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	<title>Comments on: जब आप का बच्चा उल्टासीधा बोलने लगे!</title>
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	<link>http://sarathi.info/archives/1919</link>
	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>By: चड्डी-कंडोम कांड &#8212; आखिरी अध्याय!! &#124; सारथी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1919/comment-page-1#comment-5662</link>
		<dc:creator>चड्डी-कंडोम कांड &#8212; आखिरी अध्याय!! &#124; सारथी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 21 Feb 2009 00:31:31 +0000</pubDate>
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		<description>[...] जब आप का बच्चा उल्टासीधा बोलने लगे!  [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] जब आप का बच्चा उल्टासीधा बोलने लगे!  [...]</p>
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		<title>By: राज भाटिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1919/comment-page-1#comment-5631</link>
		<dc:creator>राज भाटिया</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Feb 2009 21:08:54 +0000</pubDate>
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		<description>शास्त्री जी आप के यहां आ कर लगता है किसी योगी के आश्रम मे आ गये हो, बहुत अच्छा लगता है, बाकी आप का आज का लेख भी हमेशा की तरह से बहुत ही सुंदर लगा,आप की हर बात से  सहमत हुं, लेकिन असली बा को हटा कर लोग फ़िर से पहले अपनी ही बुरी बात आगे रखते है, जिस के कारण हम सब असली मुद्दे से भटक जाते है, भारत मे बाल विवाह होता था, जिस का कोई कारण था, वो कारण वेफ़जुल नही था, लेकिन अब भी लोग बच्चो की शादी करते है, लेकिन कितने परतिशत, बहुत कम, कितने लोग अपनॆ बच्चो से गंदी हरकते करते है, बहुत ही कम, तो क्यो हर बहस पर हम इन्ही बातो को आगे ला कर बात बदल देते है, 
आप ने जो विचार रखा है वो उचित है, ओर उस पर बिलकुल बहस हो, लेकिन गडे मुरदे साथ मे ना उखाडे जाये, कुछ लोगो की बुराई सारे समाज की बुराई नही, लेकिन आने वाली बिमारी से तो सारे समाज को बचा सकते है, वरना ......
शास्त्री जी आप लगे रहे अपने प्रयास मै. धन्यवाद
पश्चिम को जितना मेने नजदीक से देखा है ३० सालो मे , क्या यह लोग जो इस पश्चिम की तरफ़ दारी करते है, उन्होने तो सिर्फ़ किताबो मे ही इसे पढा है, क्या उन्होने इन लोगो को इतना नजदीक से देखा है, इन लोगो का दर्द देखा है, वो लोग तो इन का चमच्माता चेहरा देख कर सोचते है कि पश्चिम वाले बहुत सुखी है... ओर यही इन सब की पहली भुल है.
हर हंसने वाला सुखी नही होता, लेकिन ....</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शास्त्री जी आप के यहां आ कर लगता है किसी योगी के आश्रम मे आ गये हो, बहुत अच्छा लगता है, बाकी आप का आज का लेख भी हमेशा की तरह से बहुत ही सुंदर लगा,आप की हर बात से  सहमत हुं, लेकिन असली बा को हटा कर लोग फ़िर से पहले अपनी ही बुरी बात आगे रखते है, जिस के कारण हम सब असली मुद्दे से भटक जाते है, भारत मे बाल विवाह होता था, जिस का कोई कारण था, वो कारण वेफ़जुल नही था, लेकिन अब भी लोग बच्चो की शादी करते है, लेकिन कितने परतिशत, बहुत कम, कितने लोग अपनॆ बच्चो से गंदी हरकते करते है, बहुत ही कम, तो क्यो हर बहस पर हम इन्ही बातो को आगे ला कर बात बदल देते है,<br />
आप ने जो विचार रखा है वो उचित है, ओर उस पर बिलकुल बहस हो, लेकिन गडे मुरदे साथ मे ना उखाडे जाये, कुछ लोगो की बुराई सारे समाज की बुराई नही, लेकिन आने वाली बिमारी से तो सारे समाज को बचा सकते है, वरना &#8230;&#8230;<br />
शास्त्री जी आप लगे रहे अपने प्रयास मै. धन्यवाद<br />
पश्चिम को जितना मेने नजदीक से देखा है ३० सालो मे , क्या यह लोग जो इस पश्चिम की तरफ़ दारी करते है, उन्होने तो सिर्फ़ किताबो मे ही इसे पढा है, क्या उन्होने इन लोगो को इतना नजदीक से देखा है, इन लोगो का दर्द देखा है, वो लोग तो इन का चमच्माता चेहरा देख कर सोचते है कि पश्चिम वाले बहुत सुखी है&#8230; ओर यही इन सब की पहली भुल है.<br />
हर हंसने वाला सुखी नही होता, लेकिन &#8230;.</p>
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		<title>By: vivek</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1919/comment-page-1#comment-5630</link>
		<dc:creator>vivek</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Feb 2009 12:06:46 +0000</pubDate>
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		<description>@pooja

भटकाव नहीं कुछ फिगरेटिव उदहारण हैं. असली कथन पहले पैरा में है, बाकी दो में मैंने अपनी बात स्पष्ट की है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@pooja</p>
<p>भटकाव नहीं कुछ फिगरेटिव उदहारण हैं. असली कथन पहले पैरा में है, बाकी दो में मैंने अपनी बात स्पष्ट की है.</p>
]]></content:encoded>
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	<item>
		<title>By: puja upadhyay</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1919/comment-page-1#comment-5629</link>
		<dc:creator>puja upadhyay</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Feb 2009 11:54:07 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1919#comment-5629</guid>
		<description>@विवेक, आपने मेरी टिप्पणी को ठीक से पढ़ा नहीं और बिल्कुल निराधार बात कही जो विषय से  भटकाने वाली है... इसलिए आपको इसमे ऐसे इशारे नज़र आने लगे जो हैं ही नहीं. शास्त्री जी का मत है की कुछ बुराइयाँ हमारे समाज में विदेशों से आ रही है, मैंने दो उदहारण देकर कहा की ये बुराइयाँ यहाँ पहले से हैं. आप इसी बारे में द्विवेदी जी का कमेन्ट पढिये...सार्थक बहस में मुद्दों पर बात होती है पर ये देखना जरूरी है की हम भटकें नहीं...ये कहने से की ये कुरीतियाँ हमारे यहाँ पहले से हैं उनका होना वांछनीय नहीं हो जाता.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@विवेक, आपने मेरी टिप्पणी को ठीक से पढ़ा नहीं और बिल्कुल निराधार बात कही जो विषय से  भटकाने वाली है&#8230; इसलिए आपको इसमे ऐसे इशारे नज़र आने लगे जो हैं ही नहीं. शास्त्री जी का मत है की कुछ बुराइयाँ हमारे समाज में विदेशों से आ रही है, मैंने दो उदहारण देकर कहा की ये बुराइयाँ यहाँ पहले से हैं. आप इसी बारे में द्विवेदी जी का कमेन्ट पढिये&#8230;सार्थक बहस में मुद्दों पर बात होती है पर ये देखना जरूरी है की हम भटकें नहीं&#8230;ये कहने से की ये कुरीतियाँ हमारे यहाँ पहले से हैं उनका होना वांछनीय नहीं हो जाता.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: vivek</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1919/comment-page-1#comment-5628</link>
		<dc:creator>vivek</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Feb 2009 10:31:39 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1919#comment-5628</guid>
		<description>@ पूजा, 

भारत में यह होता रहा है तो ज़रूरत इस बात की है की यह सब रोका जाए, न की इसकी आड़ लेकर ज़हर की बाढ़ को जस्टिफाई करने की. पर आपका तो कहना है की, क्योंकि यह सब किसी और रूप में कुछ हद तक समाज में मौजूद था तो नए पैकेज में इसे अपना लेने में कोई बुराई नहीं है. पहले भी नुकसान स्त्री का था, अब वह सब रोकने की जगह खुले तौर पर अपनाने से भी नुक्सान में कौन रहेगा? 

अगर उद्यान में कुछ पेड़ पौधों पर कीडे लगने लगे हैं तो ज़रूरत है की ज़्यादा देखभाल की जाए और उद्यान फ़िर हरा भरा किया जाए, पर चूँकि पहले ही कुछ पौधों पर कीडे थे तो सारा बगीचा कीडों को खिला दो, और बगीचा उजाड़ दो. 

इंसानी शरीर में हमेशा कुछ न कुछ समस्या रहती है, ज़रूरत है इलाज और सही खुराक की. पर अगर हम कहें की यह तो पहले ही सर्दी जुकाम से पीड़ित था, तो हमने इसे टीबी, निमोनिया, सिफलिस, मेनिन्जाईटिस के कीटाणु इसके शरीर में डाल दिए तो कुछ बुरा नहीं किया. &quot;बीमार के इलाज से अच्छा है की वह मर जाए!&quot; आपकी पिछली टिप्पणी तो कुछ यही इशारा करती है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@ पूजा, </p>
<p>भारत में यह होता रहा है तो ज़रूरत इस बात की है की यह सब रोका जाए, न की इसकी आड़ लेकर ज़हर की बाढ़ को जस्टिफाई करने की. पर आपका तो कहना है की, क्योंकि यह सब किसी और रूप में कुछ हद तक समाज में मौजूद था तो नए पैकेज में इसे अपना लेने में कोई बुराई नहीं है. पहले भी नुकसान स्त्री का था, अब वह सब रोकने की जगह खुले तौर पर अपनाने से भी नुक्सान में कौन रहेगा? </p>
<p>अगर उद्यान में कुछ पेड़ पौधों पर कीडे लगने लगे हैं तो ज़रूरत है की ज़्यादा देखभाल की जाए और उद्यान फ़िर हरा भरा किया जाए, पर चूँकि पहले ही कुछ पौधों पर कीडे थे तो सारा बगीचा कीडों को खिला दो, और बगीचा उजाड़ दो. </p>
<p>इंसानी शरीर में हमेशा कुछ न कुछ समस्या रहती है, ज़रूरत है इलाज और सही खुराक की. पर अगर हम कहें की यह तो पहले ही सर्दी जुकाम से पीड़ित था, तो हमने इसे टीबी, निमोनिया, सिफलिस, मेनिन्जाईटिस के कीटाणु इसके शरीर में डाल दिए तो कुछ बुरा नहीं किया. &#8220;बीमार के इलाज से अच्छा है की वह मर जाए!&#8221; आपकी पिछली टिप्पणी तो कुछ यही इशारा करती है.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Shastri JC Philip</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1919/comment-page-1#comment-5627</link>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Feb 2009 10:25:26 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1919#comment-5627</guid>
		<description>@puja upadhyay

पूजा जी, शत प्रतिशत सहमति की जरूरत नहीं है. बस आप ने इतना मान लिया:

&quot;पश्चिम से आई चीज़ों के अन्धानुकरण की वजह से कई कुरीतियाँ जोर पकड़ रही हैं&quot;

यह पर्याप्त है. मैं मुख्यतया इन कुरीतियों की ही बात कर रहा हूँ</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@puja upadhyay</p>
<p>पूजा जी, शत प्रतिशत सहमति की जरूरत नहीं है. बस आप ने इतना मान लिया:</p>
<p>&#8220;पश्चिम से आई चीज़ों के अन्धानुकरण की वजह से कई कुरीतियाँ जोर पकड़ रही हैं&#8221;</p>
<p>यह पर्याप्त है. मैं मुख्यतया इन कुरीतियों की ही बात कर रहा हूँ</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: puja upadhyay</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1919/comment-page-1#comment-5626</link>
		<dc:creator>puja upadhyay</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Feb 2009 10:06:13 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1919#comment-5626</guid>
		<description>आपकी कुछ बातों से सहमत हूँ पर कुछ से बिल्कुल नहीं...एक मुद्दे पर बात करती हूँ. आपने चित्र लगाया है और कहा है &quot;माँ होने की उमर नहीं हुई, लेकिन दो बच्चों के मातृत्व का भार कंधों पर आ चुका है. यह है मुक्त-चिंतन (तथाकथित) एवं मुक्त यौनाचार आदि का सामाजिक प्रभाव!&quot;. ऐसा हमारे यहाँ गाँव में कितने दिनों से प्रथा चली आ रही है, बाल विवाह गैर कानूनी होने के बावजूद क्या रुक सका है. छोटी लड़कियों की अधेड़ उम्र के पुरुषों के साथ शादी कर दी जाती है, उसमें उसकी मर्जी भी पूछी जाती है? ऐसा जब हमारे देश में जाने कितने सालों से होता आ रहा है तो आप इसे विदेश का प्रभाव कैसे कह सकते हैं.

और जो पिता के व्यभिचार का उदहारण आपने दिया है...क्या आप जानते हैं ऐसे कई परिवारों में ऐसी बात बाहर न आने पाये इसलिए लड़की को मार देते हैं...पिता, चाचा, दादा, रिश्तेदार...और ऐसे किस्से न किसी अखबार में छपते हैं न मीडिया तक पहुँचते हैं...ऐसा हमारे यहाँ भी होता है और उन जगहों पर होता है जहाँ दूर दूर तक बिजली तक नहीं पहुँची है.

पश्चिम से आई चीज़ों के अन्धानुकरण की वजह से कई कुरीतियाँ जोर पकड़ रही हैं पर हम अपनी सारी समस्याओं के लिए उन्हें दोष नहीं दे सकते.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपकी कुछ बातों से सहमत हूँ पर कुछ से बिल्कुल नहीं&#8230;एक मुद्दे पर बात करती हूँ. आपने चित्र लगाया है और कहा है &#8220;माँ होने की उमर नहीं हुई, लेकिन दो बच्चों के मातृत्व का भार कंधों पर आ चुका है. यह है मुक्त-चिंतन (तथाकथित) एवं मुक्त यौनाचार आदि का सामाजिक प्रभाव!&#8221;. ऐसा हमारे यहाँ गाँव में कितने दिनों से प्रथा चली आ रही है, बाल विवाह गैर कानूनी होने के बावजूद क्या रुक सका है. छोटी लड़कियों की अधेड़ उम्र के पुरुषों के साथ शादी कर दी जाती है, उसमें उसकी मर्जी भी पूछी जाती है? ऐसा जब हमारे देश में जाने कितने सालों से होता आ रहा है तो आप इसे विदेश का प्रभाव कैसे कह सकते हैं.</p>
<p>और जो पिता के व्यभिचार का उदहारण आपने दिया है&#8230;क्या आप जानते हैं ऐसे कई परिवारों में ऐसी बात बाहर न आने पाये इसलिए लड़की को मार देते हैं&#8230;पिता, चाचा, दादा, रिश्तेदार&#8230;और ऐसे किस्से न किसी अखबार में छपते हैं न मीडिया तक पहुँचते हैं&#8230;ऐसा हमारे यहाँ भी होता है और उन जगहों पर होता है जहाँ दूर दूर तक बिजली तक नहीं पहुँची है.</p>
<p>पश्चिम से आई चीज़ों के अन्धानुकरण की वजह से कई कुरीतियाँ जोर पकड़ रही हैं पर हम अपनी सारी समस्याओं के लिए उन्हें दोष नहीं दे सकते.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Shastri JC Philip</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1919/comment-page-1#comment-5625</link>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Feb 2009 09:11:54 +0000</pubDate>
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		<description>@प्रिय सुरेश,

जिन चिट्ठाकार मित्रों ने मुझे सोचने के लिये प्रेरित किया उन सब का मैं दिल से आभारी हूँ.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@प्रिय सुरेश,</p>
<p>जिन चिट्ठाकार मित्रों ने मुझे सोचने के लिये प्रेरित किया उन सब का मैं दिल से आभारी हूँ.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: सुरेश चिपलूनकर</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1919/comment-page-1#comment-5624</link>
		<dc:creator>सुरेश चिपलूनकर</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Feb 2009 08:23:00 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1919#comment-5624</guid>
		<description>आपकी लेख सीरीज बेहद शानदार चल रही है, मैं कोशिश करके भी इतना अच्छा नहीं व्यक्त कर सकता था… सारे मुद्दे आपने समेटे हैं… और &quot;नसीहत&quot; भी दे डाली,,,, बेहतरीन…</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपकी लेख सीरीज बेहद शानदार चल रही है, मैं कोशिश करके भी इतना अच्छा नहीं व्यक्त कर सकता था… सारे मुद्दे आपने समेटे हैं… और &#8220;नसीहत&#8221; भी दे डाली,,,, बेहतरीन…</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: ताऊ रामपुरिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1919/comment-page-1#comment-5623</link>
		<dc:creator>ताऊ रामपुरिया</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Feb 2009 08:17:00 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1919#comment-5623</guid>
		<description>मुझे तो यह संक्रमण काल दिखाई दे रहा है. समस्या और भी बढने वाली है. जो सामाजिक ्परिवेश के लिये घातक होगा. हम किसी और पर जिम्मेदारी डाल भी देंगे तो उससे हासिल क्या होगा? अन्तत: उसको भुगतना तो हमे ही है. 

रामराम.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मुझे तो यह संक्रमण काल दिखाई दे रहा है. समस्या और भी बढने वाली है. जो सामाजिक ्परिवेश के लिये घातक होगा. हम किसी और पर जिम्मेदारी डाल भी देंगे तो उससे हासिल क्या होगा? अन्तत: उसको भुगतना तो हमे ही है. </p>
<p>रामराम.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Shastri JC Philip</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1919/comment-page-1#comment-5622</link>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Feb 2009 08:05:45 +0000</pubDate>
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		<description>@Gyandutt Pandey

आप बन गये तो सब बन जायेंगे!!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@Gyandutt Pandey</p>
<p>आप बन गये तो सब बन जायेंगे!!</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Gyandutt Pandey</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1919/comment-page-1#comment-5621</link>
		<dc:creator>Gyandutt Pandey</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Feb 2009 07:52:29 +0000</pubDate>
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		<description>हम तो शुतुर्मुर्ग बनना चाहते हैं!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हम तो शुतुर्मुर्ग बनना चाहते हैं!</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Shastri JC Philip</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1919/comment-page-1#comment-5620</link>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Feb 2009 07:18:27 +0000</pubDate>
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		<description>@hindi blogge

मैं यह तो कहना ही भूल गया था कि क्रास-टाक का अपना अलग मजा है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@hindi blogge</p>
<p>मैं यह तो कहना ही भूल गया था कि क्रास-टाक का अपना अलग मजा है.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Shastri JC Philip</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1919/comment-page-1#comment-5619</link>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Feb 2009 07:15:42 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1919#comment-5619</guid>
		<description>@hindi blogge

यह आलेख एक से अधिक स्थानों पर छपा है. आपका अभार कि आप ने याद दिलाया कि मुझे यह बात नहीं मालूम है!!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@hindi blogge</p>
<p>यह आलेख एक से अधिक स्थानों पर छपा है. आपका अभार कि आप ने याद दिलाया कि मुझे यह बात नहीं मालूम है!!</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: hindi blogge</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1919/comment-page-1#comment-5618</link>
		<dc:creator>hindi blogge</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Feb 2009 07:05:29 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1919#comment-5618</guid>
		<description>@डॉ अरविन्द
@डॉ शास्त्री
आप दोनों दो अलग अलग ब्लॉग के विषय मे बात करते दिख रहे हैं . राजकिशोर का आलेख कहां हैं ये डॉ अरविन्द ,डॉ शास्त्री को बताना भूल गए और डॉ शास्त्री अपने मे इतना डूबे हैं की राजकिशोर कहा और किस ब्लॉग पर लिखते हैं उनको पता नहीं .
कम से कम तीर तो सही छोडे क्रॉस talk से संस्कृति कया सुधर जाए गी</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@डॉ अरविन्द<br />
@डॉ शास्त्री<br />
आप दोनों दो अलग अलग ब्लॉग के विषय मे बात करते दिख रहे हैं . राजकिशोर का आलेख कहां हैं ये डॉ अरविन्द ,डॉ शास्त्री को बताना भूल गए और डॉ शास्त्री अपने मे इतना डूबे हैं की राजकिशोर कहा और किस ब्लॉग पर लिखते हैं उनको पता नहीं .<br />
कम से कम तीर तो सही छोडे क्रॉस talk से संस्कृति कया सुधर जाए गी</p>
]]></content:encoded>
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