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	<title>Comments on: अंग्रेजी में हिन्दी, एक जुगुप्साजनक अनुभव!!</title>
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	<link>http://sarathi.info/archives/1953</link>
	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>By: बालसुब्रमण्यम</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1953/comment-page-1#comment-7055</link>
		<dc:creator>बालसुब्रमण्यम</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 04 Jun 2009 06:47:14 +0000</pubDate>
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		<description>देवनागरी लिपि में दूसरी भाषाओं का साहित्य यदि उपलब्ध कराया जा सके, तो देवनागरी सारे देश को जोड़नेवाली सामान्य लिपि बन सकती है। अभी नेपाली, मराठी, सिंधी, कोंकणी, संस्कृत, हिंदी आदि अनेक भाषाएं इस लिपि में लिखी जा रही हैं। गुजराती, बंगाली, पंजाबी आदि की लिपियां भी उससे बहुत मेल खाती हैं। दक्षिण भारत की लिपियां भी उससे ध्वनि के स्तर पर मिलती-जुलती हैं, हालांकि उनमें एक-दो ऐसी ध्वनियां हैं जो देवनागरी में नहीं हैं, जैसे मलायालम और तमिल का ष़ और मराठी का ळ।

कई ब्लोगर द्विभाषी हैं - वे हिंदी के अलावा कोई अन्य भारतीय भाषा भी जानते हैं। यदि वे अपने ब्लोगों में हिंदी के अलावा किसी अन्य भारतीय भाषा के साहित्य को देवनारी में लिप्यंतरित करके देने लगें, तो इससे बहुत बड़ा उपकार होगा।

खास करके ऊर्दू लिपि में लिखे गए उत्कृष्ट साहित्य को देवनागरी में लाने की बहुत आवश्यकता है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>देवनागरी लिपि में दूसरी भाषाओं का साहित्य यदि उपलब्ध कराया जा सके, तो देवनागरी सारे देश को जोड़नेवाली सामान्य लिपि बन सकती है। अभी नेपाली, मराठी, सिंधी, कोंकणी, संस्कृत, हिंदी आदि अनेक भाषाएं इस लिपि में लिखी जा रही हैं। गुजराती, बंगाली, पंजाबी आदि की लिपियां भी उससे बहुत मेल खाती हैं। दक्षिण भारत की लिपियां भी उससे ध्वनि के स्तर पर मिलती-जुलती हैं, हालांकि उनमें एक-दो ऐसी ध्वनियां हैं जो देवनागरी में नहीं हैं, जैसे मलायालम और तमिल का ष़ और मराठी का ळ।</p>
<p>कई ब्लोगर द्विभाषी हैं &#8211; वे हिंदी के अलावा कोई अन्य भारतीय भाषा भी जानते हैं। यदि वे अपने ब्लोगों में हिंदी के अलावा किसी अन्य भारतीय भाषा के साहित्य को देवनारी में लिप्यंतरित करके देने लगें, तो इससे बहुत बड़ा उपकार होगा।</p>
<p>खास करके ऊर्दू लिपि में लिखे गए उत्कृष्ट साहित्य को देवनागरी में लाने की बहुत आवश्यकता है।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: HEY PRABHU YEH TERA PATH</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1953/comment-page-1#comment-5762</link>
		<dc:creator>HEY PRABHU YEH TERA PATH</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Feb 2009 21:43:59 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1953#comment-5762</guid>
		<description>@जिस संकटग्रस्त भाषा से आप परिचित हैं उसे देवनागरी लिपि प्रदान करके, उसके शब्दभंडार, व्याकरण, एवं कथाकहानियों को सुरक्षित कर दिया जाये. इसके साथ ही अन्य लोगों को उस आंदोलन से जाल के जरिये जोड दें तो वह भाषा अकाल मृत्यु से बच सकती है.

जी हॉ ! आप बिल्कुल सही कह रहे है। काश ऐसा हो हम सभी को सकुन कि अनुभुती होगी। 

आप का चिन्तन सही दिशा कि और - भारत और भारतीय भाषाओ कि सुरक्षा के लिये है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@जिस संकटग्रस्त भाषा से आप परिचित हैं उसे देवनागरी लिपि प्रदान करके, उसके शब्दभंडार, व्याकरण, एवं कथाकहानियों को सुरक्षित कर दिया जाये. इसके साथ ही अन्य लोगों को उस आंदोलन से जाल के जरिये जोड दें तो वह भाषा अकाल मृत्यु से बच सकती है.</p>
<p>जी हॉ ! आप बिल्कुल सही कह रहे है। काश ऐसा हो हम सभी को सकुन कि अनुभुती होगी। </p>
<p>आप का चिन्तन सही दिशा कि और &#8211; भारत और भारतीय भाषाओ कि सुरक्षा के लिये है।</p>
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		<title>By: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1953/comment-page-1#comment-5760</link>
		<dc:creator>सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Feb 2009 14:41:54 +0000</pubDate>
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		<description>आइए हम सभी अपनी सामर्थ्य भर हिन्दी को अंग्रेजी का मजबूत विकल्प बनाने के अनुष्ठान का व्रत-संकल्प लें।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आइए हम सभी अपनी सामर्थ्य भर हिन्दी को अंग्रेजी का मजबूत विकल्प बनाने के अनुष्ठान का व्रत-संकल्प लें।</p>
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		<title>By: पं.डी.के.शर्मा 'वत्स'</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1953/comment-page-1#comment-5759</link>
		<dc:creator>पं.डी.के.शर्मा 'वत्स'</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Feb 2009 14:29:49 +0000</pubDate>
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		<description>किसी भी देश और समाज की उन्नति स्वयं की भाषा के माध्यम से ही सरलतापूर्वक् हो सकती है &#124; इसलिए हमें भी अंग्रेजी का मोह त्याग करके हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को संवर्धित करने की ओर कदम बढ़ाना चाहिए</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>किसी भी देश और समाज की उन्नति स्वयं की भाषा के माध्यम से ही सरलतापूर्वक् हो सकती है | इसलिए हमें भी अंग्रेजी का मोह त्याग करके हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को संवर्धित करने की ओर कदम बढ़ाना चाहिए</p>
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	<item>
		<title>By: राज भाटिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1953/comment-page-1#comment-5758</link>
		<dc:creator>राज भाटिया</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Feb 2009 12:58:53 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1953#comment-5758</guid>
		<description>मेने आज तक सिर्फ़ एक ही देश देखा है, जहां विदेशी ओर वो विदेशी जिन्होने हमे जुते मारे, हमे कुत्ता तक कहा, हम उन की भाषा बोलना अपनी इज्जत समझते है, ओर स्कुलो मे बहुत शान से उस भाषा को सिखाया जाता है, हिन्दी बोलने पर जुर्माना या गले मे पट्टी लटका दी जाती है कि मै मुर्ख हू.
 विश्व के कितने देशो मे यह अग्रेजी बोली जाती है?? मै मात्र ८०० कि मी दुर रहता हुं, इग्लेण्ड से लेकिन यहां एक भी गली का नाम अग्रेजी मै नही लिखा, अगर आप स्कुल मे अग्रेजी नही पढ य बोल पाते तो कोई जुर्माना नही, कोई गले मे पट्टी नही बांधेगा कि मै मुर्ख हूं, क्यो कि यह लोग हमारी तरह से गुलाम नही रहे इस लिये, बाते हम आजादी की करते है, लेकिन हमे आजादी के माय्ने ही नही मालुम.
 धन्यवाद शास्त्री जी आप ने बहुत ही सुंदर मुद्दा उठाया है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मेने आज तक सिर्फ़ एक ही देश देखा है, जहां विदेशी ओर वो विदेशी जिन्होने हमे जुते मारे, हमे कुत्ता तक कहा, हम उन की भाषा बोलना अपनी इज्जत समझते है, ओर स्कुलो मे बहुत शान से उस भाषा को सिखाया जाता है, हिन्दी बोलने पर जुर्माना या गले मे पट्टी लटका दी जाती है कि मै मुर्ख हू.<br />
 विश्व के कितने देशो मे यह अग्रेजी बोली जाती है?? मै मात्र ८०० कि मी दुर रहता हुं, इग्लेण्ड से लेकिन यहां एक भी गली का नाम अग्रेजी मै नही लिखा, अगर आप स्कुल मे अग्रेजी नही पढ य बोल पाते तो कोई जुर्माना नही, कोई गले मे पट्टी नही बांधेगा कि मै मुर्ख हूं, क्यो कि यह लोग हमारी तरह से गुलाम नही रहे इस लिये, बाते हम आजादी की करते है, लेकिन हमे आजादी के माय्ने ही नही मालुम.<br />
 धन्यवाद शास्त्री जी आप ने बहुत ही सुंदर मुद्दा उठाया है.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: संजय बेंगाणी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1953/comment-page-1#comment-5757</link>
		<dc:creator>संजय बेंगाणी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Feb 2009 11:46:48 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1953#comment-5757</guid>
		<description>सुब्रमनियमजी, देवनागरी देवताओं ने प्रदान नहीं की है मगर आज सर्वाधिक प्रयुक्त तो हो ही रही है. ब्राह्मी के बारे में आज ऐसा नहीं है. मगर सर्व-सहमती बड़ी चीज है. हम तो सीखने को तैयार हैं.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सुब्रमनियमजी, देवनागरी देवताओं ने प्रदान नहीं की है मगर आज सर्वाधिक प्रयुक्त तो हो ही रही है. ब्राह्मी के बारे में आज ऐसा नहीं है. मगर सर्व-सहमती बड़ी चीज है. हम तो सीखने को तैयार हैं.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Isht Deo Sankrityaayan</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1953/comment-page-1#comment-5756</link>
		<dc:creator>Isht Deo Sankrityaayan</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Feb 2009 11:44:12 +0000</pubDate>
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		<description>बात बिलकुल सही है और यहाँ एक बडा संकट है. अंग्रेजी तो नहीं, पर अंग्रेजियत के आतंक का विरोध किया जाना चाहिए. लेकिन इससे भी ज़्यादा ज़रूरी है उसके समानांतर विकल्प खड़ा करना. इसमें कोई दो राय नहीं कि हिन्दी भरपूर मज्बूत है, पर उससे जुड़े व्यावसायिक संकट का क्या किया जाए? सरकार पर पुरज़ोर दबाव जब तक नहीं बनाया जाएगा, तब तक यह सब संभव नहीं होगा.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बात बिलकुल सही है और यहाँ एक बडा संकट है. अंग्रेजी तो नहीं, पर अंग्रेजियत के आतंक का विरोध किया जाना चाहिए. लेकिन इससे भी ज़्यादा ज़रूरी है उसके समानांतर विकल्प खड़ा करना. इसमें कोई दो राय नहीं कि हिन्दी भरपूर मज्बूत है, पर उससे जुड़े व्यावसायिक संकट का क्या किया जाए? सरकार पर पुरज़ोर दबाव जब तक नहीं बनाया जाएगा, तब तक यह सब संभव नहीं होगा.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: PN Subramanian</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1953/comment-page-1#comment-5754</link>
		<dc:creator>PN Subramanian</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Feb 2009 08:03:09 +0000</pubDate>
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		<description>भारतीय भाषाओँ को यदि जोड़ना है तो एक समान लिपि जो सबको ग्राह्य हो अपनाना चाहिए. इसके लिए सर्वोत्तम तो ब्राह्मी ही होगी. अक्षर कम हैं. सीखने में आसानी होगी. उच्चारण  क्षेत्रीय आधार पर करने की छूट भी रहेगी. देवनागरी कोई बहुत पूरानी भी नहीं है जैसा आप सोच रहे हैं., और न ही देवताओं ने प्रदान की है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भारतीय भाषाओँ को यदि जोड़ना है तो एक समान लिपि जो सबको ग्राह्य हो अपनाना चाहिए. इसके लिए सर्वोत्तम तो ब्राह्मी ही होगी. अक्षर कम हैं. सीखने में आसानी होगी. उच्चारण  क्षेत्रीय आधार पर करने की छूट भी रहेगी. देवनागरी कोई बहुत पूरानी भी नहीं है जैसा आप सोच रहे हैं., और न ही देवताओं ने प्रदान की है.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: सुरेश चिपलूनकर</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1953/comment-page-1#comment-5752</link>
		<dc:creator>सुरेश चिपलूनकर</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Feb 2009 06:42:41 +0000</pubDate>
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		<description>बैरागी जी से सहमत हूँ, हिन्दी भाषा को विकृत करने में हिन्दी के सबसे बड़े अखबार ही सबसे आगे हैं… &quot;फ़ैशन&quot;(?) के नाम पर साधारण से हिन्दी शब्दों को भी &quot;हिंग्रेजी&quot; में बदल रहे हैं ये…</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बैरागी जी से सहमत हूँ, हिन्दी भाषा को विकृत करने में हिन्दी के सबसे बड़े अखबार ही सबसे आगे हैं… &#8220;फ़ैशन&#8221;(?) के नाम पर साधारण से हिन्दी शब्दों को भी &#8220;हिंग्रेजी&#8221; में बदल रहे हैं ये…</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: संजय बेंगाणी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1953/comment-page-1#comment-5751</link>
		<dc:creator>संजय बेंगाणी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Feb 2009 05:52:14 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1953#comment-5751</guid>
		<description>असम की कुछ क्षेत्रिय बोलियाओं ने देवनागरी को अपनाया है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>असम की कुछ क्षेत्रिय बोलियाओं ने देवनागरी को अपनाया है.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: संजय बेंगाणी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1953/comment-page-1#comment-5750</link>
		<dc:creator>संजय बेंगाणी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Feb 2009 05:51:11 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1953#comment-5750</guid>
		<description>एक कारण चर्च का प्रभाव भी रहा है. मैं असम कई वर्षॉं तक रहा हूँ, मेघालय वगेरे में रोमन लिपि ही चलती है. भारत से दूराव का एक कारण यह भी है. भाषाएं जोड़ती है और यहाँ लिपि तोड़ रही है. 

चर्च के जिक्र को अन्यथा न लें, देश से बड़ा कोई नहीं और वहाँ जो देखा वह दुखी करने वाला था.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>एक कारण चर्च का प्रभाव भी रहा है. मैं असम कई वर्षॉं तक रहा हूँ, मेघालय वगेरे में रोमन लिपि ही चलती है. भारत से दूराव का एक कारण यह भी है. भाषाएं जोड़ती है और यहाँ लिपि तोड़ रही है. </p>
<p>चर्च के जिक्र को अन्यथा न लें, देश से बड़ा कोई नहीं और वहाँ जो देखा वह दुखी करने वाला था.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: ताऊ रामपुरिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1953/comment-page-1#comment-5749</link>
		<dc:creator>ताऊ रामपुरिया</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Feb 2009 05:23:29 +0000</pubDate>
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		<description>काफ़ी गंभीर बात है. और आपकी राय से मैं सहमत हूं.

रामराम.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>काफ़ी गंभीर बात है. और आपकी राय से मैं सहमत हूं.</p>
<p>रामराम.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Dr.Arvind Mishra</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1953/comment-page-1#comment-5748</link>
		<dc:creator>Dr.Arvind Mishra</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Feb 2009 03:51:13 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1953#comment-5748</guid>
		<description>सचमुच यह तो गंभीर मसला है !</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सचमुच यह तो गंभीर मसला है !</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: विष्‍णु बैरागी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1953/comment-page-1#comment-5746</link>
		<dc:creator>विष्‍णु बैरागी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Feb 2009 02:23:52 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1953#comment-5746</guid>
		<description>यही वह बिन्‍दु है जहां से हमें अपनी-अपनी भूमिका निर्धारित करनी है। शुरुआत कोई भी हो, खुद से ही करनी पडती है। &#039;बोलचाल की भाषा&#039; के नाम पर आज हिन्‍दी शब्‍दों को विस्‍थापित किया जा रहा है। इस दुष्‍कृत्‍य में हिन्‍दी के अखबार सबसे आगे हैं। उनकी आखों पर लालच का पर्दा पर पड गया है और वे &#039;जिस मां का दूध पी रहे हैं&#039; उसी मां को निर्वस्‍त्र का रहे हैं।
क्षरण तेजी से आता है और यदि उसे फैशन का स्‍वरूप मिल जाए तो यह तेजी सहस्रगुना हो जाती है जबकि सुधार की गति बहुत ही धीमी होती है। स्‍पष्‍ट है कि सुधार के लिए अधिक श्रम, अधिक निरन्‍तरता और अधिक धैर्य की आवश्‍यकता होती है।
इसे मेरी आत्‍म प्रशंसा न समझें, मैं अपने आसपास के लोगों से इस बिन्‍दु पर खूब झगडता रहता हूं। मजे की बात यह कि वे सब मुझसे सहमत होते हैं किन्‍तु मेरी बात को मानने में उन्‍हें पुनर्जन्‍म लेना पडता है। किन्‍तु अन्‍तत: वे मान ही लेते हैं।
अलोकप्रिय होने का खतरा उठा कर यह काम करने में मुझे अब आनन्‍द आने लगा हे। लोग भी मेरी नीयत पर भरोसा करने लगे हैं, इसलिए चिढते अवश्‍य हैं किन्‍तु बुरा नहीं मानते।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>यही वह बिन्‍दु है जहां से हमें अपनी-अपनी भूमिका निर्धारित करनी है। शुरुआत कोई भी हो, खुद से ही करनी पडती है। &#8216;बोलचाल की भाषा&#8217; के नाम पर आज हिन्‍दी शब्‍दों को विस्‍थापित किया जा रहा है। इस दुष्‍कृत्‍य में हिन्‍दी के अखबार सबसे आगे हैं। उनकी आखों पर लालच का पर्दा पर पड गया है और वे &#8216;जिस मां का दूध पी रहे हैं&#8217; उसी मां को निर्वस्‍त्र का रहे हैं।<br />
क्षरण तेजी से आता है और यदि उसे फैशन का स्‍वरूप मिल जाए तो यह तेजी सहस्रगुना हो जाती है जबकि सुधार की गति बहुत ही धीमी होती है। स्‍पष्‍ट है कि सुधार के लिए अधिक श्रम, अधिक निरन्‍तरता और अधिक धैर्य की आवश्‍यकता होती है।<br />
इसे मेरी आत्‍म प्रशंसा न समझें, मैं अपने आसपास के लोगों से इस बिन्‍दु पर खूब झगडता रहता हूं। मजे की बात यह कि वे सब मुझसे सहमत होते हैं किन्‍तु मेरी बात को मानने में उन्‍हें पुनर्जन्‍म लेना पडता है। किन्‍तु अन्‍तत: वे मान ही लेते हैं।<br />
अलोकप्रिय होने का खतरा उठा कर यह काम करने में मुझे अब आनन्‍द आने लगा हे। लोग भी मेरी नीयत पर भरोसा करने लगे हैं, इसलिए चिढते अवश्‍य हैं किन्‍तु बुरा नहीं मानते।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: dhiru singh</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1953/comment-page-1#comment-5745</link>
		<dc:creator>dhiru singh</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Feb 2009 02:09:34 +0000</pubDate>
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		<description>अंग्रेजी अगर मुझे आती बोलना 
तो लोगो की बोलती बंद हो जाती 
कोई मुझसे यह नही पूछता 
तुम ने कहाँ तक  की पढाई</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अंग्रेजी अगर मुझे आती बोलना<br />
तो लोगो की बोलती बंद हो जाती<br />
कोई मुझसे यह नही पूछता<br />
तुम ने कहाँ तक  की पढाई</p>
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