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	<title>Comments on: पुनीत ओमर &#8212; एक महत्वपूर्ण प्रश्न !!</title>
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	<link>http://sarathi.info/archives/2007</link>
	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>By: रतन सिंह और विकिपीडिया !! &#124; सारथी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2007/comment-page-1#comment-6079</link>
		<dc:creator>रतन सिंह और विकिपीडिया !! &#124; सारथी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 14 Mar 2009 03:58:07 +0000</pubDate>
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		<description>[...] पुनीत ओमर &#8212; एक महत्वपूर्ण प्रश्न !!  [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] पुनीत ओमर &#8212; एक महत्वपूर्ण प्रश्न !!  [...]</p>
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	<item>
		<title>By: राज भाटिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2007/comment-page-1#comment-6072</link>
		<dc:creator>राज भाटिया</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Mar 2009 21:55:57 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2007#comment-6072</guid>
		<description>आप सभी की टिपण्णीयां पढी,बहुत अच्छा लगा, लेकिन निचोड जो निकला कि हमे पकी पकाई खाने की आदत है, अरे थोडी मेहनत कर के खुद पकाय़े, सच कहता हू बहुत स्वाद आयेगा, हमारा सबिधान भी हम ने खुद नही लिखा, इस की भी अन्य देशो के सबिधान की नकल है यानि पकी पकाई, यह जो अग्रेजी हम सब पर छाई है, यह भी पकी पकाई है, जब देश आजाद हुआ तभी इस बीमारी को मार फ़ेकते, लेकिन जब पकी पकाई मिलती है तो काहे ...
इतने भी किसे के सहारे मत रहो कि... जब सहारा हटे तो हम घर के रहे ना घाट के, पहला मदद गार मे बनता हूं, इस काम के लिये, आई आप सब भी अपना अपना नाम लिखवाये, आज जो काम हमे बेफ़जुल लगता है कल इसी पर आप मान करेगे.
धन्यवाद, अभी डर लग रहा है इस से पहले एक टिपण्णी बहुत मेहनत से लिखी, जो पता नही कहां भाग गई, तो आईय़े ओर हाथ से हाथ मिलये,अजी हम मंदिरो मे इतना चढावा चढाते है , ओर यह काम तो हम अपने आने वाली कई पीढीयो के लिये भी करेगे,यह भी एक अच्छा काम है पुजा से भी बढ कर.
फ़िर से धन्यवाद.
पुनीत जी की सारी बात से सहमत हुं</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आप सभी की टिपण्णीयां पढी,बहुत अच्छा लगा, लेकिन निचोड जो निकला कि हमे पकी पकाई खाने की आदत है, अरे थोडी मेहनत कर के खुद पकाय़े, सच कहता हू बहुत स्वाद आयेगा, हमारा सबिधान भी हम ने खुद नही लिखा, इस की भी अन्य देशो के सबिधान की नकल है यानि पकी पकाई, यह जो अग्रेजी हम सब पर छाई है, यह भी पकी पकाई है, जब देश आजाद हुआ तभी इस बीमारी को मार फ़ेकते, लेकिन जब पकी पकाई मिलती है तो काहे &#8230;<br />
इतने भी किसे के सहारे मत रहो कि&#8230; जब सहारा हटे तो हम घर के रहे ना घाट के, पहला मदद गार मे बनता हूं, इस काम के लिये, आई आप सब भी अपना अपना नाम लिखवाये, आज जो काम हमे बेफ़जुल लगता है कल इसी पर आप मान करेगे.<br />
धन्यवाद, अभी डर लग रहा है इस से पहले एक टिपण्णी बहुत मेहनत से लिखी, जो पता नही कहां भाग गई, तो आईय़े ओर हाथ से हाथ मिलये,अजी हम मंदिरो मे इतना चढावा चढाते है , ओर यह काम तो हम अपने आने वाली कई पीढीयो के लिये भी करेगे,यह भी एक अच्छा काम है पुजा से भी बढ कर.<br />
फ़िर से धन्यवाद.<br />
पुनीत जी की सारी बात से सहमत हुं</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: राज भाटिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2007/comment-page-1#comment-6071</link>
		<dc:creator>राज भाटिया</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Mar 2009 21:45:12 +0000</pubDate>
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		<description>अरे</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अरे</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Shastri JC Philip</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2007/comment-page-1#comment-6069</link>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Mar 2009 09:54:48 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2007#comment-6069</guid>
		<description>Posted By The Webmaster:

अखबार का कागज बनाने की लुग्दी कहाँ से आई या उसमें छपा समाचार-क्या ज्यादा महत्वपूर्ण है.

कल को विदेशी कागज और लुग्दी देना न बंद कर दें इसलिये हम आज से ही अखबार नहीं निकालेंगे, यह तो उचित नहीं. 

आपका सुझाया कार्य भी सतत होते रहना चाहिये और विकि आदि पर नियमित योगदान भी जारी रहना चाहिये.

 

सादर

समीर लाल</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Posted By The Webmaster:</p>
<p>अखबार का कागज बनाने की लुग्दी कहाँ से आई या उसमें छपा समाचार-क्या ज्यादा महत्वपूर्ण है.</p>
<p>कल को विदेशी कागज और लुग्दी देना न बंद कर दें इसलिये हम आज से ही अखबार नहीं निकालेंगे, यह तो उचित नहीं. </p>
<p>आपका सुझाया कार्य भी सतत होते रहना चाहिये और विकि आदि पर नियमित योगदान भी जारी रहना चाहिये.</p>
<p>सादर</p>
<p>समीर लाल</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: समीर लाल</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2007/comment-page-1#comment-6068</link>
		<dc:creator>समीर लाल</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Mar 2009 08:34:46 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2007#comment-6068</guid>
		<description>वो तो छापो, सर!!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वो तो छापो, सर!!</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: समीर लाल</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2007/comment-page-1#comment-6067</link>
		<dc:creator>समीर लाल</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Mar 2009 08:34:24 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2007#comment-6067</guid>
		<description>शास्त्री जी, मेरी टिप्पणी??</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शास्त्री जी, मेरी टिप्पणी??</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: cmpershad</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2007/comment-page-1#comment-6066</link>
		<dc:creator>cmpershad</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Mar 2009 08:19:19 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2007#comment-6066</guid>
		<description>सब से पहले तो हम यह समझ लें कि जो भी हम यहां दे रहे हैं, वह सब किताबों में रखा हुआ ही है और इसे नेट के ज़रिए उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे पाठकों को रेफेरेंस की सुविधा हो सकेगी। कभी हमारे एक मित्र ने बताया था कि तुलसीदास के साहित्य की तुलना में शेक्सपियर का साहित्य कई गुना अंतरजाल पर उपलब्ध है। क्यों?  इसीलिए ना कि हम उसे विकिपीडीया आदि पर उसे नहीं डाल पा रहे हैं। ज्ञान तो बांटने से ही बढेगा। हमने अपने ज्ञान को छुपाने के कारण ही काफी कुछ खो चुके है- कई जडी-बूटी का ज्ञान तक॥</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सब से पहले तो हम यह समझ लें कि जो भी हम यहां दे रहे हैं, वह सब किताबों में रखा हुआ ही है और इसे नेट के ज़रिए उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे पाठकों को रेफेरेंस की सुविधा हो सकेगी। कभी हमारे एक मित्र ने बताया था कि तुलसीदास के साहित्य की तुलना में शेक्सपियर का साहित्य कई गुना अंतरजाल पर उपलब्ध है। क्यों?  इसीलिए ना कि हम उसे विकिपीडीया आदि पर उसे नहीं डाल पा रहे हैं। ज्ञान तो बांटने से ही बढेगा। हमने अपने ज्ञान को छुपाने के कारण ही काफी कुछ खो चुके है- कई जडी-बूटी का ज्ञान तक॥</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Anunad Singh</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2007/comment-page-1#comment-6065</link>
		<dc:creator>Anunad Singh</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Mar 2009 07:09:27 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2007#comment-6065</guid>
		<description>पुनीत जी,
आपने जो प्रश्न उठाये हैं उसी तरह के प्रश्न हमेशा से मौजूद रहे हैं। हम रोज खाना खाते हैं; यदि खाने में जहर हो तो? हम रहने के लिये घर बनाते हैं; यदि घर की छत हमारे ही उपर गिर गयी तो? हम रोज अनेकानेक कामों के लिये आग जलाते हैं; वह आग घर को ही जला दे तो? 

आप मानेंगे कि ये कोई समस्याएं नहीं हैं।  लोग इनके लिये आवश्यक सावधानी लेकर इनके साथ जीते हैं। मैं इसे समस्या तब मानता यदि गूगल को वो भी चीज पता चल जाती जिसे आपने गूगल से छिपाये रखा है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पुनीत जी,<br />
आपने जो प्रश्न उठाये हैं उसी तरह के प्रश्न हमेशा से मौजूद रहे हैं। हम रोज खाना खाते हैं; यदि खाने में जहर हो तो? हम रहने के लिये घर बनाते हैं; यदि घर की छत हमारे ही उपर गिर गयी तो? हम रोज अनेकानेक कामों के लिये आग जलाते हैं; वह आग घर को ही जला दे तो? </p>
<p>आप मानेंगे कि ये कोई समस्याएं नहीं हैं।  लोग इनके लिये आवश्यक सावधानी लेकर इनके साथ जीते हैं। मैं इसे समस्या तब मानता यदि गूगल को वो भी चीज पता चल जाती जिसे आपने गूगल से छिपाये रखा है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: पुनीत ओमर</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2007/comment-page-1#comment-6064</link>
		<dc:creator>पुनीत ओमर</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Mar 2009 06:39:16 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2007#comment-6064</guid>
		<description>सभी मनीषी जनों का आभार.

मुझे लगता है कि मेरी टिप्पणी के केवल एक पहलू को ही देखा गया है. मेरा अभिप्राय किसी भी रूप में सूचना के वैश्वीकरण या हिन्दीकरण के विरुद्ध नहीं है. वडनेकर जी ने सही कहा है कि आज इन्टरनेट पर लगभग सब कुछ उजागर हो चुका है. मेरा प्रश्न कुछ और ही है जिसे एक &quot;उदाहरण&quot; के माध्यम से कहने का प्रयास कर रहा हूँ..

सभी लोग गूगल कलेंडर के बारे में जानते हैं. आप इसमें अपने सभी विवरण डाल कर चैन से जी सकते हैं. हर रोज सुबह एक फ्री एस एम एस  भी आ जाता है जिसमे उस दिन के सभी एप्वाइन्टमेन्ट्स लिखे होते हैं. लो जी मजा ही मजा. आप इसे मोबाइल से सिंक करके अपनी फोनबुक इस पर अपलोड कर सकते हैं. यानि आपकी फोनबुक कंप्यूटर से भी दर्शनीय है. बल्ले ओ बल्ले. ऑफिस में कम करने वालों के लिए एक टूल है जिससे आउटलुक में मौजूद सभी मीटिंग, कॉन्टेक्ट्स और तमाम व्यक्तिगत जानकारी को बिना किसी प्रयास के सिंक कर सकते हैं. यानी ऑफिस के पीसी की जानकारी घर के पीसी पर भी उपलब्ध. कमाल हो गया. गूगल लैटीत्यूड जिसे मेरे कई मित्र प्रयोग करते हैं, के इस्तेमाल से आप अपनी वर्त्तमान भौगोलिक स्थिति कि आप किस शहर के कौन सी गली में हैं आप अपने मित्रो के साथ साझा कर सकते हैं. भाई मजा आगया. गूगल वोयस से आप अपने विभिन्न फोन नंबरों के काल्स एक फोन पर पा सकते हैं वो भी फोकट में.

अब इस का दूसरा पहलू.. सिर्फ एक एस एम एस के लालच में आपने अपनी तमाम व्यक्तिगत से व्यक्तिगत जानकरी जिसे आप अपने निकट मित्रों के साथ भी साझा नहीं करते, गूगल को बता दी. उनको पता है कि कब कहाँ कौन सी मीटिंग में हैं आप, कब किस मित्र का जन्मदिन है. आपकी फोनबुक अब &quot;एक्सपोज्ड&quot; है.. आपकी फोनबुक मैं मौजूद लोग कब कहाँ क्या कर रहे हैं इसे जानना अब एक क्लिक भर दूर है. मोबाइल मैप का लालच देकर गूगल ने जान लिया कि आप कब कहाँ पर हैं, क्या कर रहे हैं, किससे मिल रहे हैं, क्या बात कर रहे हैं. अगर गूगल वोयस, हेल्थ, फाइनेंस, जी ड्राइव, डॉक्स आदि तमाम गूगल टूल्स को एक साथ रख कर सोचा जाए तो आपको पता चलेगा कि गूगल आपकी पल पल कि जानकारी रखता है. आप उसके अकेले यूजर नहीं, ऐसे करोडो हैं.. और उन सब का डाटा मिला दिया जाए तो आप सोच भी नहीं सकते कि कितना वीभत्स जाल तैयार हो चुका है.

शायद इसी लिए आज एक एक पान वाला और रेहडी वाले जिनकी पक्की दूकान भी नहीं है, उनके पास भी आपको स्टीकर चिपका मिल जायेगा कि &quot;वी आर ऑन गूगल मैप्स&quot;. वजह ये है कि गूगल मैप का फ्री फार्म भरने पर दुकानदारों को कुछ सौ रुपये के तोहफे मिलते हैं. पर किसी ने सोचा कि तोहफे क्यों मिल रहे हैं? क्यों आपके ऊपर सुविधाओं कि बरसात हो रही है? गूगल ने क्यों आपकी लाइफ को फोकट में फुल्ली कनेक्टेड बनाया हुआ है? क्यों कॉल सेंटर्स के फोन आपको उन्ही सुविधाओं के लिए आते हैं जिनमे या तो आप रूचि रखते हैं या आप आर्थिक रूप से समर्थ होते हैं? क्यों  डोमिनोस पिज्जा ऑर्डर करते वक़्त आप को अपना घर का पता बताने की भी जरुरत नहीं पड़ती भले ही आप पहली बार काल कर रहे हों. 

सवाल कई हैं पर जवाब एक.. &quot;पैसा&quot;.. अब &quot;अंतरजाल&quot; अपनी शाब्दिक परिभाषा चरितार्थ कर रहा है.. सूचनाये इधर से उधर तैर रही हैं..  पैसे से पैसा बनाया जा रहा है. यही तो है WEB 2.0 अब इसे हिंदी से जोडें या भारतीयता से.. विकिपीडिया से जोड़े या हमारी सभ्यता संस्कृति से. आपकी जिंदगी आपकी मर्जी.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सभी मनीषी जनों का आभार.</p>
<p>मुझे लगता है कि मेरी टिप्पणी के केवल एक पहलू को ही देखा गया है. मेरा अभिप्राय किसी भी रूप में सूचना के वैश्वीकरण या हिन्दीकरण के विरुद्ध नहीं है. वडनेकर जी ने सही कहा है कि आज इन्टरनेट पर लगभग सब कुछ उजागर हो चुका है. मेरा प्रश्न कुछ और ही है जिसे एक &#8220;उदाहरण&#8221; के माध्यम से कहने का प्रयास कर रहा हूँ..</p>
<p>सभी लोग गूगल कलेंडर के बारे में जानते हैं. आप इसमें अपने सभी विवरण डाल कर चैन से जी सकते हैं. हर रोज सुबह एक फ्री एस एम एस  भी आ जाता है जिसमे उस दिन के सभी एप्वाइन्टमेन्ट्स लिखे होते हैं. लो जी मजा ही मजा. आप इसे मोबाइल से सिंक करके अपनी फोनबुक इस पर अपलोड कर सकते हैं. यानि आपकी फोनबुक कंप्यूटर से भी दर्शनीय है. बल्ले ओ बल्ले. ऑफिस में कम करने वालों के लिए एक टूल है जिससे आउटलुक में मौजूद सभी मीटिंग, कॉन्टेक्ट्स और तमाम व्यक्तिगत जानकारी को बिना किसी प्रयास के सिंक कर सकते हैं. यानी ऑफिस के पीसी की जानकारी घर के पीसी पर भी उपलब्ध. कमाल हो गया. गूगल लैटीत्यूड जिसे मेरे कई मित्र प्रयोग करते हैं, के इस्तेमाल से आप अपनी वर्त्तमान भौगोलिक स्थिति कि आप किस शहर के कौन सी गली में हैं आप अपने मित्रो के साथ साझा कर सकते हैं. भाई मजा आगया. गूगल वोयस से आप अपने विभिन्न फोन नंबरों के काल्स एक फोन पर पा सकते हैं वो भी फोकट में.</p>
<p>अब इस का दूसरा पहलू.. सिर्फ एक एस एम एस के लालच में आपने अपनी तमाम व्यक्तिगत से व्यक्तिगत जानकरी जिसे आप अपने निकट मित्रों के साथ भी साझा नहीं करते, गूगल को बता दी. उनको पता है कि कब कहाँ कौन सी मीटिंग में हैं आप, कब किस मित्र का जन्मदिन है. आपकी फोनबुक अब &#8220;एक्सपोज्ड&#8221; है.. आपकी फोनबुक मैं मौजूद लोग कब कहाँ क्या कर रहे हैं इसे जानना अब एक क्लिक भर दूर है. मोबाइल मैप का लालच देकर गूगल ने जान लिया कि आप कब कहाँ पर हैं, क्या कर रहे हैं, किससे मिल रहे हैं, क्या बात कर रहे हैं. अगर गूगल वोयस, हेल्थ, फाइनेंस, जी ड्राइव, डॉक्स आदि तमाम गूगल टूल्स को एक साथ रख कर सोचा जाए तो आपको पता चलेगा कि गूगल आपकी पल पल कि जानकारी रखता है. आप उसके अकेले यूजर नहीं, ऐसे करोडो हैं.. और उन सब का डाटा मिला दिया जाए तो आप सोच भी नहीं सकते कि कितना वीभत्स जाल तैयार हो चुका है.</p>
<p>शायद इसी लिए आज एक एक पान वाला और रेहडी वाले जिनकी पक्की दूकान भी नहीं है, उनके पास भी आपको स्टीकर चिपका मिल जायेगा कि &#8220;वी आर ऑन गूगल मैप्स&#8221;. वजह ये है कि गूगल मैप का फ्री फार्म भरने पर दुकानदारों को कुछ सौ रुपये के तोहफे मिलते हैं. पर किसी ने सोचा कि तोहफे क्यों मिल रहे हैं? क्यों आपके ऊपर सुविधाओं कि बरसात हो रही है? गूगल ने क्यों आपकी लाइफ को फोकट में फुल्ली कनेक्टेड बनाया हुआ है? क्यों कॉल सेंटर्स के फोन आपको उन्ही सुविधाओं के लिए आते हैं जिनमे या तो आप रूचि रखते हैं या आप आर्थिक रूप से समर्थ होते हैं? क्यों  डोमिनोस पिज्जा ऑर्डर करते वक़्त आप को अपना घर का पता बताने की भी जरुरत नहीं पड़ती भले ही आप पहली बार काल कर रहे हों. </p>
<p>सवाल कई हैं पर जवाब एक.. &#8220;पैसा&#8221;.. अब &#8220;अंतरजाल&#8221; अपनी शाब्दिक परिभाषा चरितार्थ कर रहा है.. सूचनाये इधर से उधर तैर रही हैं..  पैसे से पैसा बनाया जा रहा है. यही तो है WEB 2.0 अब इसे हिंदी से जोडें या भारतीयता से.. विकिपीडिया से जोड़े या हमारी सभ्यता संस्कृति से. आपकी जिंदगी आपकी मर्जी.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: sunil patel</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2007/comment-page-1#comment-6063</link>
		<dc:creator>sunil patel</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Mar 2009 06:34:13 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2007#comment-6063</guid>
		<description>This is a true fact that India is providing a major share of software / hardware engineers in computer filed but still our national language is not having even a single percent space in internet. 

Government is spending crores and crores of rupees but not in right direction. A example of Hindi English Dictionary. Most of the languages of world having bilangual dictionary i.e. their language and english and vice versa. 

In Hindi language also there are dozens of dictionaries available free of cost i.e. only English to Hindi but not a single one professional dictionary i.e. Hindi to English. It means English professionals can learn Hindi but Hindi learners dont get the chance to learn english. There are may private Hindi to English dictionaries are costing Rs. 500/- and above but not a single free of cost. Govt has many department for promotion of Hindi. Really it is very funny and sameful govt. policy on Hindi language. 

Hope government should think on this side. 

sunil patel
suntel.110mb.com
suntel.indiademocracy.org
sunilpatel321@gmail.com</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>This is a true fact that India is providing a major share of software / hardware engineers in computer filed but still our national language is not having even a single percent space in internet. </p>
<p>Government is spending crores and crores of rupees but not in right direction. A example of Hindi English Dictionary. Most of the languages of world having bilangual dictionary i.e. their language and english and vice versa. </p>
<p>In Hindi language also there are dozens of dictionaries available free of cost i.e. only English to Hindi but not a single one professional dictionary i.e. Hindi to English. It means English professionals can learn Hindi but Hindi learners dont get the chance to learn english. There are may private Hindi to English dictionaries are costing Rs. 500/- and above but not a single free of cost. Govt has many department for promotion of Hindi. Really it is very funny and sameful govt. policy on Hindi language. </p>
<p>Hope government should think on this side. </p>
<p>sunil patel<br />
suntel.110mb.com<br />
suntel.indiademocracy.org<br />
<a href="mailto:sunilpatel321@gmail.com">sunilpatel321@gmail.com</a></p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Anunad Singh</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2007/comment-page-1#comment-6062</link>
		<dc:creator>Anunad Singh</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Mar 2009 03:33:39 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2007#comment-6062</guid>
		<description>&quot;सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठमलट्ठ&quot; ! बाकी वही कहना था जिसे अजित वाडनेकर जी ने लिख दिया है। आज नेट पर ऐसी चीजें उपलब्ध हैं जिसके बारे में कभी यही कल्पना रहती थी कि ये तो &#039;ऊँची&#039; और  &#039;गुप्त&#039; चीज है।

दूसरी बात यह कि जब अपनी भाषा में सामग्री &#039;तैयार&#039; रहेगी (चाहे वह विकिपिडिया पर हो या नॉल पर) तो उसे  किसी अन्य सर्वर या अन्य माध्यम पर आसानी से &#039;नकल&#039; भी किया जा सकता है। (आजकल तो पूरी की पूरी वेबसाइट को स्वत: कॉपी करने वाले प्रोग्राम भी मुफ्त में उपलब्ध हैं। )
इसलिये  देशी  सर्वर के आने तक हाँथ पर हाथ धरे रखकर बैठने की मूढ़ता  से बचा जाना जरूरी है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठमलट्ठ&#8221; ! बाकी वही कहना था जिसे अजित वाडनेकर जी ने लिख दिया है। आज नेट पर ऐसी चीजें उपलब्ध हैं जिसके बारे में कभी यही कल्पना रहती थी कि ये तो &#8216;ऊँची&#8217; और  &#8216;गुप्त&#8217; चीज है।</p>
<p>दूसरी बात यह कि जब अपनी भाषा में सामग्री &#8216;तैयार&#8217; रहेगी (चाहे वह विकिपिडिया पर हो या नॉल पर) तो उसे  किसी अन्य सर्वर या अन्य माध्यम पर आसानी से &#8216;नकल&#8217; भी किया जा सकता है। (आजकल तो पूरी की पूरी वेबसाइट को स्वत: कॉपी करने वाले प्रोग्राम भी मुफ्त में उपलब्ध हैं। )<br />
इसलिये  देशी  सर्वर के आने तक हाँथ पर हाथ धरे रखकर बैठने की मूढ़ता  से बचा जाना जरूरी है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Dr.Arvind Mishra</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2007/comment-page-1#comment-6061</link>
		<dc:creator>Dr.Arvind Mishra</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Mar 2009 02:44:03 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2007#comment-6061</guid>
		<description>विकीपीडिया  तो मुक्त ज्ञान कोष है सबका है !</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>विकीपीडिया  तो मुक्त ज्ञान कोष है सबका है !</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: दिनेशराय द्विवेदी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2007/comment-page-1#comment-6060</link>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Mar 2009 02:07:47 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2007#comment-6060</guid>
		<description>हाँ जी, पाबला जी से सहमत हूँ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हाँ जी, पाबला जी से सहमत हूँ।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: बी एस पाबला</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2007/comment-page-1#comment-6059</link>
		<dc:creator>बी एस पाबला</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Mar 2009 01:20:48 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2007#comment-6059</guid>
		<description>अहा! क्या बात कही है!!

काम ज़्यादा मुश्किल दिखता नहीं है। ज़रूरत, शुरूआत करने की है।
बुज़ुर्ग (!?) कुछ करें तो, हम जैसे ज़वान सामने आयें।

सर्वर जैसी चीज के बारे में चर्चा कर इस तरफ कदम बढ़ाया जा सकता है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अहा! क्या बात कही है!!</p>
<p>काम ज़्यादा मुश्किल दिखता नहीं है। ज़रूरत, शुरूआत करने की है।<br />
बुज़ुर्ग (!?) कुछ करें तो, हम जैसे ज़वान सामने आयें।</p>
<p>सर्वर जैसी चीज के बारे में चर्चा कर इस तरफ कदम बढ़ाया जा सकता है।</p>
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		<title>By: समीर लाल</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2007/comment-page-1#comment-6058</link>
		<dc:creator>समीर लाल</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Mar 2009 01:17:52 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2007#comment-6058</guid>
		<description>टेस्टिंग!!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>टेस्टिंग!!</p>
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