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	<title>Comments on: फुरसतिया, शास्त्रार्थ, भडकीले शीर्षक!</title>
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	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>By: आई मौज फ़कीर को&#8230;</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1973/comment-page-1#comment-5970</link>
		<dc:creator>आई मौज फ़कीर को&#8230;</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 06 Mar 2009 03:25:54 +0000</pubDate>
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		<description>[...] की तरह मैं जो कहता हूं वह सुन और अगर शास्त्रार्थ करना है तो जा शास्त्री के ठीहे पर और [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] की तरह मैं जो कहता हूं वह सुन और अगर शास्त्रार्थ करना है तो जा शास्त्री के ठीहे पर और [...]</p>
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		<title>By: सतीश चन्द्र सत्यार्थी</title>
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		<dc:creator>सतीश चन्द्र सत्यार्थी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 03 Mar 2009 19:25:54 +0000</pubDate>
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		<description>डर तो यह है की कहीं सारे लोग यही तरीका न आजमाने लग जाएं.
आप भी कभी कभी ऐसी धाँसू सलाह दे देते हैं की बस..................
वैसे यहाँ आना एक पंथ दो काज साबित हुआ. 
दो धुरंधरों को एक साथ पढ़ डाला. 
शुक्ल जी जब टिप्पणी इतनी लम्बी लिखते तो पोस्ट का साइज़ .....................जायज़ है. :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>डर तो यह है की कहीं सारे लोग यही तरीका न आजमाने लग जाएं.<br />
आप भी कभी कभी ऐसी धाँसू सलाह दे देते हैं की बस&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
वैसे यहाँ आना एक पंथ दो काज साबित हुआ.<br />
दो धुरंधरों को एक साथ पढ़ डाला.<br />
शुक्ल जी जब टिप्पणी इतनी लम्बी लिखते तो पोस्ट का साइज़ &#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;जायज़ है. <img src='http://sarathi.info/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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	<item>
		<title>By: ताऊ जी, भाटिया जी, ज्ञान जी, सुब्रमनियन जी और &#8230;. &#124; सारथी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1973/comment-page-1#comment-5871</link>
		<dc:creator>ताऊ जी, भाटिया जी, ज्ञान जी, सुब्रमनियन जी और &#8230;. &#124; सारथी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Mar 2009 23:30:29 +0000</pubDate>
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		<description>[...] फुरसतिया, शास्त्रार्थ, भडकीले शीर्षक!  [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] फुरसतिया, शास्त्रार्थ, भडकीले शीर्षक!  [...]</p>
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		<title>By: anita kumar</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1973/comment-page-1#comment-5870</link>
		<dc:creator>anita kumar</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Mar 2009 19:52:31 +0000</pubDate>
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		<description>शास्त्री जी नमस्कार बहुत दिन बाद आयी हूँ आप के ब्लोग पर काफ़ी हलचल है , ये तो अच्छा है कि विचारों का आदान प्रदान हो रहा है। हम भी इस बात से सहमत हैं कि अनूप जी असाधारण रुप से मेहनती, मेधावी और संस्कारी सज्जन हैं।  ये भी जग जाहिर है कि वो अपनी बात कहने से कभी नहीं डरे और कभी अपशब्द कह कर किसी का दिल नहीं दुखाते। कम से कम हमें तो ऐसा कुछ याद नहीं पढ़ता। जब आप दोनों ही इतने गुणी विद्वान हैं तो शास्त्रार्थ कैसा? किसी दिन आप की भी चिठ्ठाचर्चा देखने को मिले ऐसी इच्छा है, आशा है अनूप जी आप को चिठ्ठाचर्चा के लिए निमंत्रित कर चुके होगें और आप ने स्वीकार भी किया हो्गा।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शास्त्री जी नमस्कार बहुत दिन बाद आयी हूँ आप के ब्लोग पर काफ़ी हलचल है , ये तो अच्छा है कि विचारों का आदान प्रदान हो रहा है। हम भी इस बात से सहमत हैं कि अनूप जी असाधारण रुप से मेहनती, मेधावी और संस्कारी सज्जन हैं।  ये भी जग जाहिर है कि वो अपनी बात कहने से कभी नहीं डरे और कभी अपशब्द कह कर किसी का दिल नहीं दुखाते। कम से कम हमें तो ऐसा कुछ याद नहीं पढ़ता। जब आप दोनों ही इतने गुणी विद्वान हैं तो शास्त्रार्थ कैसा? किसी दिन आप की भी चिठ्ठाचर्चा देखने को मिले ऐसी इच्छा है, आशा है अनूप जी आप को चिठ्ठाचर्चा के लिए निमंत्रित कर चुके होगें और आप ने स्वीकार भी किया हो्गा।</p>
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	<item>
		<title>By: अजित वडनेरकर</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1973/comment-page-1#comment-5868</link>
		<dc:creator>अजित वडनेरकर</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Mar 2009 19:47:42 +0000</pubDate>
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		<description>शास्त्रार्थ तो हुआ नहीं पर ढोल, दमामें, शोर-गुल सब सुनाई पड़ रहा है....</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शास्त्रार्थ तो हुआ नहीं पर ढोल, दमामें, शोर-गुल सब सुनाई पड़ रहा है&#8230;.</p>
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	<item>
		<title>By: अनूप शुक्ल</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1973/comment-page-1#comment-5867</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ल</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Mar 2009 19:19:30 +0000</pubDate>
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		<description>शास्त्रीजी, आप महान हैं। गुणी हैं,ज्ञानी हैं! आपसे कैसा शास्त्रार्थ? किसकी हिम्मत जो आपसे शास्त्रार्थ करे? 

आपने हमारी इत्ती तारीफ़ कर दी हम उसी में शर्मा गये। लेकिन हमें पता है कि यह तारीफ़ कम हथियार ज्यादा है। हमारे एक मित्र के पिताजी कहा करते हैं &lt;a href=&quot;http://fursatiya.blogspot.com/2004/11/blog-post_24.html&quot; rel=&quot;nofollow&quot;&gt;&quot; तारीफ दुनिया का सबसे बङा ब्रम्हास्त्र है.&lt;/a&gt; इसकी मार से आज तक कोई बचा नहीं.इसका वार कभी बेकार नहीं जाता सिर्फ आपको इसके प्रयोग की सही विधि पता होना चाहिये.&quot; 

आपकी तारीफ़ के ब्रम्हास्त्र से हम वैसे ही घायल हो गये अब क्या खाकर शास्त्रार्थ करेंगे?

मित्रों ने भी मेरे बारे में बड़ी-बड़ी, अच्छी-अच्छी बातें कह दीं जिसे हम  अमेरिकन एकोनामी की मंदी की तरह फ़ूलते से  गये।

वैसे भी हमने शायद पिछले वर्ष तय किया था कि बड़े-बुजुर्गों  से मौज कम से कम लिया करेंगे इस नाते भी शास्त्रार्थ का विधि-विधान बनता दिखता नहीं क्योंकि शास्त्रार्थ में प्रतिद्वंदी के  ज्ञान को उसका अज्ञान बताकर खिल्ली उड़ाने की परम्परा है। सो हम तो करने से रहे। आखिर आप हमारे बड़े-बुजुर्ग हैं।

इसके अलावा शास्त्रार्थ उन बातों पर होता हैं जिनमें दो लोगों की मान्यताओं में मतभेद हो। यहां मतभेद का कोई बिन्दु है ही नहीं। पोस्ट का शीर्षक आकर्षक होने पर  पाठक पढ़ने के लिये आकर्षित होते हैं यह तो सच हईऐ! इसमें क्या मतभेद?


वैसे आप अपनी बात सही साबित करने के लिये किसी दूसरे के  कहे को अपने हिसाब से पेश बड़ी खूबसूरती से पेश करते रहते हैं। हमने कई बार स्पष्ट कहा/लिखा है कि शास्त्रीजी की पोस्टों के शीर्षक सनसनीखेज (कभी-कभी भड़काऊ भी) रहते हैं। सनसनीखेज और आकर्षक में बहुत अंतर होता है। जिसे आप आकर्षक कहते हैं उसे हम सनसनीखेज मानते हैं! अगर आप कहें तो आपके ब्लाग से छानबीन करके उसके विवरण पेश करें।

दूसरी बात आप भारतीय संस्कृति की बड़ी अच्छी वकालत करते हैं। इस मामले में  हिंदी चिट्ठाजगत आप जैसे सतर्क ब्लागर को पाकर धन्य है। 

लेकिन जित्ता मैंने महसूस किया उत्ते से लगता है कि आपके लेखन का मूल स्वर स्त्रीविरोधी है। एक नहीं अनेको उदाहरण आपके ब्लागवाटिका में पुष्प की तरह बिखरे हैं। अगर कभी कहें तो बिन-बटोरकर आपके सामने पेश करूं। 

आपको मेरी राय से इत्तफ़ाक न करने का पूरा अधिकार है। लेकिन आपने जो एक टिप्पणी की थी &quot;....स्त्री ब्लागों पर जाकर मूत्र शंका करने लगते है&quot; वह किसी भी परिप्रेक्ष्य में, किसी भी संदर्भ में उचित नहीं है। अगर इसे अन्यथा न लिया जाये तो वह मैं कहना चाहूंगा वह टिप्पणी बेहूदी था जिसका आपको अफ़सोस भी नहीं हुआ बाद में भी। आप उस पर  पुनर्विचार करें तो शायद आपका खेद व्यक्त करने का मन करे। 

गम्भीर बातें बहुत हो गयीं इसलिये आपको एक ठो कथा सुनाये देते हैं अभी आज ही एक कनपुरिये साथी से सुनायी। श्रम को भुलाने को सुने! 
&lt;b&gt;एक व्याह योग्य कन्या के बारे में दरयाफ़्त करते हुये उसकी संभावित ससुराल वालों से पूछा-लड़की गोरी है कि काली? तो जिससे पूछा गया था उसने जबाब दिया। अब यह तो देखने वाले पर निर्भर करता है कि उसको लड़की कैसी लगती है! 
दरयाफ़्त करने वाले ने फ़िर सवाल किया अरे  भाई तुम तो बताओ तुम्हारी निगाह में लड़की गोरी है या काली?
उसने जबाब दिया- अगर लड़की को काले लोगों में बैठा दिया जाये तो गोरी लगती  है और अगर गोरे लोगों में बैठा दिया जाय तो काली लगती है।&quot; &lt;/b&gt;
तो शास्त्रीजी आकर्षक और सनसनीखेज वाला मामला भी ऐसाइच है। संभव है कि जो मुझे सनसनीखेज लगता है वो आपको आकर्षक लगता हो। लेकिन हम अपनी बात कह रहे हैं। आप अपनी समझियेगा।

बाकी जैसा कहा कि आपको कष्ट पहुंचाना मेरा उद्देश्य  बिल्कुल नहीं है लेकिन कभी-कभी कुछ सच भी बोलने का मन करता है। जो मुझे सच लगा वह मैंने लिख दिया। अल्लेव अब यहां फ़िर एक ठो बात याद आ गयी। हमारी दीदी कहती हैं वह व्यक्ति बड़ा अभागा होता है जिसे कोई टोंकने वाला नहीं होता। तो हमने इसीलिये आपको सनसनीखेज ,स्त्रीविरोधी बातों के लिये टोकने का दुस्साहस किया! आखिर आप हमारे प्यारे, सम्माननीय बुजुर्ग हैं!

 इति श्री शास्त्रार्थ कथा समस्त अध्याय समाप्त:! :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शास्त्रीजी, आप महान हैं। गुणी हैं,ज्ञानी हैं! आपसे कैसा शास्त्रार्थ? किसकी हिम्मत जो आपसे शास्त्रार्थ करे? </p>
<p>आपने हमारी इत्ती तारीफ़ कर दी हम उसी में शर्मा गये। लेकिन हमें पता है कि यह तारीफ़ कम हथियार ज्यादा है। हमारे एक मित्र के पिताजी कहा करते हैं <a href="http://fursatiya.blogspot.com/2004/11/blog-post_24.html" rel="nofollow">&#8221; तारीफ दुनिया का सबसे बङा ब्रम्हास्त्र है.</a> इसकी मार से आज तक कोई बचा नहीं.इसका वार कभी बेकार नहीं जाता सिर्फ आपको इसके प्रयोग की सही विधि पता होना चाहिये.&#8221; </p>
<p>आपकी तारीफ़ के ब्रम्हास्त्र से हम वैसे ही घायल हो गये अब क्या खाकर शास्त्रार्थ करेंगे?</p>
<p>मित्रों ने भी मेरे बारे में बड़ी-बड़ी, अच्छी-अच्छी बातें कह दीं जिसे हम  अमेरिकन एकोनामी की मंदी की तरह फ़ूलते से  गये।</p>
<p>वैसे भी हमने शायद पिछले वर्ष तय किया था कि बड़े-बुजुर्गों  से मौज कम से कम लिया करेंगे इस नाते भी शास्त्रार्थ का विधि-विधान बनता दिखता नहीं क्योंकि शास्त्रार्थ में प्रतिद्वंदी के  ज्ञान को उसका अज्ञान बताकर खिल्ली उड़ाने की परम्परा है। सो हम तो करने से रहे। आखिर आप हमारे बड़े-बुजुर्ग हैं।</p>
<p>इसके अलावा शास्त्रार्थ उन बातों पर होता हैं जिनमें दो लोगों की मान्यताओं में मतभेद हो। यहां मतभेद का कोई बिन्दु है ही नहीं। पोस्ट का शीर्षक आकर्षक होने पर  पाठक पढ़ने के लिये आकर्षित होते हैं यह तो सच हईऐ! इसमें क्या मतभेद?</p>
<p>वैसे आप अपनी बात सही साबित करने के लिये किसी दूसरे के  कहे को अपने हिसाब से पेश बड़ी खूबसूरती से पेश करते रहते हैं। हमने कई बार स्पष्ट कहा/लिखा है कि शास्त्रीजी की पोस्टों के शीर्षक सनसनीखेज (कभी-कभी भड़काऊ भी) रहते हैं। सनसनीखेज और आकर्षक में बहुत अंतर होता है। जिसे आप आकर्षक कहते हैं उसे हम सनसनीखेज मानते हैं! अगर आप कहें तो आपके ब्लाग से छानबीन करके उसके विवरण पेश करें।</p>
<p>दूसरी बात आप भारतीय संस्कृति की बड़ी अच्छी वकालत करते हैं। इस मामले में  हिंदी चिट्ठाजगत आप जैसे सतर्क ब्लागर को पाकर धन्य है। </p>
<p>लेकिन जित्ता मैंने महसूस किया उत्ते से लगता है कि आपके लेखन का मूल स्वर स्त्रीविरोधी है। एक नहीं अनेको उदाहरण आपके ब्लागवाटिका में पुष्प की तरह बिखरे हैं। अगर कभी कहें तो बिन-बटोरकर आपके सामने पेश करूं। </p>
<p>आपको मेरी राय से इत्तफ़ाक न करने का पूरा अधिकार है। लेकिन आपने जो एक टिप्पणी की थी &#8220;&#8230;.स्त्री ब्लागों पर जाकर मूत्र शंका करने लगते है&#8221; वह किसी भी परिप्रेक्ष्य में, किसी भी संदर्भ में उचित नहीं है। अगर इसे अन्यथा न लिया जाये तो वह मैं कहना चाहूंगा वह टिप्पणी बेहूदी था जिसका आपको अफ़सोस भी नहीं हुआ बाद में भी। आप उस पर  पुनर्विचार करें तो शायद आपका खेद व्यक्त करने का मन करे। </p>
<p>गम्भीर बातें बहुत हो गयीं इसलिये आपको एक ठो कथा सुनाये देते हैं अभी आज ही एक कनपुरिये साथी से सुनायी। श्रम को भुलाने को सुने!<br />
<b>एक व्याह योग्य कन्या के बारे में दरयाफ़्त करते हुये उसकी संभावित ससुराल वालों से पूछा-लड़की गोरी है कि काली? तो जिससे पूछा गया था उसने जबाब दिया। अब यह तो देखने वाले पर निर्भर करता है कि उसको लड़की कैसी लगती है!<br />
दरयाफ़्त करने वाले ने फ़िर सवाल किया अरे  भाई तुम तो बताओ तुम्हारी निगाह में लड़की गोरी है या काली?<br />
उसने जबाब दिया- अगर लड़की को काले लोगों में बैठा दिया जाये तो गोरी लगती  है और अगर गोरे लोगों में बैठा दिया जाय तो काली लगती है।&#8221; </b><br />
तो शास्त्रीजी आकर्षक और सनसनीखेज वाला मामला भी ऐसाइच है। संभव है कि जो मुझे सनसनीखेज लगता है वो आपको आकर्षक लगता हो। लेकिन हम अपनी बात कह रहे हैं। आप अपनी समझियेगा।</p>
<p>बाकी जैसा कहा कि आपको कष्ट पहुंचाना मेरा उद्देश्य  बिल्कुल नहीं है लेकिन कभी-कभी कुछ सच भी बोलने का मन करता है। जो मुझे सच लगा वह मैंने लिख दिया। अल्लेव अब यहां फ़िर एक ठो बात याद आ गयी। हमारी दीदी कहती हैं वह व्यक्ति बड़ा अभागा होता है जिसे कोई टोंकने वाला नहीं होता। तो हमने इसीलिये आपको सनसनीखेज ,स्त्रीविरोधी बातों के लिये टोकने का दुस्साहस किया! आखिर आप हमारे प्यारे, सम्माननीय बुजुर्ग हैं!</p>
<p> इति श्री शास्त्रार्थ कथा समस्त अध्याय समाप्त:! <img src='http://sarathi.info/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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	<item>
		<title>By: राज भाटिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1973/comment-page-1#comment-5866</link>
		<dc:creator>राज भाटिया</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Mar 2009 17:44:37 +0000</pubDate>
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		<description>आप दोनो ही मेहनती और लगनशील है, अब हम क्या कहे ?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आप दोनो ही मेहनती और लगनशील है, अब हम क्या कहे ?</p>
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	<item>
		<title>By: रंजन</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1973/comment-page-1#comment-5865</link>
		<dc:creator>रंजन</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Mar 2009 15:37:29 +0000</pubDate>
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		<description>अनुप जी वाकई कमाल के है... 

आपका अनुसंधान बहुत सटीक है..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अनुप जी वाकई कमाल के है&#8230; </p>
<p>आपका अनुसंधान बहुत सटीक है..</p>
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	<item>
		<title>By: gagan sharma</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1973/comment-page-1#comment-5864</link>
		<dc:creator>gagan sharma</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Mar 2009 14:43:56 +0000</pubDate>
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		<description>सच है, मेहनत अपना रंग जरूर दिखाती है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सच है, मेहनत अपना रंग जरूर दिखाती है।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: satish saxena</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1973/comment-page-1#comment-5863</link>
		<dc:creator>satish saxena</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Mar 2009 14:33:10 +0000</pubDate>
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		<description>अनूप जी से शास्त्रार्थ?

बधाई हो,अगर सफल हो गए तो ....!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अनूप जी से शास्त्रार्थ?</p>
<p>बधाई हो,अगर सफल हो गए तो &#8230;.!</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: पं. डी.के.शर्मा "वत्स"</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1973/comment-page-1#comment-5861</link>
		<dc:creator>पं. डी.के.शर्मा "वत्स"</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Mar 2009 12:19:20 +0000</pubDate>
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		<description>दो विद्वानों के बीच शास्त्रार्थ भी कमाल ही होगा.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>दो विद्वानों के बीच शास्त्रार्थ भी कमाल ही होगा.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Shastri JC Philip</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1973/comment-page-1#comment-5860</link>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Mar 2009 12:16:31 +0000</pubDate>
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		<description>@Zakir Ali &#039;Rajneesh&#039;

खास कर जब वे जानेमाने चिट्ठाकार हों!!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@Zakir Ali &#8216;Rajneesh&#8217;</p>
<p>खास कर जब वे जानेमाने चिट्ठाकार हों!!</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Zakir Ali 'Rajneesh'</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1973/comment-page-1#comment-5859</link>
		<dc:creator>Zakir Ali 'Rajneesh'</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Mar 2009 10:29:19 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1973#comment-5859</guid>
		<description>अपनी पाठक संख्या बढाने के लिए दूसरों के बारे में टिप्पणी करते रहना भी एक अच्छा तरीका है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अपनी पाठक संख्या बढाने के लिए दूसरों के बारे में टिप्पणी करते रहना भी एक अच्छा तरीका है।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: उन्मुक्त</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1973/comment-page-1#comment-5858</link>
		<dc:creator>उन्मुक्त</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Mar 2009 10:02:13 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1973#comment-5858</guid>
		<description>समीर जी की टिप्पणी, मेरी टिप्पणी भी समझी जाय</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>समीर जी की टिप्पणी, मेरी टिप्पणी भी समझी जाय</p>
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	<item>
		<title>By: पुनीत ओमर</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/1973/comment-page-1#comment-5857</link>
		<dc:creator>पुनीत ओमर</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Mar 2009 09:37:44 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/1973#comment-5857</guid>
		<description>दो उत्कृष्ट चिट्ठाकारों के बीच शास्त्रार्थ निश्चित ही पठनीय होगा.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>दो उत्कृष्ट चिट्ठाकारों के बीच शास्त्रार्थ निश्चित ही पठनीय होगा.</p>
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