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	<title>Comments on: हमे कुत्ता तक कहा!</title>
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	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>By: Devendra</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1961/comment-page-1#comment-5842</link>
		<dc:creator>Devendra</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 01 Mar 2009 16:24:17 +0000</pubDate>
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		<description>Hi Dr. Are you agree what is happening since past many years on Valentine Day in India. People are abusing couples (girlfriend &amp; boyfriend)? Is this justified? When muma can keep fast for dad well being on Karwa Chauth, i don&#039;t think there is any reason unmarried couples can&#039;t celebrate a day in a year. And Valention Day is for all who are not wed, in a live in relation relationship and married couple as well. 
I am 100% against loosing decency and becoming street dogs be it any occasion, the way we celebrate holy do you like that?

Hope you will justify with your article by adding few more lines.

Rgds
Devendra</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Hi Dr. Are you agree what is happening since past many years on Valentine Day in India. People are abusing couples (girlfriend &amp; boyfriend)? Is this justified? When muma can keep fast for dad well being on Karwa Chauth, i don&#8217;t think there is any reason unmarried couples can&#8217;t celebrate a day in a year. And Valention Day is for all who are not wed, in a live in relation relationship and married couple as well.<br />
I am 100% against loosing decency and becoming street dogs be it any occasion, the way we celebrate holy do you like that?</p>
<p>Hope you will justify with your article by adding few more lines.</p>
<p>Rgds<br />
Devendra</p>
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	<item>
		<title>By: Aam Aadamee</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1961/comment-page-1#comment-5837</link>
		<dc:creator>Aam Aadamee</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Feb 2009 21:16:49 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1961#comment-5837</guid>
		<description>Shaahtri jee ek sujhaao hai. Hosh sambhalane se ab tak maine kahin na kahin kisi na kisi ko hindi astitva ke liye ladaaee ladte dekha hai. aur isi kram mein aaj aap se bhi mulakaat huee, Maafi chaahunga jo kami us waqt thi wo aaj bhee barkaraar hai....mera seedha matlab andolan ke tareeke se hai....Jo aap sabhi apne boudhik gyan ko alag rakh ek vyabhaarik aam aadmee ki bhasha aur soch ke saath charcha aur chintan karna chahte hon to mere pass kuch sujhaao hain jo shaayed kargar sabit hon hindi ko nyay dilaane mein....Main jyada padha likha aur prabuddh nahin hun isliye pehle izazat chahta hun...

Is kamment ko anytha na len...ummeed ke saath

Manikarm</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Shaahtri jee ek sujhaao hai. Hosh sambhalane se ab tak maine kahin na kahin kisi na kisi ko hindi astitva ke liye ladaaee ladte dekha hai. aur isi kram mein aaj aap se bhi mulakaat huee, Maafi chaahunga jo kami us waqt thi wo aaj bhee barkaraar hai&#8230;.mera seedha matlab andolan ke tareeke se hai&#8230;.Jo aap sabhi apne boudhik gyan ko alag rakh ek vyabhaarik aam aadmee ki bhasha aur soch ke saath charcha aur chintan karna chahte hon to mere pass kuch sujhaao hain jo shaayed kargar sabit hon hindi ko nyay dilaane mein&#8230;.Main jyada padha likha aur prabuddh nahin hun isliye pehle izazat chahta hun&#8230;</p>
<p>Is kamment ko anytha na len&#8230;ummeed ke saath</p>
<p>Manikarm</p>
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	<item>
		<title>By: राज भाटिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1961/comment-page-1#comment-5810</link>
		<dc:creator>राज भाटिया</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Feb 2009 17:39:34 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1961#comment-5810</guid>
		<description>शास्त्री जी ने सही कहा की विरोध अग्रेजी का नही, मे जब युरॊप मे इअतने सालो से रह रहा हू तो जाहिर है मे इन लोगो से हिन्दी मै तो बात नही करता ? मेरे बच्चे भी बहुत सी भाषाये जानते है, लेकिन मेने उन्हे हिन्दी भी सिखाई है, ओर वो भारतीयो संग सिर्फ़ हिन्दी मै ही बात करते है, क्यो कि मेने उन मै यह गोरव, यह मान भरा है कि हमारी हिन्दी दुनिया मै हमारी है, ओर जब उन से कोई(भारतिया) अग्रेजी, जर्मन, या अन्य भाषा मै बात करता है तो बच्चे उन्हे साफ़ कह देते है की मै ओर आप भरतीया है कृप्या हिन्दी मे बात करे, 
विरोध है अपने देश मै अपनी हिन्दी मां को दासी बनाने का, ओर उस भाषा को जिस ने हमारे ऊपर गुलामी की मोहर लगाई उसे हम सर आंखो पर अपनी हिन्दी मां की जगह बिठाये, इस बात का विरोध है, जर्मन, फ़रांस ने बहुत तरक्की की लेकिन अपनी ही भाषा मै, जब कि यह दोनो ही देश शायद हरियाणा, या पंजाब से भी छोटे है, यहां भी लोगो की स्थानिया भाषा, लहजा बोलने का अलग अलग है, लेकिन राष्ट्रीया भाषा एक है 
धन्यवाद</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शास्त्री जी ने सही कहा की विरोध अग्रेजी का नही, मे जब युरॊप मे इअतने सालो से रह रहा हू तो जाहिर है मे इन लोगो से हिन्दी मै तो बात नही करता ? मेरे बच्चे भी बहुत सी भाषाये जानते है, लेकिन मेने उन्हे हिन्दी भी सिखाई है, ओर वो भारतीयो संग सिर्फ़ हिन्दी मै ही बात करते है, क्यो कि मेने उन मै यह गोरव, यह मान भरा है कि हमारी हिन्दी दुनिया मै हमारी है, ओर जब उन से कोई(भारतिया) अग्रेजी, जर्मन, या अन्य भाषा मै बात करता है तो बच्चे उन्हे साफ़ कह देते है की मै ओर आप भरतीया है कृप्या हिन्दी मे बात करे,<br />
विरोध है अपने देश मै अपनी हिन्दी मां को दासी बनाने का, ओर उस भाषा को जिस ने हमारे ऊपर गुलामी की मोहर लगाई उसे हम सर आंखो पर अपनी हिन्दी मां की जगह बिठाये, इस बात का विरोध है, जर्मन, फ़रांस ने बहुत तरक्की की लेकिन अपनी ही भाषा मै, जब कि यह दोनो ही देश शायद हरियाणा, या पंजाब से भी छोटे है, यहां भी लोगो की स्थानिया भाषा, लहजा बोलने का अलग अलग है, लेकिन राष्ट्रीया भाषा एक है<br />
धन्यवाद</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: पुनीत ओमर</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1961/comment-page-1#comment-5808</link>
		<dc:creator>पुनीत ओमर</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Feb 2009 12:05:59 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1961#comment-5808</guid>
		<description>अंग्रेजी और जिस अंग्रेजियत के खिलाफ मोर्चा खोलने की बात कही जा रही है, उससे पहले अगर अंग्रेजी को ताकतवर बनाने के कारणों का अध्ययन करें तो ज्यादा अधिक सार्थक होगा. अंग्रेजी अंग्रेजों के देश से निकल कर बाहर भी ताकतवर हो रही है, उसका कारण है एक रूपता. जिस देश में राष्ट्रपति और भिखारी एक दूसरे की भाषा समझते हो, कानूनों की किताब और नर्सरी की किताब की भाषा एक हो, डाक्टर वकील और जनता के सेवक किसी अन्य भाषा का इस्तेमाल अपने व्यवसाय को बचाने या प्रतिष्ठा बढाने के लिए ना करते हों, जहाँ का प्राचीन संस्कृति और साहित्य उनकी रोज मर्रा की ही भाषा में लिखा हो ना की किसी पाली प्राकृत सामान भाषा में, ऐसा देश भला क्या नहीं कर सकता. हमारे देश में तो मराठी मानुष अपने ही भाइयों का कत्ले आम कर रहे हैं. तो फिर कौन से समानांतर विकल्प की बात की जाय?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अंग्रेजी और जिस अंग्रेजियत के खिलाफ मोर्चा खोलने की बात कही जा रही है, उससे पहले अगर अंग्रेजी को ताकतवर बनाने के कारणों का अध्ययन करें तो ज्यादा अधिक सार्थक होगा. अंग्रेजी अंग्रेजों के देश से निकल कर बाहर भी ताकतवर हो रही है, उसका कारण है एक रूपता. जिस देश में राष्ट्रपति और भिखारी एक दूसरे की भाषा समझते हो, कानूनों की किताब और नर्सरी की किताब की भाषा एक हो, डाक्टर वकील और जनता के सेवक किसी अन्य भाषा का इस्तेमाल अपने व्यवसाय को बचाने या प्रतिष्ठा बढाने के लिए ना करते हों, जहाँ का प्राचीन संस्कृति और साहित्य उनकी रोज मर्रा की ही भाषा में लिखा हो ना की किसी पाली प्राकृत सामान भाषा में, ऐसा देश भला क्या नहीं कर सकता. हमारे देश में तो मराठी मानुष अपने ही भाइयों का कत्ले आम कर रहे हैं. तो फिर कौन से समानांतर विकल्प की बात की जाय?</p>
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	<item>
		<title>By: sciblogindia</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1961/comment-page-1#comment-5807</link>
		<dc:creator>sciblogindia</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Feb 2009 10:03:51 +0000</pubDate>
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		<description>हर देशभक्त को चाहिए कि वह इससे सीख ले और ऐसी स्थितियों को बदलने के लिए व्यक्तिगत रूप से प्रयत्नशील हो।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हर देशभक्त को चाहिए कि वह इससे सीख ले और ऐसी स्थितियों को बदलने के लिए व्यक्तिगत रूप से प्रयत्नशील हो।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: विनय</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1961/comment-page-1#comment-5806</link>
		<dc:creator>विनय</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Feb 2009 10:00:29 +0000</pubDate>
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		<description>द्विवेदी जी की टिप्पणी में जो तथ्य है उससे सभी को सहमत होना चहिए!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>द्विवेदी जी की टिप्पणी में जो तथ्य है उससे सभी को सहमत होना चहिए!</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Gyandutt Pandey</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1961/comment-page-1#comment-5803</link>
		<dc:creator>Gyandutt Pandey</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Feb 2009 07:14:49 +0000</pubDate>
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		<description>पोस्ट लिखना कोई आप से सीखे!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पोस्ट लिखना कोई आप से सीखे!</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: vivek</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1961/comment-page-1#comment-5802</link>
		<dc:creator>vivek</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Feb 2009 07:12:20 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1961#comment-5802</guid>
		<description>भाषाएँ दुनिया के वातायन हमारे लिए खोलती हैं, उनका ज्ञान हमें समृद्ध ही करता है. पर फिर भाषा के नाम पर मात्र और मात्र अंग्रेजी ही क्यों? भारत के उत्तरी राज्यों में गलत-सलत &#039;सेंट कान्वेंटी छाप&#039; अंग्रेजी ज़रूर पढाई जाती है पर छात्रों के लिए किसी दक्षिण भारतीय भाषा के अध्ययन का विकल्प मैंने कभी नहीं देखा, जबकि देश की समरसता के लिए वह ज्यादा ज़रूरी है.  दक्षिण में अपनी भाषा के साथ संस्कृत या हिंदी पढने की सुविधा है. यह सामान्य सी बात हमें बाँट रही है, और दक्षिण भारतीय खुद को अलग थलग महसूस कर रहे हैं. उनका भी कहना सही है, हम ही सिर्फ तुम्हारी भाषा क्यों अपनाएं, तुममे से भी तो कुछ लोग हमारी भाषा में रूचि लें... (डिस्क्लेमर: मैं खुद हिंदी भाषी और मध्य प्रदेश से हूँ)

एक चीनी छात्र ने मुझे बताया था की उनके देश में विज्ञान, मेडिकल, इंजीनियरिंग, गणित जैसे विषय भी केवल चीनी भाषाओँ (मुख्यतः मंदारिन) में ही पढाये जाते हैं, और संस्थानों में लगभग हर प्रमुख अंतरराष्ट्रीय भाषा सीखने की सुविधा है. (न की मात्र अंग्रेजी और सिर्फ अंग्रेजी, जिसके आगे भारतियों को अपनी भाषा या दुनिया की कोई भाषा दिखाई नहीं देती).

चीनी सारी दुनिया के प्रभु बनाना चाहते हैं, हम वफादार खानदानी नौकर हैं, जो सिर्फ गोरे अंग्रेजों की चाकरी करना जानते हैं. वर्ना क्या कारण है की पिछले तीस सालों से आईटी आईटी चिल्लाने के बाद भी हम सिर्फ बौद्धिक सॉफ्टवेयर मजदूर बने हुए हैं, और चीन, ताइवान व कोरिया ने कुछ की सालों में दुनिया को अपने हार्डवेयर से पाट डाला. 

हमें खुद को हीन मानने की आदत पड़ चुकी है, शायद गुलामी जीन में आ गयी है. मुझे लगता है की भारतीय होने का अर्थ नस्लीय हीनता की ग्रंथि से पीड़ित होना है. लगता है गोरेपन को महत्व देने और फेयर एंड लवली की सफलता के पीछे भी यही हीन ग्रंथि (गुलामी के जींस) हैं.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भाषाएँ दुनिया के वातायन हमारे लिए खोलती हैं, उनका ज्ञान हमें समृद्ध ही करता है. पर फिर भाषा के नाम पर मात्र और मात्र अंग्रेजी ही क्यों? भारत के उत्तरी राज्यों में गलत-सलत &#8216;सेंट कान्वेंटी छाप&#8217; अंग्रेजी ज़रूर पढाई जाती है पर छात्रों के लिए किसी दक्षिण भारतीय भाषा के अध्ययन का विकल्प मैंने कभी नहीं देखा, जबकि देश की समरसता के लिए वह ज्यादा ज़रूरी है.  दक्षिण में अपनी भाषा के साथ संस्कृत या हिंदी पढने की सुविधा है. यह सामान्य सी बात हमें बाँट रही है, और दक्षिण भारतीय खुद को अलग थलग महसूस कर रहे हैं. उनका भी कहना सही है, हम ही सिर्फ तुम्हारी भाषा क्यों अपनाएं, तुममे से भी तो कुछ लोग हमारी भाषा में रूचि लें&#8230; (डिस्क्लेमर: मैं खुद हिंदी भाषी और मध्य प्रदेश से हूँ)</p>
<p>एक चीनी छात्र ने मुझे बताया था की उनके देश में विज्ञान, मेडिकल, इंजीनियरिंग, गणित जैसे विषय भी केवल चीनी भाषाओँ (मुख्यतः मंदारिन) में ही पढाये जाते हैं, और संस्थानों में लगभग हर प्रमुख अंतरराष्ट्रीय भाषा सीखने की सुविधा है. (न की मात्र अंग्रेजी और सिर्फ अंग्रेजी, जिसके आगे भारतियों को अपनी भाषा या दुनिया की कोई भाषा दिखाई नहीं देती).</p>
<p>चीनी सारी दुनिया के प्रभु बनाना चाहते हैं, हम वफादार खानदानी नौकर हैं, जो सिर्फ गोरे अंग्रेजों की चाकरी करना जानते हैं. वर्ना क्या कारण है की पिछले तीस सालों से आईटी आईटी चिल्लाने के बाद भी हम सिर्फ बौद्धिक सॉफ्टवेयर मजदूर बने हुए हैं, और चीन, ताइवान व कोरिया ने कुछ की सालों में दुनिया को अपने हार्डवेयर से पाट डाला. </p>
<p>हमें खुद को हीन मानने की आदत पड़ चुकी है, शायद गुलामी जीन में आ गयी है. मुझे लगता है की भारतीय होने का अर्थ नस्लीय हीनता की ग्रंथि से पीड़ित होना है. लगता है गोरेपन को महत्व देने और फेयर एंड लवली की सफलता के पीछे भी यही हीन ग्रंथि (गुलामी के जींस) हैं.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: परमजीत बली</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1961/comment-page-1#comment-5801</link>
		<dc:creator>परमजीत बली</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Feb 2009 06:39:14 +0000</pubDate>
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		<description>बढिया जानकारी आभार।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बढिया जानकारी आभार।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: हिमांशु</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1961/comment-page-1#comment-5800</link>
		<dc:creator>हिमांशु</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Feb 2009 05:28:24 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1961#comment-5800</guid>
		<description>अंग्रेजी के मुकाबले हिन्दी को न्यूनतर करने वाले निश्चय ही अपनी अस्मिता से खिलवाड़ कर रहे हैं. वस्तुतः आतंक तो रुकना ही चाहिये चाहे वह किसी भाषा का ही क्यों न हो. 
यह अच्छा लगा कि आप छः भाषाओं पर अधिकार रखते हैं. आपकी इस कुशलता का पता आपके हिन्दी और अंग्रेजी की संप्रेषण-दक्षता को देखकर सहज ही लग जाता है. 
इस आलेख के लिये धन्यवाद.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अंग्रेजी के मुकाबले हिन्दी को न्यूनतर करने वाले निश्चय ही अपनी अस्मिता से खिलवाड़ कर रहे हैं. वस्तुतः आतंक तो रुकना ही चाहिये चाहे वह किसी भाषा का ही क्यों न हो.<br />
यह अच्छा लगा कि आप छः भाषाओं पर अधिकार रखते हैं. आपकी इस कुशलता का पता आपके हिन्दी और अंग्रेजी की संप्रेषण-दक्षता को देखकर सहज ही लग जाता है.<br />
इस आलेख के लिये धन्यवाद.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: cmpershad</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1961/comment-page-1#comment-5799</link>
		<dc:creator>cmpershad</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Feb 2009 05:24:51 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1961#comment-5799</guid>
		<description>जब तक हम अपनी राष्ट्रभाषा और राष्ट्रध्वज का सम्मान करना नहीं सीखते, तब तक हमें  कोई दूसरा आदर क्यों देगा और हम इस गुलामी की मानसिकता से कैसे उबर पाएंगे?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जब तक हम अपनी राष्ट्रभाषा और राष्ट्रध्वज का सम्मान करना नहीं सीखते, तब तक हमें  कोई दूसरा आदर क्यों देगा और हम इस गुलामी की मानसिकता से कैसे उबर पाएंगे?</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: ताऊ रामपुरिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1961/comment-page-1#comment-5795</link>
		<dc:creator>ताऊ रामपुरिया</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Feb 2009 04:43:02 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1961#comment-5795</guid>
		<description>मर्ज को जाते जाते समय लगता है. हमारे यहां क्षेत्रिय भाषाओं की वजह से भी शायद हिंदी को फ़लने फ़ूलने मे समय लगा है. यहां देश मे ही कितने ही लोग क्षेत्रियता के नाम पर भी हिंदी के दुश्मन रहे हैं.

जिस रोज हमने पक्का कर लिया कि अब हिंदी ही हमारी सब कुछ है उस रोज कौन रोक पायेगा?

आज तो हर गरीब से गरीब आदमी अपने बच्चे को महंगी फ़ीस चुका कर अण्ग्रेजी पढवाना चाहता है जिससे कि वो दौड मे पिछड नही जाये.

हम्को ही अपने गिरेबान मे झांकना पडेगा.

रामराम.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मर्ज को जाते जाते समय लगता है. हमारे यहां क्षेत्रिय भाषाओं की वजह से भी शायद हिंदी को फ़लने फ़ूलने मे समय लगा है. यहां देश मे ही कितने ही लोग क्षेत्रियता के नाम पर भी हिंदी के दुश्मन रहे हैं.</p>
<p>जिस रोज हमने पक्का कर लिया कि अब हिंदी ही हमारी सब कुछ है उस रोज कौन रोक पायेगा?</p>
<p>आज तो हर गरीब से गरीब आदमी अपने बच्चे को महंगी फ़ीस चुका कर अण्ग्रेजी पढवाना चाहता है जिससे कि वो दौड मे पिछड नही जाये.</p>
<p>हम्को ही अपने गिरेबान मे झांकना पडेगा.</p>
<p>रामराम.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: pradeep manoria</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1961/comment-page-1#comment-5794</link>
		<dc:creator>pradeep manoria</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Feb 2009 04:24:41 +0000</pubDate>
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		<description>सुन्दर रोचक सार्थक जानकारी Please visit  at manoria.blogspot.com</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सुन्दर रोचक सार्थक जानकारी Please visit  at manoria.blogspot.com</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: पा.ना. सुब्रमणियन</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1961/comment-page-1#comment-5793</link>
		<dc:creator>पा.ना. सुब्रमणियन</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Feb 2009 03:12:16 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1961#comment-5793</guid>
		<description>हमें खीज हो रही है ऐसा लगता है कि किसी चक्रव्यूह में फंस गए हैं. हमारी संस्कृति पर कुठाराघात हो रहा है. हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं. बच्चों के मानस को कलुषित होने से कैसे बचाए रखें. यह एक खीज है जो राम सेना या बजरंगियों कि हरकतों में भी कहीं है लेकिन वे हमें तालिबानी ज्यादा लगते हैं. इष्ट देव जी ने अछि बात कही. &quot;समानांतर विकल्प खड़ा करना&quot; लेकिन यह नहीं बताया कि विकल्प क्या हो सकता है. और यदि कुछ है तो क्या वह सर्वग्राह्य बन सकता है. कपडे फाड़ना जारी रखें, कहीं प्रबोधन की प्राप्ति हो जाए.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हमें खीज हो रही है ऐसा लगता है कि किसी चक्रव्यूह में फंस गए हैं. हमारी संस्कृति पर कुठाराघात हो रहा है. हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं. बच्चों के मानस को कलुषित होने से कैसे बचाए रखें. यह एक खीज है जो राम सेना या बजरंगियों कि हरकतों में भी कहीं है लेकिन वे हमें तालिबानी ज्यादा लगते हैं. इष्ट देव जी ने अछि बात कही. &#8220;समानांतर विकल्प खड़ा करना&#8221; लेकिन यह नहीं बताया कि विकल्प क्या हो सकता है. और यदि कुछ है तो क्या वह सर्वग्राह्य बन सकता है. कपडे फाड़ना जारी रखें, कहीं प्रबोधन की प्राप्ति हो जाए.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Isht Deo Sankrityaayan</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1961/comment-page-1#comment-5791</link>
		<dc:creator>Isht Deo Sankrityaayan</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Feb 2009 03:03:32 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1961#comment-5791</guid>
		<description>आदरणीय शास्त्री जी
सुप्रभातम!
पिछले दो दिनों से आपके चिट्ठे में कुछ दिक़्क़त आ रही है. इसका हाशिया और शीर्षक तो पढ़ने में आ रहा है, लेकिन पाठ्य सामग्री की जगह सिर्फ़ डॉट-डॉट आ रहा है. कृपया इस पर ध्यान दें और यथाशीघ्र प्रभावी समाधान निकालें, अन्यथा मैं आपके ख़िलाफ़ अपने चिट्ठे पर आन्दोलन शुरू कर दूंगा.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आदरणीय शास्त्री जी<br />
सुप्रभातम!<br />
पिछले दो दिनों से आपके चिट्ठे में कुछ दिक़्क़त आ रही है. इसका हाशिया और शीर्षक तो पढ़ने में आ रहा है, लेकिन पाठ्य सामग्री की जगह सिर्फ़ डॉट-डॉट आ रहा है. कृपया इस पर ध्यान दें और यथाशीघ्र प्रभावी समाधान निकालें, अन्यथा मैं आपके ख़िलाफ़ अपने चिट्ठे पर आन्दोलन शुरू कर दूंगा.</p>
]]></content:encoded>
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