मैं अपने बेटे के साथ रहने गया तो कई विशेष लोगों से मुलाकात हुई. इन में एक है उसके घर झाडूपोछा करने वाली बाई. लगभग 60 से 70 साल की होगी. आज से 8 महीने पहले डा आनंद ने जैसे ही अपने क्वार्टर में डेरा जमाया तो यह स्त्री आई और बोली कि इसके पहले सभी डाक्टरों का काम उस ने किया है अत: उसे एक अवसर दिया जाये.
एक अविवाहित नवजवान के लिये झाडूपोछा लगाने वाले व्यक्ति का मिलना तो बहुत सुविधा की बात हुई तो उस स्त्री को रख लिया गया. हर दिन वह अपने नियमित समय से आ कर झाडू पोछा एवं कपडे धोने लगी. चार दिन के बाद डाक्टर को उस से निर्देश मिला कि आईंदा आप सुबह अपना बिस्तरा न बिछाया करें. एक हफ्ते में उस बुजुर्ग स्त्री ने झाडूपोछे के अलावा कपडा धोना, बिस्तरा बिछाना, बर्तन धोना, पीने का पानी भरना आदि काम अपने हाथ में ले लिया.
अगले हफ्ते से उसने बिस्तर के गद्दे-चादरों को अपने आप धूप में डालना शुरू कर दिया. उसके अगले हफ्ते अल्मारी में जो कपडे बिन उपयोग के पडे रहते हैं उनको भी धूप में डालना शुरू किया. कुल मिला कर एक घर में जो कुछ भी किया जा सकता है वह सब अपने आप उस वृ्द्धा ने अपने हाथ में ले लिया.
महीने के अंत में आनंद ने बडे हिचकिचाते हुए 500 रुपये उस वृद्धा के हाथ में रखे, यह सोच कर कि इतना पर्याप्त होगा कि नहीं. लेकिन ताज्जुब, उस वृद्धा ने 200 रुपये अपने पास रखे और बाकी जबर्दस्ती वापस कर दिये. वह बोली कि उसके मेहनत की कितनी कीमत है यह उसे मालूम है और उससे अधिक नहीं चाहिये. इसके बाद कई बार डा. आनंद ने इस पैसे को बढाने की और उसे विशेष अवसरों पर पैसे देने की कोशिश की. लेकिन उसने कभी भी एक पैसा नहीं लिया. उसका रिकार्ड है कि पिछले 60 सालों में उसका यही नजरिया रहा है. इतना ही नहीं कभी भी किसी डाक्टर का पांच पैसा भी गुम नहीं हुआ, बल्कि जो पैसे-कागजात वे जेबों में भूल जाते है वे डांटडपट के साथ उनके मेज पर रख दिये जाते हैं.
मैं दो हफ्ते बेटे के साथ वहां रहा तो उस वृद्धा ने मेरे भी सारे कपडे धोये. कंबलचादर मेरे मना करने के बावजूद एक बार धोया एवं दो बार धूप में गरम किया. मैं जिस दिन वहां से निकला उस दिन (शायद जान बूझ कर) वह मेरे जाने के बाद ही आई. मैं जो 500 रुपये आभार के रूप में उसके लिये छोड गया था वह मेरे बेटे से लेने में उसने काफी अनाकानी की, लेकिन बेटे ने उसे जबर्दस्ती पकडा दिया. अब डर है कि इस महीने के अंत में जब उसे 200 रुपये दिये जायेंगे तब उसे लेने से ही मना न कर दे.
ऐसे भी हैं लोग भारतीय समाज में!
अकसर हम अपने चारों तरफ फैले लालची, बुरे एवं धोखेबाज लोगों को देख कर इतना त्रस्त हो जाते हैं कि समाज के अच्छे, समर्पित, एव सतजनों को भूल जाते हैं. वास्तव में यदि समाज चल रहा है तो इन लोगों के कारण ही चल रहा है. इन लोगों को मैं अपना नमन अर्पित करता हूँ.
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January 29th, 2009 at 8:04 am
सारथी जी,
अब भी ऐसे लोग है इसी भारत में ! मेरे घर भी झाडू पोचा करने वाली जीनत भी ऐसी ही खुद्दार है उसे भी हम कितने ही दिन के लिए बाहर जाए घर की चाबियाँ देकर जाते है क्या मजाल एक सुई भी कभी कम हो जाए ! और हमारे पड़ोसी सक्सेना जी के बेटी के विवाह में तो पुरे सामान का चार्ज ही इसके हाथ में था ! आज भी ऐसे लोगों की भारत में कमी नहीं है ,जिन पर आँख मूंद कर विश्वास किया जा सकता है !
January 29th, 2009 at 9:30 am
ईमान और ख़ुद्दारी-इनके अलावा ग़रीबों के पास और दौलत ही क्या होती है? अभागे हैं वे जो इनसे भी हाथ धो बैठते हैं।
January 29th, 2009 at 9:32 am
हैं, हैं बस इस के बाद एक “लेकिन” आता है. आभार अपने सुंदर अनुभव बाँटने का.
January 29th, 2009 at 10:09 am
60 से 70 साल की होगी. is it ok to keep such old people for work . should we not try to organise for them some pensions that are given by goverment ,
people above the age of 60 should not be asked to work and same is for people below the age of 18
i think it would be good if you can make her aware that she is entitled to govt pension of about rs 200 per month
it would be a great service that you would be doing for society
at least then she would not need to work at this age
January 29th, 2009 at 10:13 am
आज की दुनिया में जब अपने भी धोखा देनें में नही चूकते ,तब ऐसे लोगो की उपस्थिति बहुत सुखद लगती है।आज भी ऐसे लोग हैं … विश्वास नही होता। लेकिन ऐसी बाते पढ सुन कर उम्मीद बँधती है।
January 29th, 2009 at 10:23 am
@Rachna
People in villages work till the end of their life. There is nothing wrong if they do so this voluntarily. Work is a blessing when done voluntarily.
This lady gets old age pension, but works as a commitment to life. Why should we dissuade a person from working if he/she finds pleasure in it.
Shastri
January 29th, 2009 at 11:13 am
कमाल है! इसी तरह हम भी क्रियाशील रहना चाहेंगे।
January 29th, 2009 at 11:29 am
child labor also has the same logic that you ar giving here sir but then its banned why ?? i visit sita pur very often and children are suffering ther from hunger but are not allowed to work
January 29th, 2009 at 11:43 am
यदि समाज चल रहा है तो इन लोगों के कारण ही चल रहा है
January 29th, 2009 at 11:48 am
परमजीत वाली जी ने ठीक ही कहा है कि “आज की दुनिया में जब अपने भी धोखा देनें में नही चूकते ,तब ऐसे लोगो की उपस्थिति बहुत सुखद लगती है।”
कहा गया है कि व्यक्ति कभी भी किसी को दोखा नही देता , देता भी है तो स्वयं को धोखा देता है . वैसे क्रियाशीलता के बारे में आयुर्वेद में ऐसा उल्लेख है कि जो जितना चलेगा उतना जियेगा , आपके इस सार्थक आलेख हेतु आभार !
January 29th, 2009 at 11:51 am
@Rachna
I believe the two cannot be compared. One is the case of an adult who “loves” to work in spite of getting a pension. The other is the case of children who are not mature yet to take decisions.
January 29th, 2009 at 1:36 pm
जी हाँ ढेरो लोग है ….आज भी ….उम्मीद की एक लौ लिए हुए .
January 29th, 2009 at 2:17 pm
accha lagta hai aise logon ke bare me padh kar. ghar ka hissa hote hain ye, bilkul parivar ki tarah.
January 29th, 2009 at 2:36 pm
ऐसे लोगों ने ही तो इस दुनिया को संतुलन बनाया हुआ है नही तो ….। हमारी तरफ से उन्हें प्रणाम।
January 29th, 2009 at 4:39 pm
ऐसे लोग भी है ये जानकर और पढ़कर अच्छा लगा ।
January 29th, 2009 at 5:18 pm
subah hi padha, kuchh comment bhi likha.. magar jaane kya sochkar post nahi kiya..
vaise aaj ka post sach me achchha laga..
January 29th, 2009 at 6:35 pm
सचमुच भले ही कम हैं पर ऐसे लोग हैं जो खुद्दार भी हैं और अपने समय व काम के पक्के …..अच्छा लेख
अनिल कान्त
मेरी कलम – मेरी अभिव्यक्ति
January 29th, 2009 at 6:59 pm
शास्त्री जी,
अभी भी हमारे भारतीय समाज में ऐसे लोग रहते हैं. वो तो आप और आपके बेटे भले आदमी हैं अन्यथा ये दुनिया तो ऐसे लोगों का समाज में रहना भी मुश्किल कर देती है.
और रचना की कमेन्ट पढ़कर तो आपको पक्का एक बार गुस्सा जरूर आया होगा. रचना ने थ्योरिटिकल बात लिखी है जबकि जिन्दगी प्रैक्टिकल होती है.
January 29th, 2009 at 7:03 pm
निश्चित ही,… मानवीय मूल्यों के निरंतर क्षरण के दौर में ये ही कुछ उदहारण हैं जो आज भी उम्मीद कायम रखते हैं….
एक सकारात्मक लेख के लिए साधुवाद
January 29th, 2009 at 10:49 pm
याद आ गए मुझे अपने बचपन के दिन जब ‘बिरमो’ हमारे घर काम करती थी. मम्मी से ज़्यादा बिरमो प्यार करती थी और उस वक्त भी जब हाथ से दूध का गिलास गिर जाता था. बहुत सही कहा शास्त्रीजी समाज इन्हीं लोगों के कारण चल रहा है.
January 29th, 2009 at 11:24 pm
अच्छा लगा , अच्छा लगा हो रहा है हिन्दी में और उपदेश झाडे जारहे हैं अंग्रेजी में . काश कोई इनको साथ ही साथ हिन्दी में भी लिख देता .
वैसे तो यह ब्लॉग मालिक का फर्ज़ बनता है
January 30th, 2009 at 6:00 am
[...] क्या ऐसे लोग अभी भी हैं?? [...]
January 30th, 2009 at 3:16 pm
अच्छी प्रविष्टि. विवेक जी की बात को बहुत बार गंभीरता से न लेने पर भी वह नाराज नहीं होते.
January 30th, 2009 at 5:57 pm
बहुत कम लोग बचे हैं ऐसे .जो भी है वह प्रेरणा दायक है ..
February 1st, 2009 at 3:36 pm
[...] 6. Another Hindi post which I would like to link here is from Shastri Philip. He writes about an old woman. Do such people still exist ? Please read the post. [...]
February 1st, 2009 at 8:14 pm
शास्त्रीजी, मेरी माँ हमेशा कहती है की आज भी दुनिया में बुरे लोगो से ज्यादा अच्छे लोग मौजूद है, इसीलिए यह दुनिया आज भी कायम है. आपने जिस व्यक्ति के बारे में लिखा है, वोह ऐसी ही एक मिसाल है .
May 13th, 2009 at 7:15 am
Really apealing article, This world is moving because of such nice old persons, otherwise I guarntee you young generation will ask more than they deserve for the work as their un necessay requirnment are self created and are endless. I salute that Old women. Shastriji aap ne such kaha , now onwards she will not accept the money from you.Want to write more , but words are there,but hindi net par likhni nahin aati.Hindi mein vicharon ki abhvakti and bhawnatmak santulan achha banta ha, yeh mera manana ha