<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
		>
<channel>
	<title>Comments on: यह किस देश-प्रदेश की हिन्दी है??</title>
	<atom:link href="http://sarathi.info/archives/193/feed" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://sarathi.info/archives/193</link>
	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2009 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
	<lastBuildDate>Fri, 12 Mar 2010 15:13:57 +0000</lastBuildDate>
	<generator>http://wordpress.org/?v=2.9.1</generator>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
		<item>
		<title>By: जयप्रकाश मानस</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/193/comment-page-1#comment-201</link>
		<dc:creator>जयप्रकाश मानस</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 01 Jun 2007 01:15:51 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/?p=193#comment-201</guid>
		<description>यह समय ललित के खंडन का समय है । बाजार, संस्कार, मीड़िया और द्रुतगति से किसी लक्ष्य को लपक लेने की मानसिकता से मनुष्य के मन-आत्मा से लास्य गायब होते जा रहा है । सो भाषा का लालित्य भी क्षीण होते जा रहा है । पहले समाज, घर, परिवार और कामकाज के स्थलों में एक भाषिक आचरण संहिता की उपस्थिति या चौकीदारी हुआ करती थी । अतः भाषा और भाषा का लालित्य सभ्यता की निशानी जैसा था । अब कई भाषा के परस्परानुभव और विदेशी भाषाओं के तथाकथित रूतबे ने कम से कम भारतीय मनीषा को भी अपने लपेट में ले लिया है । यह समकालीन युवाओं को देखकर तो कहा ही जा सकता है । पर इसे निरंतर प्रयासों से बचाया जा सकता है । बात अभी बिगड़ी नहीं है ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>यह समय ललित के खंडन का समय है । बाजार, संस्कार, मीड़िया और द्रुतगति से किसी लक्ष्य को लपक लेने की मानसिकता से मनुष्य के मन-आत्मा से लास्य गायब होते जा रहा है । सो भाषा का लालित्य भी क्षीण होते जा रहा है । पहले समाज, घर, परिवार और कामकाज के स्थलों में एक भाषिक आचरण संहिता की उपस्थिति या चौकीदारी हुआ करती थी । अतः भाषा और भाषा का लालित्य सभ्यता की निशानी जैसा था । अब कई भाषा के परस्परानुभव और विदेशी भाषाओं के तथाकथित रूतबे ने कम से कम भारतीय मनीषा को भी अपने लपेट में ले लिया है । यह समकालीन युवाओं को देखकर तो कहा ही जा सकता है । पर इसे निरंतर प्रयासों से बचाया जा सकता है । बात अभी बिगड़ी नहीं है ।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: kakesh</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/193/comment-page-1#comment-161</link>
		<dc:creator>kakesh</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 May 2007 12:05:03 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/?p=193#comment-161</guid>
		<description>हमें हिन्दी में ऎसे ही सहज,सरल और ललित शब्दों की आवश्यकता है जो आम बोलचाल में प्रयुक्त हो सकें...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हमें हिन्दी में ऎसे ही सहज,सरल और ललित शब्दों की आवश्यकता है जो आम बोलचाल में प्रयुक्त हो सकें&#8230;</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Laxmi N. Gupta</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/193/comment-page-1#comment-160</link>
		<dc:creator>Laxmi N. Gupta</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 May 2007 11:46:39 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/?p=193#comment-160</guid>
		<description>मैं आपकी बात का समर्थन करता हूँ। कृत्रिम भाषा से हिन्दी का हित नहीं होता है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मैं आपकी बात का समर्थन करता हूँ। कृत्रिम भाषा से हिन्दी का हित नहीं होता है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: संजय बेंगाणी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/193/comment-page-1#comment-159</link>
		<dc:creator>संजय बेंगाणी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 May 2007 09:45:07 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/?p=193#comment-159</guid>
		<description>यह वाक्य ऑपेरा की हिन्दी साईट से लिये गये थे.
खुशी की बात है की हिन्दी की साईटे बढ़ रही है. इसी साईट की समीक्षा हिन्दी में यहाँ पढ़ सकते है.
http://www.tarakash.com/content/view/278/252/</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>यह वाक्य ऑपेरा की हिन्दी साईट से लिये गये थे.<br />
खुशी की बात है की हिन्दी की साईटे बढ़ रही है. इसी साईट की समीक्षा हिन्दी में यहाँ पढ़ सकते है.<br />
<a href="http://www.tarakash.com/content/view/278/252/" rel="nofollow">http://www.tarakash.com/content/view/278/252/</a></p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अतुल शर्मा</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/193/comment-page-1#comment-158</link>
		<dc:creator>अतुल शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 May 2007 08:36:48 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/?p=193#comment-158</guid>
		<description>कई बार अंग्रेजी का सीधा सीधा शब्दानुवाद करने से भी ऐसी भाषा बन जाती है। इसलिए बेहतर यही होगा कि प्रचलित अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग किया जाए।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कई बार अंग्रेजी का सीधा सीधा शब्दानुवाद करने से भी ऐसी भाषा बन जाती है। इसलिए बेहतर यही होगा कि प्रचलित अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग किया जाए।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अरुण</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/193/comment-page-1#comment-157</link>
		<dc:creator>अरुण</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 May 2007 07:51:45 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/?p=193#comment-157</guid>
		<description>दर असल कुछ लोग हिन्दी का मतलब अग्रेजी के अनुवाद को ही समझते है या फ़िर कुछ लोग जो अपने को प्रगतिशील हिन्दी के अग्रदूत समझते है जो लुंठित जैसे शब्द प्रयोग करते है या पम्प की जगह वायू ठूसक यंत्र,ट्रेन को लोह पथ गामिनी कहने वाले वास्तव मे ये हिन्दी के रास्ते के रोडे है</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>दर असल कुछ लोग हिन्दी का मतलब अग्रेजी के अनुवाद को ही समझते है या फ़िर कुछ लोग जो अपने को प्रगतिशील हिन्दी के अग्रदूत समझते है जो लुंठित जैसे शब्द प्रयोग करते है या पम्प की जगह वायू ठूसक यंत्र,ट्रेन को लोह पथ गामिनी कहने वाले वास्तव मे ये हिन्दी के रास्ते के रोडे है</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: रवि</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/193/comment-page-1#comment-156</link>
		<dc:creator>रवि</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 May 2007 06:41:48 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/?p=193#comment-156</guid>
		<description>&lt;b&gt;&lt;i&gt;&quot;...मुझे कम से कम पांच भाषाओं की अच्छी जानकारी है, एवं कम से कम पांच और से अकसर पाला पडता है. लेकिन इन में किसी भी भाषा में इस प्रकार की कृत्रिम भाषा से सर नहीं मारना पडता है.  क्या कारण है कि सिर्फ हिन्दी लिखते/बोलते समय लोग इन्सानी भाषा बोलने के बदले इस तरह की क्लिष्ट भाषा बोलते हैं. इस ब्रह्मांड का कौन सा गृह है जहां आम आदमी इस तरह की हिन्दी बोलता है???...&quot;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;

आह!  आपने तो तीर सीधे दिल में उतार दिया! सचमुच ऐसी भाषा बोलते नहीं मिलेगा.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p><b><i>&#8220;&#8230;मुझे कम से कम पांच भाषाओं की अच्छी जानकारी है, एवं कम से कम पांच और से अकसर पाला पडता है. लेकिन इन में किसी भी भाषा में इस प्रकार की कृत्रिम भाषा से सर नहीं मारना पडता है.  क्या कारण है कि सिर्फ हिन्दी लिखते/बोलते समय लोग इन्सानी भाषा बोलने के बदले इस तरह की क्लिष्ट भाषा बोलते हैं. इस ब्रह्मांड का कौन सा गृह है जहां आम आदमी इस तरह की हिन्दी बोलता है???&#8230;&#8221;</i></b></p>
<p>आह!  आपने तो तीर सीधे दिल में उतार दिया! सचमुच ऐसी भाषा बोलते नहीं मिलेगा.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: विपुल जैन</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/193/comment-page-1#comment-155</link>
		<dc:creator>विपुल जैन</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 May 2007 06:31:29 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/?p=193#comment-155</guid>
		<description>दरअसल, हम अनुवाद करते समय अंग्रेज़ी का मूल अनुवाद करने लगते हैं। हमे संदेश के भाव समझ कर उस का अनुवाद करना चाहिये। वेसे &quot;हिंगलिश&quot; अब हमारी मातृ भाषा बन चुकी है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>दरअसल, हम अनुवाद करते समय अंग्रेज़ी का मूल अनुवाद करने लगते हैं। हमे संदेश के भाव समझ कर उस का अनुवाद करना चाहिये। वेसे &#8220;हिंगलिश&#8221; अब हमारी मातृ भाषा बन चुकी है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: धुरविरोधी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/193/comment-page-1#comment-154</link>
		<dc:creator>धुरविरोधी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 May 2007 06:26:17 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/?p=193#comment-154</guid>
		<description>बहुत खूब शास्त्री जी; एकदम सही कह रहे हैं आप.
भाषा तो बस अभिव्यक्ति का माध्यम है, सामने वाले के पास हमारी बात एकदम उसी तरह से पहुंच जाय जो हम चाहते हैं, बस यहीं पर भाषा का काम खत्म हुआ.
इसे एकदम सरल और सहज होना चाहिये, बिल्कुल बहते पानी की तरह.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत खूब शास्त्री जी; एकदम सही कह रहे हैं आप.<br />
भाषा तो बस अभिव्यक्ति का माध्यम है, सामने वाले के पास हमारी बात एकदम उसी तरह से पहुंच जाय जो हम चाहते हैं, बस यहीं पर भाषा का काम खत्म हुआ.<br />
इसे एकदम सरल और सहज होना चाहिये, बिल्कुल बहते पानी की तरह.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
</channel>
</rss>
