बचाने की है ताकि कह सके कि हमने जनता के भले के लिए कंपंनी को फेल नही होने दिया।
October 22nd, 2008 at 12:24 am
शीर्षक को देख मै एकबारगी चौंक पड़ा था. कही आप भारत कर्नाड की भधा तो नहीं बोल रहे हो. पूरा पढ़ने के बाद कहीं आश्वस्त हुआ.
यान पर नासा के पे लोड (२) भी हैं. बधाई.
October 22nd, 2008 at 2:18 am
छिद्रान्वेषी लोगों की समझदारी बढ़ाने का धन्यवाद। जो कुछ नहीं कर सकते, वे बैठे-ठाले इसी प्रकार के प्रश्न उठाते हैं।
October 22nd, 2008 at 3:56 am
पूर्ण रूप से सहमत।
उपग्रहों पर किया गया व्यय का लाभ आज हम अनुभव कर रहे हैं।
आज के व्यय का लाभ कल प्राप्त होगा।
October 22nd, 2008 at 5:33 am
चन्दा मामा दूर के
..
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नही नही अब तो पास के
सही कह रहे हैं। वैज्ञानीक कार्यो मे नही लगेगा तो नेता ही खाएंगे।
और आप एक दम सही कहें। ईसका परीणाम कल मीलेगा और कल हमारा देश भी तरक्की करेगा। और तरक्की।
अगर लीखने मे “हिन्दी शब्दो” मे कोई गलती हो तो उसे भूल जाएं। और मूशकूराएं।
October 22nd, 2008 at 7:02 am
वैज्ञानिक अनुसंधानों पर प्रश्न नहीं उठाना नहीं चाहिए …इससे मैं सहमत हूँ. लेकिन इस “चंद्र अभियान” की शुरुवात से ही एक विवाद इसके अनावश्यक होने और जो अन्य चंद्र अभियानों में दूसरे देशों ने जो प्राप्त कर लिया है उसे दोहराने का जुडा रहा है. इसका कोई सार्थक जवाब जवाबदेह लोगों की तरफ़ से आया भी नहीं…इसीलिए इसके खर्चीले औचित्य को लेकर सवाल उठाये जा रहे हैं. यह बात सभी समझते हैं कि कुछ ऐसे कार्य हैं जिनको नेताओं, नौकरशाहों और गैर योजनागत खर्चों की कीमत पर देशहित में करने देना चाहिए….पर चंद्र अभियान में देश के अनेक जिम्मेदार मेधा शक्ति जुड़े हुए हैं इसलिए उनसे उम्मीद है कि एक बार तथ्यों सहित जानकारी देकर इस ऊहापोह की स्थिति से उबारें. ताकि हम सभी लोग इस सफलता का जश्न पूरे मन से मनाये. शास्त्री जी मैं आपके लेखों का प्रशसंक हूँ और इस पोस्ट को भी मैंने उसी आशा से पढ़ना शुरू किया था..लेकिन मन अघाया नहीं….जो की यहाँ अमूमन होता नहीं. इसलिए यदि आप भी उपरोक्त अनुसार जानकारी दे सके तो आभारी रहूँगा.
October 23rd, 2008 at 2:42 am
सही कह रहे है सोचनी तो दूर की ही पड़ेगी
October 24th, 2008 at 4:48 am
आपके दृष्टिकोण से पूरी तरह सहमत !
October 24th, 2008 at 10:42 pm
i am happy to read what you wrote here… it was so painful to see that some ppl undermined the importance of our achievement by raising these questions…i have seen our netas spending much more than this on their one tenure in office… go question them.
April 20th, 2009 at 1:53 pm
Thanks