कोई भी बेवकूफ चिट्ठाकारी कर सकता है 001

चिट्ठाकारी का आरंभ अंतर्जाल का तीसरा विप्लव था. पहला विप्लव अंतर्जाल आप था, दूसरा विप्लव जनसाधारण के लिये अंतर्जाल को उपलब्ध करवा देना था एवं तीसरा विप्लव था अंतर्जाल के अराजकत्ववाद को एक मूर्त रूप देना.

अंतर्जाल 1980 आदि में एक प्रयोग के रूप में शुरू किया गया था, और सिर्फ कुछ विश्वविद्यालयों एवं वैज्ञानिक संस्थाओं को इसके प्रयोग की सुविधा दी गई थी. लेकिन 1990 आदि में अमरीकी अजादी-वादियों (=अराजकत्ववादियों) के दबाव में इसे जनसाधारण के लिये उपलब्ध करवा दिया गया. उनका तर्क था कि इससे व्यापार को प्रोत्साहन मिलेगा एवं इस कारण कॉमर्स का "कॉम"  सबसे पहले उपलब्ध करवाया गया. जल्दी ही ऑर्ग एवं नेट भी आ गये. अब तो सैकडों अंत्याक्षर हो गये है, और कई नये जल्दी ही आने वाले हैं.

अमरीकी आजादी-वादियों ने हर तरह का दबाव डलवा कर यह सुनिश्चित करवा लिया था कि अंतर्जाल हर तरह के सरकारी एवं कानूनी बंधन से मुक्त रहेगा, और अंतर्जाल शुरू में ऐसा ही था — हर नियमकानून से मुक्त था. धीरे धीरे सरकारें समझ गईं कि यह तो एक बोतल से निकला जिन्न है जो अराजकत्व द्वार सब को खा जायगा, अत: अंतर्जाल के उपयोग को अपने अपने देशों में नियमकानून द्वारा कसना शुरू कर दिया.

इस बीच कुछ अमरीकी लोगों अपने मन की हर बात   को चौराहे पर  उगलने के लिये बनाया ब्लाग जहां बिना किसी तकनीकी मदद के नियमित रूप से लिखा जा सके एवं जहां टिप्पणी द्वारा जवाब देने की सुविधा हो. चूंकि अमरीका में अराजकत्व के स्तर तक व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की आजादी है, अत: चिट्ठों पर किसी को भी कुछ भी लिखने की आजादी मिल गई. फल यह हुआ कि कल तक जो चार-लाईना कापी पर अंग्रेजी के अक्षर सीख रहे थे, वे रातोंरात ब्लागर बन गये.

लेकिन जो प्रक्रियाये किसी व्यक्ति या शक्ति द्वारा नियंत्रित नहीं की जातीं, उन पर पेरेटो नियम एकदम लागू हो जाता है. इसका मतलब यह है कि 20% चिट्ठों की तरफ कोई मुड कर भी नहीं देखता है. 60% जैसे तैसे (मित्रों के बल पर) चल जाते हैं. लेकिन सिर्फ 20% चिट्ठे हैं जो पर्याप्त पाठको को अपनी ओर खीचते हैं. सिर्फ 2% चिट्ठे हैं जिन पर जबर्दस्त भीड लगती है.

मजे की बात यह है कि कुछ सामान्य नियमों का ख्याल रखें तो कोई भी चिट्ठाकार अपने चिट्ठे को सबसे ऊपर के 20% में ले जा सकता है. यह कैसे हो, इसकी चर्चा हम करेंगे कल के चिट्ठे में. इस बीच (सिर्फ यहां टिपियाने के बाद) मेरे पिछले आलेख  टिप्पणियां जो दी नहीं गईं !! को जरूर देख लें.

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21 Comments so far

  1. Gyan Dutt Pandey November 16, 2008 7:39 am

    आप हमको लक्ष्य कर पोस्टें क्यों लिख रहे हैं?! क्या दुश्मनी है! :-)

  2. Dr.Arvind Mishra November 16, 2008 8:06 am

    शास्त्री जी ,यह निश्चय ही एक विचारोत्तेजक श्रृंख्ला शुरू होने वाली है -मगर शीर्षक में कुछ परिवर्तन की जुर्रत /हिमाकत करना चाहता हूँ -मेरे विचार से ‘कोई भी बेवकूफ चिट्ठाकारी कर सकता है ००१’ के बजाय शीर्षक यह होना चाहिए था कि केवल बेवकूफ ही चिट्ठाकारी कर सकता है -सारा काम धाम छोड़कर नशे की हद तक चिट्ठाकारिता जैसे अलाभकारी शगल में मुब्तिला रहना कहाँ की बुद्धिमानी है ? मैं तो इसेपरले दर्जे की बेवकूफी के रूप में ही अभी इसे देख रहा हूँ -पर जीवन में कुछ बेवकूफियां भी भली लगती रहती हैं -जैसे पहली निगाह का प्रेम ,अपना कोई प्यारा सा शौक आदि .सच मानिए मेरी भी यह बेवकूफी मुझे कई जागतिक सरोकारों से अलग तो कर रही है मगर जो आत्मिक आनंद मुझे चिट्ठाकारिता में में मिल रहा है वह किशोर वे के प्रेम से कुछ कम नही है -कोई बेवकूफ कहे तो कहे -मुझे तो अपने में ही मगन रहना है !

  3. Ratan singh November 16, 2008 9:12 am

    एक यही तो जगह है जहाँ जितनी मर्जी बेवकूफी करलो| ज्ञान बांटो या भड़ास निकालो |

  4. सरिता अरगरे November 16, 2008 9:22 am

    आपका शीर्षक अतिवादियों की तरह बेहद भडाकाऊ और नए चिट्ठाकारों को शुरुआती दौर में ही बिदका देने वाला है ।

  5. सरिता अरगरे November 16, 2008 9:29 am

    ब्लागिंग भी एक तरह का नशा है । जैसे प्रेम का सुरुर । प्रेम करने वाले को बेवकूफ़ ठहराया जाता है ,लेकिन लोग प्रेम करना बंद तो नहीं करते ।

  6. सरिता अरगरे November 16, 2008 9:33 am

    ज़रा हमारी ब्लाग जन्म पत्री बांच कर बताइए । हम कहां ठहरते हैं -२०% ,६०% या फ़िर …..।

  7. जि‍तेन्‍द्र भगत November 16, 2008 9:47 am

    वि‍ज्ञापन इस तरह दि‍या जा सकता है-
    आप ब्‍लॉगर बनना चाहते हैं? आप लोगों का ध्‍यान बॉटना चाहते हैं? आप अपनी उँगलि‍यों को नचाना चाहते हैं?
    -तो ब्‍लॉगर बनने के लिए बेवकूफ होना एक अनि‍वार्य अहर्ता है:)

    U टर्न: काश मैं बेवकूफ न होता! :)

  8. alpana November 16, 2008 9:57 am

    genious/buddhiman mahanubhavon ki har baat dhyan ,se har jagah suni-padhi jaati hai-

    -is liye agar blogging ‘bewkoof’ bhi kar paa rahey hain , aur apni baat[chahey koi suney ya nahin]kah to paa rahey hain—badi achchee baat hai…Arvind ji ki baat se sahmat hun- जीवन में कुछ बेवकूफियां भी भली लगती रहती हैं ‘

  9. चिट्ठाकार कुछ हद तक बेवकूफ तो होता है। पर दुनिया में बड़े पड़े काम कुछ बेवकूफों ने ही किए हैं। वैसे पेरेटो के हिसाब से हम कहाँ हैं?

  10. E-Guru Rajeev November 16, 2008 10:57 am

    अरे आप तो सच में बड़े लोगों की दुकान बंद करा के ही मानेंगे. :)

  11. dhirusingh November 16, 2008 12:04 pm

    कोई भी बेवकूफ चिट्ठाकारी कर सकता है या बेवकूफ ही चिट्टाकारी कर सकता है .

  12. सबसे बड़ा बेवकूफ़ तो टिपियाने वाला हुआ ना?

  13. cmpershad November 16, 2008 1:33 pm

    डॉ अरविंद मिश्र जी, शीर्षक आकर्षक तो पढ़ने वाला बेवकूफ! अकलमंद को इशारा काफी…तो फिर, आगे पढ़ने का इरादा है?

  14. Ankit November 16, 2008 3:02 pm

    Waiting for Tomorrow for Getting 20% secrets.

  15. Ghost Buster November 16, 2008 5:12 pm

    शीर्षक से सहमत हो पाना कठिन है. आख़िर हम कहाँ कर पा रहे हैं, नियमित?

  16. “…चिट्ठाकारिता जैसे अलाभकारी शगल में मुब्तिला रहना कहाँ की बुद्धिमानी है… ?”
    अरविन्द जी, अपनी उपरोक्त बात का खण्डन आपने अपनी इसी टिप्पणी में आगे चलकर यूँ किया है:-
    “…मगर जो आत्मिक आनंद मुझे चिट्ठाकारिता में में मिल रहा है वह किशोर वे के प्रेम से कुछ कम नही है -कोई बेवकूफ कहे तो कहे -मुझे तो अपने में ही मगन रहना है !”

    ‘आत्मिक आनन्द’ को लाभ की श्रेणी में तो रखना ही पड़ेगा। इसप्रकार शास्त्री जी का शीर्षक कथन आपने सिद्ध कर दिया। :)

  17. “…चिट्ठाकारिता जैसे अलाभकारी शगल में मुब्तिला रहना कहाँ की बुद्धिमानी है… ?”
    अरविन्द जी, अपनी उपरोक्त बात का खण्डन आपने अपनी इसी टिप्पणी में आगे चलकर यूँ किया है:-
    “…मगर जो आत्मिक आनंद मुझे चिट्ठाकारिता में में मिल रहा है वह किशोर वे के प्रेम से कुछ कम नही है -कोई बेवकूफ कहे तो कहे -मुझे तो अपने में ही मगन रहना है !”

    ‘आत्मिक आनन्द’ को लाभ की श्रेणी में तो रखना ही पड़ेगा। इसप्रकार शास्त्री जी का शीर्षक कथन आपने सिद्ध कर दिया। :)

  18. “…चिट्ठाकारिता जैसे अलाभकारी शगल में मुब्तिला रहना कहाँ की बुद्धिमानी है… ?”
    अरविन्द जी, अपनी उपरोक्त बात का खण्डन आपने अपनी इसी टिप्पणी में आगे चलकर यूँ किया है:-
    “…मगर जो आत्मिक आनंद मुझे चिट्ठाकारिता में में मिल रहा है वह किशोर वे के प्रेम से कुछ कम नही है -कोई बेवकूफ कहे तो कहे -मुझे तो अपने में ही मगन रहना है !”

    ‘आत्मिक आनन्द’ को लाभ की श्रेणी में तो रखना ही पड़ेगा। इसप्रकार शास्त्री जी का शीर्षक कथन आपने सिद्ध कर दिया। :)

  19. जाहिर है कुछ न कुछ तुष्टि हो रही है हम सबकी , जिसकी वजह से हम आज ब्लॉग्गिंग के बवाले जान में पड़े हुए हैं!!

    रही बात शीर्षक की तो वह तो शास्त्री जी की पुरानी कोचिंग का नया उदाहरण लगता है !!
    हमारी भी तो औकात बता दीजिये ????

  20. विवेक केसरवानी November 17, 2008 12:54 am

    बिल्कुल सही कहतें है आप. शौकिया या उत्सुकतावश बहुत से लोग चिटठा बना तो लेते है पर उसे नियमित रूप से अद्यतन नही करते है. इसके अलावा वे दूसरों के ब्लॉग को पढने और टिपण्णी करने में भी कोई रूचि नही रखते, ऐसे ही लोग ८० प्रतिशत के श्रेणी में आ जाते है जिन्हें दोबारा कोई लौट कर देखना नही चाहता है.

  21. नरेश सिंह November 17, 2008 3:10 pm

    यदि पाठक ज्यादा मिलते है तो ब्लोग्गर बुद्धिमान,पाठक कम मिलते है तो बेवकूफ। जो मर्जी सो कहो ,ब्लोगर अपनी मश्ती मे रहता है ।

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