मेरी मां मेरी दुश्मन है 002

Praching

कार्टून: घरपरिवार विषय पर क्लास लेते हुए शास्त्री

मेरे आलेख मेरी मां मेरी दुश्मन है 001 में हम ने ‘नवीन’ की समस्या देखी थी. नवीन के लिये मेरा बाकी उत्तर इस प्रकार है:

नवीन, एक बात स्पष्ट है कि तुम बिना कुछ जानेसमझे, बिना किसी तरह की जांचपडताल के, एक लडकी पर मोहित हो गये हो. इस तरह से विवाह का निर्णय करना ना तो पुरुषों के लिये अकलमंदी की बात है न स्त्रियों के लिये. विवाह गुड्डेगुडिया का खेल नहीं है.

अब जरा दो शब्द तुम्हारी माताजी के बारें में: तुम ने खुद लिखा कि जवानी में विधवा हुई तुम्हारी सत्चरित्र एवं सुस्वभावी मां से शादी के लिये कई लोग तय्यार थे. दोनों तरफ के परिवार भी तुमको अपने पास रख कर उनका पुनर्विवाह करवाना चाहते थे. लेकिन तुम्हारी मां को यह स्वीकार नहीं था.

यदि उन्होंने अपने लाडले को अपने या अपने पति के परिवार के पास छोड दिया होता तो वे बडे मजे में एक विवाहित जीवन बिता सकती थी. लेकिन पिता  के प्यार एवं सान्निध्य को खो चुके तुम ऐसी अवस्था में मां का प्यार एवं सान्निध्य भी खो देते. मां के जीतेजी तुम लगभग अनाथ हो जाते क्योंकि मां के जीतेजी  दादादादी या नानानानी आसानी से उनका स्थान नहीं ले पाते. इस बात को अच्छी तरह समझ कर  तुम्हारी माँ ने  अकेलेपन एवं संघर्ष करके तुम को पढाया, आदमी बनाया, किसी काम के लायक बनाया.

जरा अपने बचपन की सोचो जब तुम एक नवजात शिशु थे. तम तुम बीमार पडते थे तो वे सोती नहीं थी. तुम जम कर कपडे गीले एवं गंदे करते थे, लेकिन खुशी खुशी उन्होंने तुम को सूखा रखा. ठंड में पहनाने के लिये स्वेटरमौजे बनाये.

जब तुम स्कूल जाने लगे तो भोर को सूरज के उगने से पहले उठ कर नाश्ता बना खिलापिला कर, बस स्टेंड तक पहुंचा कर, गर्मीठंड की परवाह न कर, धूपपानी की परवाह न कर, तुम को पाला. अकेलापन हमेशा उनको  कचोटता रहा होगा, लेकिन तुम को जीवन देने के लिये उन्हों ने उसे भी सहा.

आज वह पचास के आसपास पहुंच चुकी हैं. थक चुकी हैं. जीवन का सबसे अच्छा समय तुम को देकर वह अब एक कठिन समय की ओर अग्रसर हो रही हैं. पेंशन नहीं है और तुम्हारे बिना अब उनका कोई सहारा नहीं है.

उस भद्र महिला ने कितना बडा त्याग किया है. अपना सब कुछ तो तुम्हारे लिये निवेश कर दिया है. अपना कहने के लिये उनके जीवन में कुल मिला कर तुम और सिर्फ एक तुम हो. लेकिन तुम्हारी स्थिति यह है कि एक कन्या को देखते ही, उसके बारे में कुछ भी न जानते हुए भी,  एक क्षण में अपनी उस मां को त्यागना चाहते जिसने अपने जीवन के सबसे अच्छे समय को, अपने स्वास्थ्य को, एवं अपनी ऊर्जा को 25 साल तुम्हारे लिये निस्स्वार्थ खर्च किया.

तुम्हारे पत्र से यह स्पष्ट है कि जरूरते पडे तो तुम उस कन्या  से शादी के लिये अपनी मां को छोडने जैसा कार्य भी करने के लिये तय्यार हो. इसका मतलब यह भी है कि यदि तुम्हारी मां यदि इस शादी के लिये तय्यार हो भी गई तो उनको किसी तरह की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है. कल को यदि शादी के बाद उस कन्या को तुम्हारी मां पसंद न आई तो वह तो यही कहेगी कि या तो मुझे चुनो या मां को, क्योंकि दोनों का एक साथ रहना मुश्किल है.  ऐसे में तुम तो एकदम मां को त्याग दोगे. अरे भई अभी शादी नहीं हुई और तुम मां से अलविदा कहने को तय्यार हो तो आगे क्या गुल खिलाओगे.

मेरी नजर में तुम आग से खेल रहे हो. अपनी जननी जिस ने जीवन का सब कुछ तुम्हारे ऊपर निवेश कर दिया उसके साथ तुम एक क्रूर मजाक कर रहे हो. यह कृतघ्नता है.

तुम समझदार हो, अत: इन बातों को मन में रख कर तुम खुद सोचो कि आगे क्या करना है!!

(यह एक सच्ची घटना पर आधारित आलेख है. इस साल मार्च में नवीन ने मुझे पत्र भेजा. अप्रेल में उसे "परिवार"  विषय पर मेरे क्लास में बैठने का मौका मिला. मई में उसने मुझे लिखा कि वह मां को एक वृ्द्ध सदन में भेज कर उस लडकी से शादी करने वाला है. जून में उसने लिखा कि वह लडकी उसकी जेब से कई बहाने बना कर  काफी पैसा "खीच" चुकी है एवं  आजकल उसके बॉस से इश्क लडा रही है. जूलाई में पता चला कि वह वाकई में एक अपराधियों से भरे परिवार की ‘एजेंट’ है जिसका काम ही पुरुषों को फांसना है. अक्टूबर में पता चला कि नवीन की शादी एक ऐसी लडकी से हो गई है जिसने उसकी मां को हमेशा अपनी मां माना है.  हीरे कहां कहां छिपे होते हैं लेकिन लोग कोयले के पीछे पागल हो रहे हैं).

समाप्त:

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8 Comments so far

  1. समीर लाल November 13, 2008 7:12 am

    हीरे कहां कहां छिपे होते हैं लेकिन लोग कोयले के पीछे पागल हो रहे हैं).

    -बिल्कुल सही कहा आपने!!

  2. Prashant November 13, 2008 9:51 am

    सही कहा.. हीरे को पहचानना हर किसी के बस की बात नहीं होती है..

  3. नीले शब्दों में लिखे कथानक ने सब कुछ स्पष्ट कर दिया और यह भी कि अपनी ही जाति कबीले में शादी करने की प्रथा क्यों आज तक जीवित है।

  4. विष्‍णु बैरागी November 13, 2008 12:45 pm

    जिसने मां की आहें कमाई
    उसने अपनी जिन्‍दगी गंवाई

  5. sushil November 13, 2008 1:38 pm

    bahut achha lahja hai sujhav dene ka aur khas taur pe shabdo ka chayan bara khoobsoorat hai….remedy to no doubt sahi hi hia…kisi aur ki khattir maan ko chhodkar koi khush nahin rah sakta

  6. hempandey November 13, 2008 4:05 pm

    एक माँ यहाँ भी है -
    http://www.shakunaakhar.blogspot.com/

  7. नवीन ने अपनी समस्या रखी, आपने सही राह बतायी; लेकिन यौन-आशक्ति की प्रबलता के आगे उसका विवेक कमजोर पड़ गया। आजकल की दुनिया में ग्लैमर, कालेधन और स्वच्छन्दता के मेल ने संस्कार-भ्रष्ट युवकों की एक पीढ़ी तैयार करनी शुरू कर दी है।

  8. कुन्नू सिंह November 16, 2008 2:37 am

    नवीन जी ने कहा था की

    “बचपन मे उनकी मा ने उनहे मारा तक भी नही”
    एक काम नही करने दीया।

    यही तो गलती कीया की मारा नही अगर पीट पीट के सीधा कर देती तो एसा नौबत नही आता। :))))

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