मेरे कल के आलेख के बारें में मेरे एक युवा मित्र ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न टिप्पणी द्वारा प्रेषित किया है जो इस प्रकार है:
(पुनीत ओमर): हिंदी भाषा के किसी भी रूप में प्रसार के लिए आप सभी को मेरी शुभकामनाये.
परन्तु गूगल नौल और विकीपीडिया को हिंदी से लीप देने के पहले हम क्या इस बारे में भी सोच हैं की ये लोग होते कौन हैं विशुद्ध भारतीय भाषा में लिखे गए भारतीय ज्ञान को सरे विश्व में वितरित करने का हक़ रखने वाले? मैं ऑनलाइन सामग्री पर लागू होने वाले सभी तरह के लाइसेंस के बारे में जानता हूँ परन्तु फिर भी सहमत नहीं हूँ की भारतीय अपनी अकूत ज्ञान सम्पदा को अपनी ही आंचलिक भाषा में किसी विदेशी के हाथों सौंप दे. अगर हर साल १० लाख से अधिक कंप्यूटर अभियंता या जानकार बनाने वाली भारत की युनीवर्सिटीज के होनहार छात्र अगर एक स्वदेशी ज्ञान स्थल नहीं बना सके तो कोई बात नहीं, परन्तु इंटरनेट पर चाँद निशुल्क सुविधाओं और औजारों के लालच में आकर अपना सर्वस्व विशुद्ध व्यापारिक मानसिकता वाले विदेशियों के चरणों में न्योछावर करने का मैं विरोध करता हूँ.
शास्त्री जी आप इतिहास के बेहतर जानकार हैं. आपको अवश्य पता होगा की कब कब और कैसे विश्व के तमाम भागों में तमाम आचार संहिताओं और वाणिज्य नियमों को ताक पर रख कर सूचनाओं का दुरूपयोग किया गया है. विशेष कर अमेरिका द्वारा.. इसलिए अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं.
कल इससे मिलतीजुलती बातें भाटिया जी ने अपनी टिप्पणी में और व्यक्तिगत पत्र में मुझे प्रेषित की थी. इससे यह स्पष्ट है कि कई चिट्ठाकार मामले के विभिन्न पहलुओं के बारे में गहन चिंतन कर रहे हैं.
पुनीत ने (और भाटिया जी) जो मुद्दे उठाये हैं उनका उत्तर निम्न है:
- विदेशी कंपनियां एवं सर्वर-मालिक कभी भी शर्तें बदल कर सब कुछ हथिया सकते हैं. इसके कई उदाहरण पिछले 15 सालों में देखे जा चुके हैं.
- जहां तक हो सके हिन्दुस्तान का अथाह ज्ञान हिन्दुस्तानियों के अधिकार के सर्वरों पर स्थित होना चाहिये.
- लेकिन यह तभी हो पायगा जब कुछ धनी हिन्दुस्तान-प्रेमी लोग इसके लिये आर्थिक रूप से समर्पित हो जायें.
- विकिपीडिया आजकल लगभग 100 से अधिक सर्वरों की सहायता से चल रही है. इसके लिये वे लोग् लाखों डॉलर हर साल एकत्रित करते हैं.
- यदि सिर्फ हिन्दी की बात कहें तो एक सर्वर से चालू करना होगा, और दस साल में यह कम से कम 100 सर्वर-स्थान घेरने लगेगा.
- इसके लिए आर्थिक रूप से समर्पित एक ट्रस्ट, तकनीकी जानकारी वाले समर्पित हिन्दी-प्रेमी, एवं लेखकों की जरूरत पडेगी.
- लेखक मिल जायेंगे, लेकिन पहली दो बातें उपलब्ध होने के बाद ही किसी दिशा में बढा जा सकता है.
- हिन्दुस्तान में कई ट्रस्ट हैं जिनके पास अथाह संपत्ति है. यदि कोई व्यक्ति इन से पहचान निकाल कर कुछ कर सके तो कार्य आरंभ हो सकता है.
अत: पुनीत, तुम ने बात सही कही है. लेकिन आगे बढने के लिये यह जरूरी है कि कुछ लोग कमर कस कर इसके लिये निकल पडे. सिर्फ कमर कसना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि ऐसे 5 से 10 लोगों को इस कार्य के लिये निकलना होगा जो पहले साल कम से कम दस लाख रुपया एकत्रित कर सकें जो बढ कर दस साल में एक करोड रुपया प्रति वर्ष तक पहुंच सके. विकिपीडिया और गूगल के पास ये आर्थिक साधन हैं इस लिए वे विजयी हो रहे हैं. यदि कुछ लोग इस तरह के साधन जुटा सकें तो एक हिन्दुस्तानी कार्य विजयी हो सकता है.
Article Bank | Net Income | About India । Indian Coins | Physics Made Simple | India
इस विभाग के पिछले 10 पोस्ट




March 13th, 2009 at 6:07 am
सच कहिये तो मैं इस समस्या के बारे में सोच ही नहीं पा रहा था ।
पर हम हाथ पर हाथ धरे बैठ भी तो नहीं सकते, केवल प्रतीक्षा में । हो सकता है कि हम एक राह चलें दूसरी खुद-ब-खुद निकल आये, और सत्संकल्प भी तो कुछ होता है ना ! क्या वह सदैव ही ठगा जायेगा ?
March 13th, 2009 at 6:41 am
लीजिए किया धरा कुछ नहीं और झगड़ा शुरू…पुनीत का सवाल महत्वपूर्ण ज़रूर है पर व्यावहारिक नहीं। भारतीय मनीषा के तमाम आयामों के बारे में विकीपीडिया समेत अन्यान्य जालस्थलों और कोशों पर अंग्रेजी, जर्मन,फ्रैंच, अरबी में प्रचूर मात्रा में सामग्री उपलब्ध है। विकीपीडिया पर हिन्दी में जो कुछ डालने की बात कही जा रही है वह दरअसल इसी सामग्री का सार या उसका हिन्दी अनुवाद होगा। कई स्थलों पर तो यह सब हिन्दी में भी उपलब्ध है। भारतीय दर्शन, इतिहास, पुरातत्व, भूगोल, कला, धर्म, संस्कृति के बारे मे बहुत कुछ अंग्रेजी में नेट पर उपलब्ध है। किस थाती की हम बात कर रहे हैं है ? वेदोपनिषदों के तमाम भाष्यों समेत अनेक ज्ञात-अज्ञात ग्रंथों की मूल पांडुलिपियों के अंग्रेजी रूप दशकों से उपलब्ध हैं और अब डिजिटल प्रिंट तक नेट पर आ चुके हैं। विकीपीडिया पर तो सिर्फ संदर्भ सामग्री हिन्दी में लाने की बात हो रही है न कि मौलिक हिन्दी रचनाकर्म को प्रस्तुत करने की। आप न करें, वे खुद एक दिन यह सब हिन्दी मे उपलब्ध करा देंगे तो आप क्या कर लेंगे? किसी अनदेखे व्यावसायिक लाभ की कल्पना कर हम किसी अच्छी पहल से खुद को वंचित रखेंगे? हम भारतीय हमेशा से अपनी थाती की बात करते हैं मगर कोई एक नाम तो बताया जाए किसी एक ग्रंथ का जो सिर्फ हमारे पास है और जिसका कोई उल्लेख अभी तक विश्वसमाज में नहीं हुआ है। मैं किसी का विरोध नहीं कर रहा हूं मगर कुछ एकांगी सा लगा इसलिए संक्षेप में कुछ कहने का प्रयास किया है। विषय विशद है।
March 13th, 2009 at 6:47 am
टेस्टिंग!!
March 13th, 2009 at 6:50 am
अहा! क्या बात कही है!!
काम ज़्यादा मुश्किल दिखता नहीं है। ज़रूरत, शुरूआत करने की है।
बुज़ुर्ग (!?) कुछ करें तो, हम जैसे ज़वान सामने आयें।
सर्वर जैसी चीज के बारे में चर्चा कर इस तरफ कदम बढ़ाया जा सकता है।
March 13th, 2009 at 7:37 am
हाँ जी, पाबला जी से सहमत हूँ।
March 13th, 2009 at 8:14 am
विकीपीडिया तो मुक्त ज्ञान कोष है सबका है !
March 13th, 2009 at 9:03 am
“सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठमलट्ठ” ! बाकी वही कहना था जिसे अजित वाडनेकर जी ने लिख दिया है। आज नेट पर ऐसी चीजें उपलब्ध हैं जिसके बारे में कभी यही कल्पना रहती थी कि ये तो ‘ऊँची’ और ‘गुप्त’ चीज है।
दूसरी बात यह कि जब अपनी भाषा में सामग्री ‘तैयार’ रहेगी (चाहे वह विकिपिडिया पर हो या नॉल पर) तो उसे किसी अन्य सर्वर या अन्य माध्यम पर आसानी से ‘नकल’ भी किया जा सकता है। (आजकल तो पूरी की पूरी वेबसाइट को स्वत: कॉपी करने वाले प्रोग्राम भी मुफ्त में उपलब्ध हैं। )
इसलिये देशी सर्वर के आने तक हाँथ पर हाथ धरे रखकर बैठने की मूढ़ता से बचा जाना जरूरी है।
March 13th, 2009 at 12:04 pm
This is a true fact that India is providing a major share of software / hardware engineers in computer filed but still our national language is not having even a single percent space in internet.
Government is spending crores and crores of rupees but not in right direction. A example of Hindi English Dictionary. Most of the languages of world having bilangual dictionary i.e. their language and english and vice versa.
In Hindi language also there are dozens of dictionaries available free of cost i.e. only English to Hindi but not a single one professional dictionary i.e. Hindi to English. It means English professionals can learn Hindi but Hindi learners dont get the chance to learn english. There are may private Hindi to English dictionaries are costing Rs. 500/- and above but not a single free of cost. Govt has many department for promotion of Hindi. Really it is very funny and sameful govt. policy on Hindi language.
Hope government should think on this side.
sunil patel
suntel.110mb.com
suntel.indiademocracy.org
sunilpatel321@gmail.com
March 13th, 2009 at 12:09 pm
सभी मनीषी जनों का आभार.
मुझे लगता है कि मेरी टिप्पणी के केवल एक पहलू को ही देखा गया है. मेरा अभिप्राय किसी भी रूप में सूचना के वैश्वीकरण या हिन्दीकरण के विरुद्ध नहीं है. वडनेकर जी ने सही कहा है कि आज इन्टरनेट पर लगभग सब कुछ उजागर हो चुका है. मेरा प्रश्न कुछ और ही है जिसे एक “उदाहरण” के माध्यम से कहने का प्रयास कर रहा हूँ..
सभी लोग गूगल कलेंडर के बारे में जानते हैं. आप इसमें अपने सभी विवरण डाल कर चैन से जी सकते हैं. हर रोज सुबह एक फ्री एस एम एस भी आ जाता है जिसमे उस दिन के सभी एप्वाइन्टमेन्ट्स लिखे होते हैं. लो जी मजा ही मजा. आप इसे मोबाइल से सिंक करके अपनी फोनबुक इस पर अपलोड कर सकते हैं. यानि आपकी फोनबुक कंप्यूटर से भी दर्शनीय है. बल्ले ओ बल्ले. ऑफिस में कम करने वालों के लिए एक टूल है जिससे आउटलुक में मौजूद सभी मीटिंग, कॉन्टेक्ट्स और तमाम व्यक्तिगत जानकारी को बिना किसी प्रयास के सिंक कर सकते हैं. यानी ऑफिस के पीसी की जानकारी घर के पीसी पर भी उपलब्ध. कमाल हो गया. गूगल लैटीत्यूड जिसे मेरे कई मित्र प्रयोग करते हैं, के इस्तेमाल से आप अपनी वर्त्तमान भौगोलिक स्थिति कि आप किस शहर के कौन सी गली में हैं आप अपने मित्रो के साथ साझा कर सकते हैं. भाई मजा आगया. गूगल वोयस से आप अपने विभिन्न फोन नंबरों के काल्स एक फोन पर पा सकते हैं वो भी फोकट में.
अब इस का दूसरा पहलू.. सिर्फ एक एस एम एस के लालच में आपने अपनी तमाम व्यक्तिगत से व्यक्तिगत जानकरी जिसे आप अपने निकट मित्रों के साथ भी साझा नहीं करते, गूगल को बता दी. उनको पता है कि कब कहाँ कौन सी मीटिंग में हैं आप, कब किस मित्र का जन्मदिन है. आपकी फोनबुक अब “एक्सपोज्ड” है.. आपकी फोनबुक मैं मौजूद लोग कब कहाँ क्या कर रहे हैं इसे जानना अब एक क्लिक भर दूर है. मोबाइल मैप का लालच देकर गूगल ने जान लिया कि आप कब कहाँ पर हैं, क्या कर रहे हैं, किससे मिल रहे हैं, क्या बात कर रहे हैं. अगर गूगल वोयस, हेल्थ, फाइनेंस, जी ड्राइव, डॉक्स आदि तमाम गूगल टूल्स को एक साथ रख कर सोचा जाए तो आपको पता चलेगा कि गूगल आपकी पल पल कि जानकारी रखता है. आप उसके अकेले यूजर नहीं, ऐसे करोडो हैं.. और उन सब का डाटा मिला दिया जाए तो आप सोच भी नहीं सकते कि कितना वीभत्स जाल तैयार हो चुका है.
शायद इसी लिए आज एक एक पान वाला और रेहडी वाले जिनकी पक्की दूकान भी नहीं है, उनके पास भी आपको स्टीकर चिपका मिल जायेगा कि “वी आर ऑन गूगल मैप्स”. वजह ये है कि गूगल मैप का फ्री फार्म भरने पर दुकानदारों को कुछ सौ रुपये के तोहफे मिलते हैं. पर किसी ने सोचा कि तोहफे क्यों मिल रहे हैं? क्यों आपके ऊपर सुविधाओं कि बरसात हो रही है? गूगल ने क्यों आपकी लाइफ को फोकट में फुल्ली कनेक्टेड बनाया हुआ है? क्यों कॉल सेंटर्स के फोन आपको उन्ही सुविधाओं के लिए आते हैं जिनमे या तो आप रूचि रखते हैं या आप आर्थिक रूप से समर्थ होते हैं? क्यों डोमिनोस पिज्जा ऑर्डर करते वक़्त आप को अपना घर का पता बताने की भी जरुरत नहीं पड़ती भले ही आप पहली बार काल कर रहे हों.
सवाल कई हैं पर जवाब एक.. “पैसा”.. अब “अंतरजाल” अपनी शाब्दिक परिभाषा चरितार्थ कर रहा है.. सूचनाये इधर से उधर तैर रही हैं.. पैसे से पैसा बनाया जा रहा है. यही तो है WEB 2.0 अब इसे हिंदी से जोडें या भारतीयता से.. विकिपीडिया से जोड़े या हमारी सभ्यता संस्कृति से. आपकी जिंदगी आपकी मर्जी.
March 13th, 2009 at 12:39 pm
पुनीत जी,
आपने जो प्रश्न उठाये हैं उसी तरह के प्रश्न हमेशा से मौजूद रहे हैं। हम रोज खाना खाते हैं; यदि खाने में जहर हो तो? हम रहने के लिये घर बनाते हैं; यदि घर की छत हमारे ही उपर गिर गयी तो? हम रोज अनेकानेक कामों के लिये आग जलाते हैं; वह आग घर को ही जला दे तो?
आप मानेंगे कि ये कोई समस्याएं नहीं हैं। लोग इनके लिये आवश्यक सावधानी लेकर इनके साथ जीते हैं। मैं इसे समस्या तब मानता यदि गूगल को वो भी चीज पता चल जाती जिसे आपने गूगल से छिपाये रखा है।
March 13th, 2009 at 1:49 pm
सब से पहले तो हम यह समझ लें कि जो भी हम यहां दे रहे हैं, वह सब किताबों में रखा हुआ ही है और इसे नेट के ज़रिए उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे पाठकों को रेफेरेंस की सुविधा हो सकेगी। कभी हमारे एक मित्र ने बताया था कि तुलसीदास के साहित्य की तुलना में शेक्सपियर का साहित्य कई गुना अंतरजाल पर उपलब्ध है। क्यों? इसीलिए ना कि हम उसे विकिपीडीया आदि पर उसे नहीं डाल पा रहे हैं। ज्ञान तो बांटने से ही बढेगा। हमने अपने ज्ञान को छुपाने के कारण ही काफी कुछ खो चुके है- कई जडी-बूटी का ज्ञान तक॥
March 13th, 2009 at 2:04 pm
शास्त्री जी, मेरी टिप्पणी??
March 13th, 2009 at 2:04 pm
वो तो छापो, सर!!
March 13th, 2009 at 3:24 pm
Posted By The Webmaster:
अखबार का कागज बनाने की लुग्दी कहाँ से आई या उसमें छपा समाचार-क्या ज्यादा महत्वपूर्ण है.
कल को विदेशी कागज और लुग्दी देना न बंद कर दें इसलिये हम आज से ही अखबार नहीं निकालेंगे, यह तो उचित नहीं.
आपका सुझाया कार्य भी सतत होते रहना चाहिये और विकि आदि पर नियमित योगदान भी जारी रहना चाहिये.
सादर
समीर लाल
March 14th, 2009 at 3:15 am
अरे
March 14th, 2009 at 3:25 am
आप सभी की टिपण्णीयां पढी,बहुत अच्छा लगा, लेकिन निचोड जो निकला कि हमे पकी पकाई खाने की आदत है, अरे थोडी मेहनत कर के खुद पकाय़े, सच कहता हू बहुत स्वाद आयेगा, हमारा सबिधान भी हम ने खुद नही लिखा, इस की भी अन्य देशो के सबिधान की नकल है यानि पकी पकाई, यह जो अग्रेजी हम सब पर छाई है, यह भी पकी पकाई है, जब देश आजाद हुआ तभी इस बीमारी को मार फ़ेकते, लेकिन जब पकी पकाई मिलती है तो काहे …
इतने भी किसे के सहारे मत रहो कि… जब सहारा हटे तो हम घर के रहे ना घाट के, पहला मदद गार मे बनता हूं, इस काम के लिये, आई आप सब भी अपना अपना नाम लिखवाये, आज जो काम हमे बेफ़जुल लगता है कल इसी पर आप मान करेगे.
धन्यवाद, अभी डर लग रहा है इस से पहले एक टिपण्णी बहुत मेहनत से लिखी, जो पता नही कहां भाग गई, तो आईय़े ओर हाथ से हाथ मिलये,अजी हम मंदिरो मे इतना चढावा चढाते है , ओर यह काम तो हम अपने आने वाली कई पीढीयो के लिये भी करेगे,यह भी एक अच्छा काम है पुजा से भी बढ कर.
फ़िर से धन्यवाद.
पुनीत जी की सारी बात से सहमत हुं
March 14th, 2009 at 9:28 am
[...] पुनीत ओमर — एक महत्वपूर्ण प्रश्न !! [...]