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	<title>Comments on: हिजडा योनि में जन्म 001</title>
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	<link>http://sarathi.info/archives/2041</link>
	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>By: Eunuchism - Our perception at Blogbharti</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2041/comment-page-1#comment-6326</link>
		<dc:creator>Eunuchism - Our perception at Blogbharti</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 05 Apr 2009 07:34:48 +0000</pubDate>
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		<description>[...] first post is here. The posts are in Hindi. Linked by Cuckoo. Join Blogbharti facebook [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] first post is here. The posts are in Hindi. Linked by Cuckoo. Join Blogbharti facebook [...]</p>
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		<title>By: हिजडा योनि में जन्म 002 &#124; सारथी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2041/comment-page-1#comment-6238</link>
		<dc:creator>हिजडा योनि में जन्म 002 &#124; सारथी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Mar 2009 23:31:35 +0000</pubDate>
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		<description>[...] हिजडा योनि में जन्म 001  [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] हिजडा योनि में जन्म 001  [...]</p>
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		<title>By: cmpershad</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2041/comment-page-1#comment-6237</link>
		<dc:creator>cmpershad</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Mar 2009 17:02:44 +0000</pubDate>
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		<description>लैंगिक विकलांगता अलग चीज़ है और हिजडे एक अलग जाति है। ऐसे कई लोग हैं जो इस विअकलांगता के कारण ब्याह नहीं करते और जीवन बिता देते हैं। वे हिजडों की तरह कोई स्वांग नहीं करते।  जैसा कि सुरेशजी ने कहा, कुछ मर्द भी हिजडों का भेस धारण करके आजीविका का एक स्त्रोत बना लेते हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>लैंगिक विकलांगता अलग चीज़ है और हिजडे एक अलग जाति है। ऐसे कई लोग हैं जो इस विअकलांगता के कारण ब्याह नहीं करते और जीवन बिता देते हैं। वे हिजडों की तरह कोई स्वांग नहीं करते।  जैसा कि सुरेशजी ने कहा, कुछ मर्द भी हिजडों का भेस धारण करके आजीविका का एक स्त्रोत बना लेते हैं।</p>
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	<item>
		<title>By: PN Subramanian</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2041/comment-page-1#comment-6236</link>
		<dc:creator>PN Subramanian</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Mar 2009 16:36:25 +0000</pubDate>
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		<description>समस्या गंभीर है. एक अकेले रुपेश श्रीवास्तव जी के लिए बहुत भारी भी. जन मानस में एक जाग्रति लानी होगी. अन्य विकलांगों के जैसे इन्हें भी समाज के लिए उपयोगी बनाना होगा. अभी तो उन्हें शोषक ही माना जाता है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>समस्या गंभीर है. एक अकेले रुपेश श्रीवास्तव जी के लिए बहुत भारी भी. जन मानस में एक जाग्रति लानी होगी. अन्य विकलांगों के जैसे इन्हें भी समाज के लिए उपयोगी बनाना होगा. अभी तो उन्हें शोषक ही माना जाता है.</p>
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		<title>By: आलोक सिंह</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2041/comment-page-1#comment-6235</link>
		<dc:creator>आलोक सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Mar 2009 11:49:37 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2041#comment-6235</guid>
		<description>विषय बहुत गंभीर है , एक किन्नर के बारे में लिखना उसे समझाना आसान कार्य नहीं .
आज कल उत्तर -प्रदेश के कुछ स्थानों पर कृतिम रूप से किन्नरों का जन्म हो रहा है ( जो पैदा एक स्वस्थ शरीर के साथ होते है पर पैसे के लिए कुछ लोग उन्हें किन्नर बना देते है ) 
अगले लेख का इंतजार रहेगा .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>विषय बहुत गंभीर है , एक किन्नर के बारे में लिखना उसे समझाना आसान कार्य नहीं .<br />
आज कल उत्तर -प्रदेश के कुछ स्थानों पर कृतिम रूप से किन्नरों का जन्म हो रहा है ( जो पैदा एक स्वस्थ शरीर के साथ होते है पर पैसे के लिए कुछ लोग उन्हें किन्नर बना देते है )<br />
अगले लेख का इंतजार रहेगा .</p>
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	<item>
		<title>By: राज भाटिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2041/comment-page-1#comment-6234</link>
		<dc:creator>राज भाटिया</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Mar 2009 11:17:33 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2041#comment-6234</guid>
		<description>शास्त्री जी. यह तो एक शरीरिक कमी है जेसा कि आप ने लिखा है, कै बच्चे अंधे लगडे लुले भी तो पेदा होते है, या फ़िर किसी दुर्घटना मै किसी का लिंघ खो जाये तो? मुझे समझ नही आता हमारे समाज मै  क्यो ऎसे बच्चे को त्याग देते है, इस कमी मै उस बच्चे का क्या कसुर, क्यो नही उसे भी अन्य बच्चो की तरह से आम प्यार मिलता, आम डांट नही मिलती, जिस से वो अपने आप को ओरो से अलग ना सम्झे.
यहां युरोप मे भी ऎसे लोग मिलते है, लेकिन इन की कोई अलग पहचान नही होती, इन्हे कोई अलग हक नही मिलते,कोई इन पर दया भाव नही दिखाता, कोई इन्हे आरक्षण नही मिलता, जिस से यह अपने आप को आम लोगो जेसा ही समझते है, हम सब मै मिलते जुलते है.
लगडे लुले या अन्य शरीरिक कमी के लिये तो आराक्षण मिलना चाहिये लेकिन ऎसी बात पर अगर हम चाहते है कि यह भी हमारे समाज मै घुल मिल जाये तो इन की कोई अलग पहचान नही होनी चाहिये, बल्कि यह भी हमारी तरह हर हक के बराबर हिस्से दार हो, चाहे वो शिक्षा हो या नोकरी, आरक्षण देने से इन की अलग पहचान होगी ओर फ़िर इन्हे वोही मुश्किले आयेगी जिस से यह बचना चहाते है, या समाज जिस से इन्हे बचाना चाहता है.
अन्त मै इतना ही कहुगां कि यह हमारे ही बच्चे है कृप्या इन्हे ना त्यागे, इन्हे अन्य बच्चो की तरह से ही पाले, उतना ही गुस्सा, उतना ही प्यार दे जितना अन्य बच्चो को देते है, ओर जिस के यह हक दार है. इन की आंखॊ मे झांक कर देखो... क्या कहती है यह मासुऊम आंखे.
धन्यवाद, यह सवाल कई बार मेरे दिल मै उठता था, ओर अन्दर तक बेचेन करता है क्यो हमारे समाज मै इन्हे अलग समझा जाता है ?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शास्त्री जी. यह तो एक शरीरिक कमी है जेसा कि आप ने लिखा है, कै बच्चे अंधे लगडे लुले भी तो पेदा होते है, या फ़िर किसी दुर्घटना मै किसी का लिंघ खो जाये तो? मुझे समझ नही आता हमारे समाज मै  क्यो ऎसे बच्चे को त्याग देते है, इस कमी मै उस बच्चे का क्या कसुर, क्यो नही उसे भी अन्य बच्चो की तरह से आम प्यार मिलता, आम डांट नही मिलती, जिस से वो अपने आप को ओरो से अलग ना सम्झे.<br />
यहां युरोप मे भी ऎसे लोग मिलते है, लेकिन इन की कोई अलग पहचान नही होती, इन्हे कोई अलग हक नही मिलते,कोई इन पर दया भाव नही दिखाता, कोई इन्हे आरक्षण नही मिलता, जिस से यह अपने आप को आम लोगो जेसा ही समझते है, हम सब मै मिलते जुलते है.<br />
लगडे लुले या अन्य शरीरिक कमी के लिये तो आराक्षण मिलना चाहिये लेकिन ऎसी बात पर अगर हम चाहते है कि यह भी हमारे समाज मै घुल मिल जाये तो इन की कोई अलग पहचान नही होनी चाहिये, बल्कि यह भी हमारी तरह हर हक के बराबर हिस्से दार हो, चाहे वो शिक्षा हो या नोकरी, आरक्षण देने से इन की अलग पहचान होगी ओर फ़िर इन्हे वोही मुश्किले आयेगी जिस से यह बचना चहाते है, या समाज जिस से इन्हे बचाना चाहता है.<br />
अन्त मै इतना ही कहुगां कि यह हमारे ही बच्चे है कृप्या इन्हे ना त्यागे, इन्हे अन्य बच्चो की तरह से ही पाले, उतना ही गुस्सा, उतना ही प्यार दे जितना अन्य बच्चो को देते है, ओर जिस के यह हक दार है. इन की आंखॊ मे झांक कर देखो&#8230; क्या कहती है यह मासुऊम आंखे.<br />
धन्यवाद, यह सवाल कई बार मेरे दिल मै उठता था, ओर अन्दर तक बेचेन करता है क्यो हमारे समाज मै इन्हे अलग समझा जाता है ?</p>
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	<item>
		<title>By: पुनीत ओमर</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2041/comment-page-1#comment-6233</link>
		<dc:creator>पुनीत ओमर</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Mar 2009 11:00:27 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2041#comment-6233</guid>
		<description>आशा है की आने वाली कड़ियों से ज्यादा नहीं तो कमसे कम ५० लोगों की सोच और नजरिया तो बदलेगा ही.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आशा है की आने वाली कड़ियों से ज्यादा नहीं तो कमसे कम ५० लोगों की सोच और नजरिया तो बदलेगा ही.</p>
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	<item>
		<title>By: पुनीत ओमर</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2041/comment-page-1#comment-6232</link>
		<dc:creator>पुनीत ओमर</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Mar 2009 10:58:10 +0000</pubDate>
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		<description>बेशक इन्हें भी किसी भी अन्य विकलांग की तरह ही समाज और परिवार का हिस्सा बनाया जा सकता है लेकिन इनसे घ्रणा का प्रमुख कारण है इनका जीविकोपार्जन का तरिका जो की एक परिपाटी के रूप में चला आ रहा है. आज भी जब किसी हिजडे के बारे में कल्पना करें तो हमें हमेशा अजीब सी लाली और झुमके बिंदी से सजे, जोर जोर से ताली बजाते, बसों, ट्रेनों में अश्लील हरकतें करते हुए  पैसे वसूलते हुए कुछ लोग ही क्यों स्मरण में आते हैं? इनमे से एक भी कृत्य ऐसा नहीं है जो की उन के विकलांग होने से जुडा हो. फिर भी वो ऐसा करने को मजबूर हैं जो की उन्हें घ्रणा का पात्र बनाता है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बेशक इन्हें भी किसी भी अन्य विकलांग की तरह ही समाज और परिवार का हिस्सा बनाया जा सकता है लेकिन इनसे घ्रणा का प्रमुख कारण है इनका जीविकोपार्जन का तरिका जो की एक परिपाटी के रूप में चला आ रहा है. आज भी जब किसी हिजडे के बारे में कल्पना करें तो हमें हमेशा अजीब सी लाली और झुमके बिंदी से सजे, जोर जोर से ताली बजाते, बसों, ट्रेनों में अश्लील हरकतें करते हुए  पैसे वसूलते हुए कुछ लोग ही क्यों स्मरण में आते हैं? इनमे से एक भी कृत्य ऐसा नहीं है जो की उन के विकलांग होने से जुडा हो. फिर भी वो ऐसा करने को मजबूर हैं जो की उन्हें घ्रणा का पात्र बनाता है.</p>
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	<item>
		<title>By: तस्‍लीम</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2041/comment-page-1#comment-6231</link>
		<dc:creator>तस्‍लीम</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Mar 2009 09:17:14 +0000</pubDate>
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		<description>एक गम्‍भीर विषय पर सार्थक विवेचना।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>एक गम्‍भीर विषय पर सार्थक विवेचना।</p>
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	<item>
		<title>By: Science Blogger Association</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2041/comment-page-1#comment-6230</link>
		<dc:creator>Science Blogger Association</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Mar 2009 09:16:39 +0000</pubDate>
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		<description>एक गम्‍भीर विषय पर सार्थक विवेचन।
-----------
&lt;a href=&quot;http://tasliim.blogspot.com/&quot; rel=&quot;nofollow&quot;&gt;तस्‍लीम &lt;/a&gt; 
&lt;a href=&quot;http://sciblogindia.blogspot.com/&quot; rel=&quot;nofollow&quot;&gt;साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन&lt;/a&gt;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>एक गम्‍भीर विषय पर सार्थक विवेचन।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
<a href="http://tasliim.blogspot.com/" rel="nofollow">तस्‍लीम </a><br />
<a href="http://sciblogindia.blogspot.com/" rel="nofollow">साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन</a></p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: तस्‍लीम</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2041/comment-page-1#comment-6229</link>
		<dc:creator>तस्‍लीम</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Mar 2009 09:15:56 +0000</pubDate>
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		<description>गम्‍भीर विवेचन है, आमतौर पर इस विषय पर कहीं भी चर्चा नहीं होती है।
-----------
&lt;a href=&quot;http://tasliim.blogspot.com/&quot; rel=&quot;nofollow&quot;&gt;तस्‍लीम &lt;/a&gt; 
&lt;a href=&quot;http://sciblogindia.blogspot.com/&quot; rel=&quot;nofollow&quot;&gt;साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन&lt;/a&gt;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>गम्‍भीर विवेचन है, आमतौर पर इस विषय पर कहीं भी चर्चा नहीं होती है।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
<a href="http://tasliim.blogspot.com/" rel="nofollow">तस्‍लीम </a><br />
<a href="http://sciblogindia.blogspot.com/" rel="nofollow">साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन</a></p>
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	<item>
		<title>By: अन्तर सोहिल</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2041/comment-page-1#comment-6227</link>
		<dc:creator>अन्तर सोहिल</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Mar 2009 06:12:39 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2041#comment-6227</guid>
		<description>आदरणीय नमस्कार
जब से आपको पढना शुरू किया है, आपकी बातों पर(मुझे नही पता क्यों) सहज ही विश्वास हो जाता है। अभी तक मेरी विचारधारा यही थी कि हिजडे पैदाईशी नही होते, ये वो पुरुष होते हैं जो जानबूझ कर अपना लिंग बदल या विकृत कर लेते हैं या रूप बदल लेते हैं । श्री रूपेश जी ने भी जब तब लैंगिक विकलांगों का जिक्र किया, तब भी मैं अपने मानसिकता को सही रास्ते पर नही ला पाया। हालांकि मुझे लैंगिक विकलांगों से ना कोई कुंठा, नफरत और ना ही कोई लगाव है। मैं अर्धसत्य का भी नियमित पाठक हूं । क्योंकि कहीं भी कुछ लिखा जाता है तो मैं उसमें से कुछ (जिन्दगी) सीखने की कोशिश करता रहता हूं । 
अब आपने बताया है तो सचमुच विश्वास हो गया है कि यह जन्मजात विकलांगता होती है। मैं आपसे, रूपेश जी से और सभी लैंगिक विकलांगों से अपनी मानसिकता के लिये क्षमाप्रार्थी हूं ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आदरणीय नमस्कार<br />
जब से आपको पढना शुरू किया है, आपकी बातों पर(मुझे नही पता क्यों) सहज ही विश्वास हो जाता है। अभी तक मेरी विचारधारा यही थी कि हिजडे पैदाईशी नही होते, ये वो पुरुष होते हैं जो जानबूझ कर अपना लिंग बदल या विकृत कर लेते हैं या रूप बदल लेते हैं । श्री रूपेश जी ने भी जब तब लैंगिक विकलांगों का जिक्र किया, तब भी मैं अपने मानसिकता को सही रास्ते पर नही ला पाया। हालांकि मुझे लैंगिक विकलांगों से ना कोई कुंठा, नफरत और ना ही कोई लगाव है। मैं अर्धसत्य का भी नियमित पाठक हूं । क्योंकि कहीं भी कुछ लिखा जाता है तो मैं उसमें से कुछ (जिन्दगी) सीखने की कोशिश करता रहता हूं ।<br />
अब आपने बताया है तो सचमुच विश्वास हो गया है कि यह जन्मजात विकलांगता होती है। मैं आपसे, रूपेश जी से और सभी लैंगिक विकलांगों से अपनी मानसिकता के लिये क्षमाप्रार्थी हूं ।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: ताऊ रामपुरिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2041/comment-page-1#comment-6226</link>
		<dc:creator>ताऊ रामपुरिया</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Mar 2009 06:09:40 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2041#comment-6226</guid>
		<description>आपने बहुत ही लाजवाब विषय ऊठाया इस बार. पर चिपलुणकर जी वाली बात भी सही है.

रामराम.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपने बहुत ही लाजवाब विषय ऊठाया इस बार. पर चिपलुणकर जी वाली बात भी सही है.</p>
<p>रामराम.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: डा.रूपेश श्रीवास्तव</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2041/comment-page-1#comment-6225</link>
		<dc:creator>डा.रूपेश श्रीवास्तव</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Mar 2009 06:06:51 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2041#comment-6225</guid>
		<description>गुरूदेव आपने अपनी करुणावश लिखा है और लोगों ने प्रतिक्रियाएं दी है मैं निजी तौर पर सभी टिप्पणीकारों को धन्यवाद करता हूं और इन सभी से निवेदन करता हूं कि मेरी बहन और आपकी मानस पुत्री मनीषा नारायण के ब्लाग पर नजर डालें (http://adhasach.blogspot.com) हमें समस्या तो पता है तो अब उपायों की ओर बढ़ना होगा, कारगर उपाय तलाशने होंगे, कितने लोग लैंगिक विकलांग बच्चे गोद लेना चाहते हैं? क्या किसी ने इनकी संवैधानिक स्थिति के विषय में सूचना प्राप्ति के अंतर्गत सरकार से जानकारी मांगी हैं?
@ संजय बेंगाणी, भाई मेरा लक्ष्य यही है और मैं इसके साथ ही इन बच्चों के सामाजिक सम्मान के लिये भी सतत प्रयासरत हूं जिसमें कि हमारे पितातुल्य सबके &quot;बाबूजी&quot; शास्त्री जी का यदि सहयोग न हो तो हम सब कबके बिखर गये होते....। बाबूजी की करुणा हम सबके प्रयासों को नित्य नवचैतन्य करे रहती है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>गुरूदेव आपने अपनी करुणावश लिखा है और लोगों ने प्रतिक्रियाएं दी है मैं निजी तौर पर सभी टिप्पणीकारों को धन्यवाद करता हूं और इन सभी से निवेदन करता हूं कि मेरी बहन और आपकी मानस पुत्री मनीषा नारायण के ब्लाग पर नजर डालें (<a href="http://adhasach.blogspot.com" rel="nofollow">http://adhasach.blogspot.com</a>) हमें समस्या तो पता है तो अब उपायों की ओर बढ़ना होगा, कारगर उपाय तलाशने होंगे, कितने लोग लैंगिक विकलांग बच्चे गोद लेना चाहते हैं? क्या किसी ने इनकी संवैधानिक स्थिति के विषय में सूचना प्राप्ति के अंतर्गत सरकार से जानकारी मांगी हैं?<br />
@ संजय बेंगाणी, भाई मेरा लक्ष्य यही है और मैं इसके साथ ही इन बच्चों के सामाजिक सम्मान के लिये भी सतत प्रयासरत हूं जिसमें कि हमारे पितातुल्य सबके &#8220;बाबूजी&#8221; शास्त्री जी का यदि सहयोग न हो तो हम सब कबके बिखर गये होते&#8230;.। बाबूजी की करुणा हम सबके प्रयासों को नित्य नवचैतन्य करे रहती है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: सुरेश चिपलूनकर</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2041/comment-page-1#comment-6224</link>
		<dc:creator>सुरेश चिपलूनकर</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Mar 2009 05:58:22 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2041#comment-6224</guid>
		<description>ऐसे व्यक्तियों पर दया, गुस्सा अथवा अत्यधिक सहानुभूति नहीं दिखाना चाहिये, इन्हें सामाजिक मनोवृत्ति और कानूनी बदलावों की आवश्यकता है… आजकल पैसा कमाने के चक्कर में अब इनमें भी असली-नकली का खेल शुरु हो चुका है…</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ऐसे व्यक्तियों पर दया, गुस्सा अथवा अत्यधिक सहानुभूति नहीं दिखाना चाहिये, इन्हें सामाजिक मनोवृत्ति और कानूनी बदलावों की आवश्यकता है… आजकल पैसा कमाने के चक्कर में अब इनमें भी असली-नकली का खेल शुरु हो चुका है…</p>
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