प्रकृति का दोहन, तकनीकी निर्माण आदि मानव समाज के विकास के साथ साथ सतत चलने वाली प्रक्रियायें हैं. ये सभी चीजें कचरा एवं प्रदूषण पैदा करते हैं जिनको कम किया जा सकता है, लेकिन इनका पूर्ण उन्मूलन संभव नहीं है. इस कारण हर समाज में कचरा इकट्ठा करने और ठिकाने लगाने के विभिन्न तरीके प्रयुक्त होते हैं.
विश्व के लगभग सारे नगरों में सफाई कर्मचारी देखे जा सकते हैं और सारी दुनियां उनकी मेहरबानी पर टिकी हुई है. लेकिन मान कर चलिये कि दो पडोसियों के बीच यह तर्क हो जाता है कि कचरा किस के कारण हुआ है तो कई बार कचरा ठिकाने लगने के बदले कई मजेदार नजारे देखने को मिल जाते हैं.
मैं ग्वालियर की जिस कालोनी में रहता था वहां दो अम्माओं में बडा झगडा था कि घर के सामने सडक-पडा कचरा किसका है. सुबह उन में से पहली अम्मा उठ कर सारा कचरा पडोसिन के सामने “खिसका” देती थी. अगली सुबह दूसरी वाली अम्मा पहली वाली भी पहले उठकर सारा कचरा वापस खिसका देती थी और उसमें कुछ ब्याज अपने घर का निकला भी जोड देती थी. फिर दिन भर वाक-युद्ध चलता रहता था.
कालोनी में सफाई कर्मचारी हर रोज सब घरों का कचरा ले जाते थे, लेकिन इन दो घरों की उपेक्षा कर देते थे और हफ्ते में सिर्फ एक ही दिन उनका कचरा उठाते थे. दोनों स्त्रियों का झगडा वे लोग भी मजे ले लेकर देखते थे. इस बीच आपसी झगडे के कारण वे लोग उनका कचरा हर दिन न उठाने के कारण सफाई कर्मचारियों को डांटने के बदले आपस में ही उलझी रहती थीं.
ग्वालियर के दाल बाजार इलाके के दुकानदारों में भी यही प्रश्न चलता रहता है कि सडक पर पडा कचरा मेरा है या तेरा है. लेकिन वे आपस में झगडने के बदले कुछ और “सभ्य” तरीके से समस्या हल करते हैं. आप दालबाजार के आसपास सडक चलेंगे तो दुकान से लगभग 5 फुट दूर पक्की सडक पर कचरा दिखेगा. यह कचरा हमेशा ठीक दोनों दुकानों से बराबर दूरी पर होगा.
मतलब यह कि कचरा न मेरा है न तेरा है, अत: अपन दोनों झाडू लगा कर दोनों दुकानों से सम-दूरी पर उसे स्थापित कर देते हैं. अब आपस में मनमुटाव और झगडे की कोई जरूरत नहीं है, सडक की सफाई जाये भाड में!!
विडम्बना यह है कि हम इक्कीसवीं शताब्दी में जीने की सुविधा चाहते हैं, लेकिन आदिमानव के संस्कार से आगे नहीं बढ पा रहे हैं. कचरा साफ करने में हमारी उतनी रुचि नहीं जितनी उसे अपनी नजरों के सामने से “हटाने” में है.
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इस विभाग के पिछले 10 पोस्ट




April 30th, 2009 at 5:59 am
कचरा बाहर क्यों मिला कारण अपनी सोच।
जीवन जीने के लिए कुछ न कुछ हो लोच।।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
http://www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
April 30th, 2009 at 10:38 am
अपने घर का द्वार सभी साफ़ रखना चाहते हैं भले ही इससे से दुसरे के घर का द्वार गन्दा हो रहा हो …. कोई ध्यान नहीं रखता इस बात का …सबको अपनी पड़ी है ….और खुद को माडर्न बताते हैं
April 30th, 2009 at 11:21 am
आप दालबाजार के आसपास सडक चलेंगे तो दुकान से लगभग 5 फुट दूर पक्की सडक पर कचरा दिखेगा. यह कचरा हमेशा ठीक दोनों दुकानों से बराबर दूरी पर होगा.
शाश्त्री जी आपने बात बिल्कुल सही कही है. पर उदाहरण दाल बाजार देके हमारी भूख जागृत करदी. दाल बाजार मे एक कचोरी बेडई वाले का ठेला लगता है. आपने भी खाई होगी कई बार. बस मुंह मे पानी आरहा है. अभी वोट डाल कर आये हैं, और छुट्टी का दिन है, अब यहां तो बेडई मिलने से रही. अब कुछ वैसा ही खाने पीने का इंतजाम करते हैं फ़िर कचरा ( दोना वगैरह) सडक पर फ़ेंक कर (यानि प्रेक्टिकल करके) आकर आपकी पोस्ट पर कमेंटियायेंगे.:)
रामराम.
April 30th, 2009 at 12:22 pm
शास्त्रीजी,
इन मुद्दों को लोग भारत में बिलकुलही महत्व नहीं देते। किन्तु सफाई (कचरा-प्रबन्धन) का मुद्दा हमारे सुख से सीधे जुड़ा हुआ है। आप कितनी भी बड़ी हवेली बना लें किन्तु उसके सामने चारो तरफ कचरा मड़रा रहा हो तो आपके मन को शान्ति नहीं मिल सकती। इसके विपरीत आपके पास एक टूटी-फूटी झोपड़ी ही क्यों न हो किन्तु उसके चारो ओर हरियाली हो, पेड़-पौधे हों, स्वच्छ हवा हो – तो क्या कहने?
* अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखें।
* जो चीजें जैविक/प्राकृतिक रूप से नष्ट नहींहो सकतीुनका कम से कम उपयोग करें।
* पुरानी चीजों से काम चलायें। अपनी पुरानी चींजें लोगों को नि:शुल्क दें।
* पुनर्चक्रण(री-सायकिल) के बारे में भी विचारें।
* ध्यान रखें – पर्यावरण अनमोल है, इससे अधिक मूल्यवान कुछ भी नहीं।
April 30th, 2009 at 12:46 pm
बात अम्माओं और दुकानदारों तक ही सीमित नहीं है.. अमेरिका से पुराने कंप्यूटर और अन्य सिलिकॉन पौली फाइबर निर्मित इलेक्ट्रानिक्स सामान से लदे हुए जहाज जब तब गुजरात और महाराष्ट्र के तटों पर ऊतरते रहते हैं.. और फिर वही कंप्यूटर मामूली रिपेयरिंग के बाद ३-४ हजार में भारत में बेचे जाते हैं.. उनके बारे में भी कुछ कहिये..
गरीब की कुटिया क्या कचरा पेटी है.. जो अमीर देश हमारी गरीबी का फायदा उठा कर अपना रासायनिक कचरा हमारे मुँह पर फेंकते रहते हैं और हम फ्री के लालच में मुह बाए उसे लपकते रहते हैं?
April 30th, 2009 at 12:57 pm
कचरा हटाने का काम निजी हाथों में सौंप देना चाहिए…चेन्नई में इस तरह की एक पहल की गयी है.
April 30th, 2009 at 5:06 pm
यह ताजुब की ही बात है कि अपने मोहल्लो को, एवम सार्वजनिक स्थानो को साफ सुथरा रखने मे व्यक्ति एतना गैरजिम्मेदार क्यो है? जब हम अपना घर साफ सुथरा रखने के लिऐ तत्पर है तो शहर और सडको के लिऐ मुह फैराई क्यो?
मै आपके विचारो से सहमत हू ।
April 30th, 2009 at 8:08 pm
यह विशुद्ध भारत की स्वार्थवादी मानसिकता है।
April 30th, 2009 at 10:35 pm
AADARNEEYA SHASHTREEJI, aapka aalekh sateek, upyogi aur prerak hone k sath sath raspoorna bhi hai, kintu dukh ki baat toh ye hai ki log aajkal bheetar se itne gande ho chuke hain ki unko bahar ka kachara dikhai hi nahi deta…..aap ki lekhanee ko pranaam
-ALBELA KHATRI
May 1st, 2009 at 12:37 am
सही कह रहे हैं. यह बेसिक इन्सटिन्कट आने में जरा और समय लगेगा. सिविक सेन्स काफी हद तक तो बढ़ा ही है.
May 1st, 2009 at 8:58 am
विडम्बना यह है कि हम इक्कीसवीं शताब्दी में जीने की सुविधा चाहते हैं, लेकिन आदिमानव के संस्कार से आगे नहीं बढ पा रहे हैं. कचरा साफ करने में हमारी उतनी रुचि नहीं जितनी उसे अपनी नजरों के सामने से “हटाने” में है.
बिल्कुल सही टिप्पणी है आपकी। व्यक्ति यदि बात-बात में अपना अहं (ego) सामने न लाए तो समाज की अनेक समस्याएं पैदा ही न हों। कचरा खराब चीज है तभी तो लोग इससे अपना किनारा करना चाहते हैं। किनारा करने का स्वस्थ तरीका यह है कि उसे उचित स्थान तक ले जाने का उपक्रम किया जाय न कि पड़ोसी के सामने ठेल दिया जाय।
May 5th, 2009 at 4:44 am
RESPECTED SHASTRI HI AAP KI KALAM MEIN KYA JADOO HA. WERE I RESIDE IS A SO CALLED GOOD COLONY OF LITERATE PERSONS , BUT THE PROBLEM IS THE KACHRA SAB APNE APNE GHAR KE AAGE SE SAAF KARTE HAIN AUR PRAKRITI KI HAWA AANDHI KE RUP MEIN KACHRE KO IKTTHA KAR AKTRIT KAR DETI HA, MANO KAH RAHI HO AAB BATAO YEH KACHRA KIS KA YEH. IN THIS ERA MENTAL ATTITUDE OF LITERATE PEOPLE HAVE CHANGED A LOT, VILLAGERS ARE FAR BETTER THAN URBAN PEOPLES.THEY DUMP OUT THE WAIST OR USE IT IN ONE WAY OR OTHER.